26 मई, 2025

बच्चे तो बच्चे ही हैं…

परिवर्तन कुदरत का नियम है। अगर ऐसा न हो तो सब कुछ ठहर जायेगा कुछ नया नहीं होगा। आज कोरोना महामारी आई है तो जायेगी भी। लेकिन इस महामारी ने बहुत कुछ बदल दिया तो बहुत कुछ सीखा भी दिया। सीखाने से याद आया। कोरोना के समय ज्यादातर खाने-पीने का सामान घर पर ही बनने लगा। नये-नये पकवान बनने लगे तो नयी चीजें बनने लगीं। खाने-पीने के नाम पर कितनी वैरायटियां हो गई हैं। वह अलग बात है कि इस कोरोनाकाल में जिस घर के सदस्य की नौकरी चली गयी उसके घर में चूल्हा जला भी नहीं। या जला भी तो कैसे चला। अभी उस पर बात नहीं करेंगे।

ऐसे में सोच रहा था कि आज के समय में खाने-पीने की कितनी वैरायटियां हो गई हैं। आपको जो पसंद है खाओ, नहीं पसंद है मत खाओ। लेकिन आज से 40-45 साल पहले की बात करें तो आज के मुकाबले खाने की इतनी वैरायटी नहीं थी। लेकिन जो थीं व शुद्ध, साफ-सुथरी और सेहतमंद भी। उस समय पसंद-नापसंद का मतलब नहीं होता था। जितना भी जैसा भी मिला, उसमें आनंद की एक अलग अनुभूति होती थी।

आज के बच्चे यह नहीं खाना, वह पसंद नहीं। मुझे नूडल्स खाने हैं, बर्गर खाने, चिप्स खाने हैं। आज जब हम अभिभावक के रूप में अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं कि ये चीजें खाकर क्या बच्चे अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे। क्या नूडल्स, बर्गर खाने वाले बच्चे आगे बड़े होने पर सेहतमंद रह सकेंगे? क्या ऐसे खाद्य पदार्थों के खाने वाले बच्चे, आने वाली बीमारियों से सुरक्षित रह पायेंगे? क्या उन बीमारियों से लड़ने के लिए उनके पास उतनी इम्यूनिटी होगी? बहुत से ऐसे सवाल शायद सभी अभिभावकों के मन में आते होंगे। आज के बच्चों को गुड़-चना, ड्राइ फूड, शक्कर-घी, पिन्नी, मक्खन, चूरमा जैसे चीजों को खाने के लिए कहें तो नाक सिकोड़ते हैं। कहते हैं ये भी कोई खाने की चीजें हैं।

लेकिन एक बात है 40-45 साल पहले की पीढ़ी पहले भी संतुष्ट थी, और आज के खाने-पीने की वैरायटियां देखकर भी संतुष्ट है। लेकिन जहां बात स्वास्थ्य को लेकर आती है तो वहां संतुष्ट हो पाना जरा मुश्किल है। समय का फेर देखिये आज स्वाद सर्वोपरि है। ये चीज़ें सेहत के लिए कितना फायदा या नुकसानदायक हैं, उसको दरकिनार कर दिया गया है। खैर, समय के साथ चलना पड़ता है वरना दुनिया कहती है कि कौन-सी दुनिया में जी रहे हैं। सब चलता है। लेकिन फिर भी अपने बच्चों के बारे में जरूर सोचना चाहिए। यह बात है तो बहुत छोटी-सी है लेकिन जब अपने समय के खान-पान और आज के बच्चों के खान-पान की तुलना करेंगे तो बात समझ आयेगी। जिम्मेवारी तो अभिभावकों की ही है। आखिर बच्चे तो बच्चे ही हैं...

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