24 जून, 2026

आरती, स्तोत्र और साधना-यात्रा



काफी समय से मैं ब्लॉग पर नियमित रूप से लेख नहीं लिख पा रहा था। इसका प्रमुख कारण यह रहा कि मैं पिछले कई वर्षों से एक ऐसे धार्मिक ग्रंथ के निर्माण में संलग्न था, जिसमें सभी आरतियाँ और स्तोत्र पूर्णतः शुद्ध, प्रमाणिक और त्रुटिरहित रूप में संकलित किए जा सकें।

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भारतीय सनातन परंपरा में प्रातःकाल का समय अत्यंत पवित्र माना गया है। प्रत्येक सनातनी व्यक्ति अपने गुरु और ईश्वर का स्मरण कर, आरतियों एवं स्तोत्रों के माध्यम से भक्ति भाव व्यक्त करता है। यह साधना मन को शांति, स्थिरता और दिनभर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।

किन्तु व्यक्तिगत अनुभव में मुझे यह महसूस हुआ कि विभिन्न पुस्तकों एवं स्रोतों से प्राप्त आरतियों और स्तोत्रों के पाठ में कहीं-कहीं त्रुटियाँ या अशुद्धियाँ देखने को मिलती हैं। मेरा यह आशय नहीं है कि सभी ग्रंथ अशुद्ध हैं, परंतु उपलब्ध सामग्री में पूर्ण एकरूपता और शुद्धता का अभाव अवश्य दिखाई देता है।

इसी अनुभूति ने मेरे मन में यह विचार उत्पन्न किया कि क्यों न एक ऐसा संकलन तैयार किया जाए, जिसमें आरतियाँ और स्तोत्र अधिकतम शुद्धता के साथ एकत्रित किए जाएँ। इसी उद्देश्य के साथ मैंने विभिन्न स्रोतों से उनका संकलन प्रारंभ किया और कुछ विद्वान साथियों के सहयोग से इस कार्य को आगे बढ़ाया।

इस प्रक्रिया में काफी समय लगा, क्योंकि एक ओर कार्यालयीन दायित्व थे और दूसरी ओर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी। इसके बावजूद यह संकल्प निरंतर बना रहा कि इस कार्य को पूर्णता तक पहुँचाना ही है।

अंततः यह प्रयास अब एक पूर्ण रूप ले चुका है। इस पुस्तक के तैयार होने पर मन में गहन संतोष और आत्मिक आनंद का अनुभव हो रहा है। अब केवल इसके प्रकाशन की प्रक्रिया शेष है।

13 फ़रवरी, 2026

क्या खो रहे हैं हम?


 आज की डिजिटल दुनिया में ‘लाइक’, ‘थम्ब्स अप’ और ‘कमेंट्स’ केवल प्रतिक्रिया के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि कई लोगों के लिए आत्म-सम्मान का पैमाना बन चुके हैं। हम देख रहे हैं कि आज की पीढ़ी सोशल मीडिया पर लोकप्रियता पाने के लिए किस हद तक जाने को तैयार हो जाती है। फॉलोवर्स बढ़ाने की होड़ में कई बार लोग अपनी असली पहचान, अपने मूल्य और अपनी गरिमा तक दांव पर लगा देते हैं। सवाल यह है कि क्या कुछ सेकंड की वायरल प्रसिद्धि सच में उस कीमत के लायक है?

आज का दौर दिखावे का दौर बन गया है। लोग अपने जीवन के हर छोटे-बड़े पल को इस सोच के साथ साझा करते हैं कि कितने लाइक मिलेंगे, कितने कमेंट आएंगे। कई बार कंटेंट की गुणवत्ता से ज्यादा उसकी सनसनीखेज प्रस्तुति पर ध्यान दिया जाता है। कुछ लोग जानबूझकर विवादित बातें कहते हैं, अजीब हरकतें करते हैं या निजी जीवन को सार्वजनिक कर देते हैं, सिर्फ इसलिए कि लोग उन्हें नोटिस करें। लेकिन क्या यह लोकप्रियता स्थायी होती है? और क्या यह सम्मान भी दिलाती है?

जब कोई व्यक्ति केवल फॉलोवर्स बढ़ाने के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता करता है, तो वह अनजाने में यह संदेश देता है कि उसके लिए सच्चाई से ज्यादा अहम बाहरी प्रशंसा है। ऐसे में दर्शक भी उसे उसी नजर से देखने लगते हैं—एक मनोरंजन का साधन, न कि एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व। लोग सामने भले ही तारीफ कर दें, लेकिन भीतर से वे कितना सम्मान करते हैं, यह सोचने की बात है।

असल में, सच्ची पहचान और सम्मान धीरे-धीरे बनते हैं। यह ईमानदारी, निरंतरता और सकारात्मक योगदान से आता है। अगर कोई व्यक्ति अपने विचारों में सच्चा है, अपनी सीमाओं को समझता है और केवल लोकप्रियता के पीछे नहीं भागता, तो भले ही उसके फॉलोवर्स कम हों, लेकिन उनका विश्वास और सम्मान कहीं अधिक गहरा होगा।

हमें यह समझने की जरूरत है कि सोशल मीडिया एक माध्यम है, मंजिल नहीं। लाइक और कमेंट्स क्षणिक खुशी दे सकते हैं, लेकिन आत्म-संतोष और आत्म-सम्मान कहीं ज्यादा मूल्यवान हैं। इसलिए सवाल फॉलोवर्स की संख्या का नहीं, बल्कि उस भरोसे और सम्मान का है जो लोग हमारे लिए दिल में रखते हैं। आप भी एक क्षण रुककर ईमानदारी से इस बात पर विचार कीजिए।

05 जुलाई, 2025

अपनी बात: विद्यालय को नमन

अपनी बात: विद्यालय को नमन: आज मन में विचार आया कि हम आज तक अपनी जिंदगी में स्कूल (ज्ञान का मंदिर) कितनी बार, कितने दिन , साल तक गये होंगे ? सर्वप्रथम जब स्कूल में कदम ...

अपनी बात: स्क्वीज़ ए डे (हर दिन को जादू से भर दो!)

अपनी बात: स्क्वीज़ ए डे (हर दिन को जादू से भर दो!): सुबह हुई, सूरज मुस्काया, नीला आसमान भी गुनगुनाया। चिड़ियों ने बोली मीठी बात, चलो चलें हम खुशियों के साथ! स्क्वीज़ ए डे, हंसी से भर दो, हर पल...

29 मई, 2025

रुका नहीं जीवन, बस बदल गया

कोरोना महामारी की शुरुआत 2019 के अंत में हुई थी, और तभी से ‘कोविड-19’ नाम हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया। लॉकडाउन, कर्फ्यू, अनलॉक, मास्क, सैनेटाइज़र, वेंटिलेटर जैसे शब्द अब सामान्य बोलचाल में भी शामिल हो चुके हैं। यह महामारी न सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट थी, बल्कि इसने सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से भी पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।

उस भयावह दौर में लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं, छोटे व्यापार बंद हो गए, और रोज कमाने-खाने वाले लोगों के लिए दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो गई। धार्मिक स्थल, स्कूल, दफ्तर सब कुछ बंद पड़ गए। जिनके पास नौकरी बची भी, उन्हें आधी या सीमित तनख्वाह में काम करना पड़ा। हर कोई यही सोच रहा था — क्या कभी सब कुछ पहले जैसा हो पाएगा?

लेकिन समय कभी नहीं रुकता। धीरे-धीरे हालात सुधरे, वैक्सीनेशन आया, जागरूकता बढ़ी और इंसान ने फिर से जीना सीखा। अब 2025 में, हम बहुत कुछ पीछे छोड़ चुके हैं, लेकिन उन दिनों की यादें आज भी ताजा हैं।

महामारी के उस दौर में जीवन का तरीका ही बदल गया था। शादियाँ सीमित लोगों के बीच होने लगीं, नामकरण, मुंडन जैसे संस्कार भी घरों में सादगी से संपन्न हुए। कोई रिटायर हो रहा हो या किसी अपने की मृत्यु — समारोह सीमित और साधारण हो गए। इंसान जैसे भावनाओं में तो था, लेकिन उनके इज़हार के साधन सिमट गए थे।

पर इन चुनौतियों के बीच कुछ सकारात्मक बातें भी सामने आईं। फिजूलखर्ची में कमी आई, लोग अपनों के साथ समय बिताने लगे, बचत की आदतें बढ़ीं, और सबसे बड़ी बात — ‘सरलता’ की ओर लौटने की शुरुआत हुई। कोरोना ने हमें यह भी सिखा दिया कि जीवन में सादगी अपनाकर भी खुश रहा जा सकता है।

हमें उस समय के अनुभवों को भूलना नहीं चाहिए। उन्होंने हमें लचीलापन, सहनशीलता और जीवन के असली मूल्यों का बोध कराया।

लेकिन चिंता की बात यह है कि अब फिर से कोरोना धीरे-धीरे दस्तक दे रहा है। कुछ स्थानों पर संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, और मौतों की संख्या में भी वृद्धि देखी जा रही है। यह एक गंभीर संकेत है कि हमें फिर से सतर्क रहने की जरूरत है। कहीं ऐसा हो कि हम फिर उसी भयावह दौर की ओर लौट जाएं। इसलिए अभी से सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।

कोरोना ने हमें सिखाया है कि जीवन अनमोल है, और ज़रा सी लापरवाही बहुत भारी पड़ सकती है। अब वक्त है फिर से एकजुट होकर सतर्कता से आगे बढ़ने काताकि यह वायरस हमें दोबारा झकझोर पाए।

 


27 मई, 2025

धीमी लेकिन गहरी बढ़त



एक व्यापारी था। किसी कारणवश उसका व्यापार पूरी तरह से डूब गया और वह बुरी तरह से हताश हो गया। उसे ऐसा लगने लगा कि जीवन में अब कुछ शेष नहीं बचा है। परेशान और निराश होकर वह एक दिन जंगल में चला गया। वहां अकेले बैठकर वह बहुत देर तक सोचता रहा।

अंततः वह भगवान से बोला, ‘हे भगवान! मैं हार चुका हूँ। मुझे कोई एक वजह बताइए कि मैं क्यों न थक जाऊँ, क्यों न हताश हो जाऊँ? मेरा सब कुछ खत्म हो गया है।’

भगवान ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, ‘तुम इस जंगल में बांस और घास को देखो। जब मैंने इन्हें बोया तो दोनों की बराबर देखभाल की—उन्हें एक जैसा पानी, धूप और पोषण दिया।

घास कुछ ही हफ्तों में उग आई और धरती को हरा-भरा कर दिया। लेकिन बांस का बीज जरा भी नहीं बढ़ा। फिर भी मैंने हार नहीं मानी।

दूसरे वर्ष, घास और घनी हो गई, लेकिन बांस में कोई हलचल नहीं हुई। तीसरे और चौथे वर्ष भी बांस का बीज ज़मीन के भीतर ही रहा, ऊपर से कुछ भी नजर नहीं आया। फिर भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी।

पाँचवे साल, बांस का एक छोटा-सा अंकुर निकला। और फिर केवल छह महीनों में, वह 100 फीट लंबा हो गया।

क्या तुम जानते हो कि ऐसा कैसे हुआ?

पिछले पाँच वर्षों में, वह बांस अपनी जड़ों को मज़बूत कर रहा था, ताकि वह ऊँचाई और मजबूती से खड़ा रह सके।’

‘बेटा,’ भगवान ने कहा,

‘तुम भी अभी अपनी जड़ों को मज़बूत कर रहे हो। थको मत, रुको मत। तुम्हारा समय भी आएगा, और जब वह आएगा, तो तुम ऊँचाइयों को छुओगे, जैसे वह बांस।’

 


 

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