29 मई, 2025

रुका नहीं जीवन, बस बदल गया

कोरोना महामारी की शुरुआत 2019 के अंत में हुई थी, और तभी से ‘कोविड-19’ नाम हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया। लॉकडाउन, कर्फ्यू, अनलॉक, मास्क, सैनेटाइज़र, वेंटिलेटर जैसे शब्द अब सामान्य बोलचाल में भी शामिल हो चुके हैं। यह महामारी न सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट थी, बल्कि इसने सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से भी पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।

उस भयावह दौर में लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं, छोटे व्यापार बंद हो गए, और रोज कमाने-खाने वाले लोगों के लिए दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो गई। धार्मिक स्थल, स्कूल, दफ्तर सब कुछ बंद पड़ गए। जिनके पास नौकरी बची भी, उन्हें आधी या सीमित तनख्वाह में काम करना पड़ा। हर कोई यही सोच रहा था — क्या कभी सब कुछ पहले जैसा हो पाएगा?

लेकिन समय कभी नहीं रुकता। धीरे-धीरे हालात सुधरे, वैक्सीनेशन आया, जागरूकता बढ़ी और इंसान ने फिर से जीना सीखा। अब 2025 में, हम बहुत कुछ पीछे छोड़ चुके हैं, लेकिन उन दिनों की यादें आज भी ताजा हैं।

महामारी के उस दौर में जीवन का तरीका ही बदल गया था। शादियाँ सीमित लोगों के बीच होने लगीं, नामकरण, मुंडन जैसे संस्कार भी घरों में सादगी से संपन्न हुए। कोई रिटायर हो रहा हो या किसी अपने की मृत्यु — समारोह सीमित और साधारण हो गए। इंसान जैसे भावनाओं में तो था, लेकिन उनके इज़हार के साधन सिमट गए थे।

पर इन चुनौतियों के बीच कुछ सकारात्मक बातें भी सामने आईं। फिजूलखर्ची में कमी आई, लोग अपनों के साथ समय बिताने लगे, बचत की आदतें बढ़ीं, और सबसे बड़ी बात — ‘सरलता’ की ओर लौटने की शुरुआत हुई। कोरोना ने हमें यह भी सिखा दिया कि जीवन में सादगी अपनाकर भी खुश रहा जा सकता है।

हमें उस समय के अनुभवों को भूलना नहीं चाहिए। उन्होंने हमें लचीलापन, सहनशीलता और जीवन के असली मूल्यों का बोध कराया।

लेकिन चिंता की बात यह है कि अब फिर से कोरोना धीरे-धीरे दस्तक दे रहा है। कुछ स्थानों पर संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, और मौतों की संख्या में भी वृद्धि देखी जा रही है। यह एक गंभीर संकेत है कि हमें फिर से सतर्क रहने की जरूरत है। कहीं ऐसा हो कि हम फिर उसी भयावह दौर की ओर लौट जाएं। इसलिए अभी से सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।

कोरोना ने हमें सिखाया है कि जीवन अनमोल है, और ज़रा सी लापरवाही बहुत भारी पड़ सकती है। अब वक्त है फिर से एकजुट होकर सतर्कता से आगे बढ़ने काताकि यह वायरस हमें दोबारा झकझोर पाए।

 


27 मई, 2025

धीमी लेकिन गहरी बढ़त



एक व्यापारी था। किसी कारणवश उसका व्यापार पूरी तरह से डूब गया और वह बुरी तरह से हताश हो गया। उसे ऐसा लगने लगा कि जीवन में अब कुछ शेष नहीं बचा है। परेशान और निराश होकर वह एक दिन जंगल में चला गया। वहां अकेले बैठकर वह बहुत देर तक सोचता रहा।

अंततः वह भगवान से बोला, ‘हे भगवान! मैं हार चुका हूँ। मुझे कोई एक वजह बताइए कि मैं क्यों न थक जाऊँ, क्यों न हताश हो जाऊँ? मेरा सब कुछ खत्म हो गया है।’

भगवान ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, ‘तुम इस जंगल में बांस और घास को देखो। जब मैंने इन्हें बोया तो दोनों की बराबर देखभाल की—उन्हें एक जैसा पानी, धूप और पोषण दिया।

घास कुछ ही हफ्तों में उग आई और धरती को हरा-भरा कर दिया। लेकिन बांस का बीज जरा भी नहीं बढ़ा। फिर भी मैंने हार नहीं मानी।

दूसरे वर्ष, घास और घनी हो गई, लेकिन बांस में कोई हलचल नहीं हुई। तीसरे और चौथे वर्ष भी बांस का बीज ज़मीन के भीतर ही रहा, ऊपर से कुछ भी नजर नहीं आया। फिर भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी।

पाँचवे साल, बांस का एक छोटा-सा अंकुर निकला। और फिर केवल छह महीनों में, वह 100 फीट लंबा हो गया।

क्या तुम जानते हो कि ऐसा कैसे हुआ?

पिछले पाँच वर्षों में, वह बांस अपनी जड़ों को मज़बूत कर रहा था, ताकि वह ऊँचाई और मजबूती से खड़ा रह सके।’

‘बेटा,’ भगवान ने कहा,

‘तुम भी अभी अपनी जड़ों को मज़बूत कर रहे हो। थको मत, रुको मत। तुम्हारा समय भी आएगा, और जब वह आएगा, तो तुम ऊँचाइयों को छुओगे, जैसे वह बांस।’

 


 

स्क्वीज़ ए डे (हर दिन को जादू से भर दो!)


सुबह हुई, सूरज मुस्काया,
नीला आसमान भी गुनगुनाया।
चिड़ियों ने बोली मीठी बात,
चलो चलें हम खुशियों के साथ!


स्क्वीज़ ए डे, हंसी से भर दो,
हर पल को रंगों से कर दो।
एक कहानी, एक मुस्कान,
दोस्ती हो हर सुबह-शाम।


थोड़ी मस्ती, थोड़ा खेल,
झूले में उड़ान, जैसे बादल का मेल।
चॉकलेट की खुशबू, गुब्बारों की रौशनी,
हर दिन हो जाए एक सुनहरी कहानी।


स्क्वीज़ ए डे, मतलब ये है,
हर दिन में छुपा कोई जादू है।
पढ़ो, गाओ, नाचो, खिलखिलाओ,
खुद में एक छोटा सूरज जगाओ!

26 मई, 2025

नाम में बसते हैं श्याम

एक दिन प्यारी श्रीराधा रानी ने श्यामसुन्दर से कहा, ‘आज हमारे मन में आपकी मुरली बजाने की इच्छा हो रही है।’

श्यामसुन्दर मुस्कराकर बोले, ‘प्यारीजू! यह मुरली आपसे नहीं बजेगी।’

राधा रानी को आश्चर्य हुआ। वे बोलीं, ‘क्यों? क्या मुझे मुरली बजाना नहीं आता?’

श्यामसुन्दर ने विनम्रता से उत्तर दिया, ‘नहीं नहीं प्यारीजू! आप तो चौंसठों गुणों से परिपूर्ण हैं, पर यह मुरली आपसे नहीं बजेगी।’

राधा रानी ने श्यामसुन्दर के हाथ से मुरली ली और उसे बजाने का प्रयास किया। उन्होंने उसमें हवा भरी, परंतु मुरली से कोई स्वर नहीं निकला। राधाजी मुस्कराईं और बोलीं, ‘प्यारे! अवश्य ही तुम कोई जादू कर रहे हो।’

उसी समय ललिता सखी वहाँ आ पहुँचीं। राधाजी ने उन्हें देखते ही कहा, ‘ललिते! देखो न, यह मुरली मुझसे नहीं बज रही। क्या तुम भी श्यामसुन्दर से मिली हुई हो?’

ललिता सखी ने विनम्र भाव से उत्तर दिया, ‘हे स्वामिनी! यह मुरली आपसे इसलिए नहीं बज रही, क्योंकि आप इसमें किसका नाम भर रही हैं?’

राधा रानी ने कहा, ‘मैं तो कृष्ण नाम भर रही हूँ।’

ललिता सखी मुस्कराईं और बोलीं, ‘यही तो बात है। इस मुरली में कृष्ण नाम से स्वर नहीं फूटेगा। यह मुरली तो आपके नाम की अनन्य है। श्यामसुन्दर जब इसे बजाते हैं, तब केवल आपके ही नाम का गुणगान करते हैं। आप इसमें राधे नाम भरिए, तब यह अवश्य बजेगी।’

राधा रानी ने ललिता की बात मानी और मुरली में ‘राधे’ नाम भरा। जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, मुरली से मधुर स्वर फूटने लगे। वह ऐसा सुरीला संगीत था, जिसे सुनकर स्वयं राधा रानी भावविभोर हो गईं। वे श्यामसुन्दर के अनन्य प्रेम से प्रसन्न होकर उन्हें अपने कंठ से लगा लिया।

 

जिसने उलझाई, वही सुलझाएगा

एक बार वृंदावन में एक संत हुए — कदम खंडी जी महाराज। उनकी जटाएं बहुत विशाल थीं और वे वृंदावन के सघन वनों में जाकर एकांत में भजन किया करते थे।

एक दिन वे वन की ओर जा रहे थे, तो उनकी जटाएं रास्ते की झाड़ियों में उलझ गईं। उन्होंने बहुत प्रयास किया, पर जटाएं सुलझ नहीं सकीं। अंततः थककर वहीं बैठ गए। बैठे-बैठे वे गुनगुनाने लगे:

‘हे मुरलीधर, छलिया मोहन, हम भी तुमको दिल दे बैठे,
ग़म पहले से ही कम तो ना थे, एक और मुसीबत ले बैठे।’

इधर ब्रज के बहुत से प्रेमीजन इकट्ठा हो गए और बोले, ‘बाबा, हम आपकी जटाएं सुलझा देते हैं।’
पर बाबा ने सबको डांट दिया और कहा:

‘जिसने उलझाई हैं, वही आएगा अब सुलझाने!’

अब बाबा वहीं बैठे, प्रतीक्षा करते-करते भक्ति में डूब गए। वे विरह में गा उठे:

‘तुम आते नहीं मनमोहन, क्यों इतना हमको तड़पाते हो क्यों?
प्राण पखेरू लगे उड़ने, तुम हाय अभी शर्माते हो क्यों?’

तभी सामने से लगभग 15-16 वर्ष का एक अनुपम सुंदर किशोर आता हुआ दिखा — हाथ में लकुटी, चाल में ऐसी लय कि करोड़ों कामदेव भी लजा जाएं। मुख मंडल तेजस्वी, मुस्कान में करुणा और प्रेम।

वह किशोर पास आकर बोला:
‘बाबा, हम हूं सुलझा दें आपकी जटाएं।’
बाबा ने पूछा: ‘आप कौन हैं श्रीमान?’
किशोर बोला: ‘हम हैं कुंज बिहारी।’
बाबा बोले: ‘हम तो किसी कुंज बिहारी को नहीं जानते।’

कुछ देर बाद वही किशोर फिर आया और बोला:
‘बाबा, अब सुलझा दूं आपकी जटाएं?’
बाबा ने फिर पूछा: ‘अब कौन हो तुम?’
वह बोला: ‘हम हैं निकुंज बिहारी।’
बाबा बोले: ‘उन्हें भी नहीं जानते हम।’

किशोर मुस्कुरा कर बोला: ‘तो फिर किसे जानते हो, बाबा?’
बाबा बोले: ‘हम तो केवल 'निभृत निकुंज बिहारी' को जानते हैं।’

तब भगवान ने तत्काल 'निभृत निकुंज बिहारी' का स्वरूप धारण कर लिया और बोले:
‘बाबा, अब तो पहचान लिया ना? अब सुलझा दें आपकी जटाएं?’

बाबा ने गौर से देखा और फिर बोले:
‘क्यों रे लाला! हमें पागल बनाता है? निभृत निकुंज बिहारी तो श्री राधा जी के बिना एक पल भी नहीं रह सकते, और तू अकेले खड़ा है?’

तभी पीछे से एक मधुर, रसीली आवाज आई:
‘बाबा, हम यहीं हैं।’

यह थीं हमारी श्री राधा रानी
उन्होंने आगे बढ़कर कहा:
‘अब हम मिलकर सुलझा देते हैं आपकी जटाएं।’

बाबा भाव-विभोर होकर बोले:
‘लाडली! जब तुम्हारा दर्शन हो गया, तो अब यह जीवन ही सुलझ गया।
जटाओं की उलझन अब कुछ भी नहीं!’

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