27 मई, 2025

धीमी लेकिन गहरी बढ़त



एक व्यापारी था। किसी कारणवश उसका व्यापार पूरी तरह से डूब गया और वह बुरी तरह से हताश हो गया। उसे ऐसा लगने लगा कि जीवन में अब कुछ शेष नहीं बचा है। परेशान और निराश होकर वह एक दिन जंगल में चला गया। वहां अकेले बैठकर वह बहुत देर तक सोचता रहा।

अंततः वह भगवान से बोला, ‘हे भगवान! मैं हार चुका हूँ। मुझे कोई एक वजह बताइए कि मैं क्यों न थक जाऊँ, क्यों न हताश हो जाऊँ? मेरा सब कुछ खत्म हो गया है।’

भगवान ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, ‘तुम इस जंगल में बांस और घास को देखो। जब मैंने इन्हें बोया तो दोनों की बराबर देखभाल की—उन्हें एक जैसा पानी, धूप और पोषण दिया।

घास कुछ ही हफ्तों में उग आई और धरती को हरा-भरा कर दिया। लेकिन बांस का बीज जरा भी नहीं बढ़ा। फिर भी मैंने हार नहीं मानी।

दूसरे वर्ष, घास और घनी हो गई, लेकिन बांस में कोई हलचल नहीं हुई। तीसरे और चौथे वर्ष भी बांस का बीज ज़मीन के भीतर ही रहा, ऊपर से कुछ भी नजर नहीं आया। फिर भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी।

पाँचवे साल, बांस का एक छोटा-सा अंकुर निकला। और फिर केवल छह महीनों में, वह 100 फीट लंबा हो गया।

क्या तुम जानते हो कि ऐसा कैसे हुआ?

पिछले पाँच वर्षों में, वह बांस अपनी जड़ों को मज़बूत कर रहा था, ताकि वह ऊँचाई और मजबूती से खड़ा रह सके।’

‘बेटा,’ भगवान ने कहा,

‘तुम भी अभी अपनी जड़ों को मज़बूत कर रहे हो। थको मत, रुको मत। तुम्हारा समय भी आएगा, और जब वह आएगा, तो तुम ऊँचाइयों को छुओगे, जैसे वह बांस।’

 


 

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