यह सच है कि बीते हुए दिन वापस तो नहीं आ सकते। लेकिन उन यादों को जरूर ताजा किया जा सकता है। हमारा छोटा-सा परिवार। हम दोनों भाइयों की शादी के बाद परिवार बड़ा हो गया। बहन भी शादी के बाद ससुराल चली गई। मैं भी रोजगार के चक्कर में बाहर चला गया। अब घर जाना साल में एक बार ही हो पाता है। वह भी तब जब बच्चों की स्कूल में जून महीने में छुट्टियां हो जाती हैं। तब वही पहाड़ और गर्मी से राहत के लिए अपना मकान याद आता है। अपना दो मंजिला मकान आज भी है। शायद मकान को बने सौ साल से ऊपर हो गये होंगे। आज भी उसी मजबूती के साथ खड़ा है। मिट्टी-लकड़ी का बना आज भी देखने में बहुत सुंदर लगता है। समय के साथ पुराने मकान के साथ ही अब नया सीमेंट का तीन मंजिला मकान भी बन गया। लेकिन बचपन हमारा पुराने मकान पर ही बीता। आज आसपास बहुत कम पुराने कच्चे मकान बचे हैं। अब तो चारों ओर कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है। उस समय कच्चे मकान तो थे लेकिन दूर-दूर। पड़ोस कभी पड़ोस नहीं लगा। पड़ोसी होने के नाते सभी मिल-जुलकर रहते थे। आपसी मेलजोल में सभी किसी को मामा, किसी को मामी, ताया-तायी, चाची या बुआ से ही संबोधन करते थे। हां, आज भी स्थानीय पुराने-नये पीढ़ी के लोग उसी भाव से मिलते हैं।
आसपास हरे-भरे देवदार के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष मानो आसमान से बातें कर रहे हों। चारों ओर हरियाली ही हरियाली। अपने मकान के पास ही एक बड़ा खेलने का मैदान था। पहाड़ों में इतना बड़ा ग्राउंड होना एक बड़ी बात है। मैदान के साथ सटा हुआ एक बड़ा-सा गहरा, जिसे हम तालाब से ही संबोधित करते थे। ऊंचाई से एक नाली बनी हुई थी शायद बरसात में आसपास का पानी उसी नाली द्वारा तालाब में गिरता था। कहा जाता था कि ब्रिटिश शासन काल के समय उस सारे क्षेत्र को एक योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया था। हां, यह सच भी है आज भी ब्रिटिश शासन काल के समय की योजनाबद्ध तरीके से बनी नालियां, नाले, बिना सीमेंट के जंगल में ही बनी दीवारें, साफ-सुथरे रास्ते उसी मजबूती से खड़े कहीं-कहीं देखने को मिल जायेंगे। पहाड़ों में बर्फ गिरने से अक्सर रास्ते बंद हो जाते थे। बरसात में पानी से रास्ते न बह जायें, उसी को ध्यान में रखकर उनकी योजनाकार्य देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। उस समय उन्होंने इस प्रकार बड़े-बड़े चौड़े नाले कहें या कुछ और बर्फ ऊपर से फिसलकर या पिघलकर सीधे नीचे की चली जाती। न किसी रास्ते को नुकसान और पानी की निकासी सीधी हो जाती। नाले-नालियां ऐसे कि उसके नीचे पत्थरों की तह एक के ऊपर एक सटाकर ऐसी लगाई कि देखने पर पता ही नहीं चलता है। ऐसा लगता जैसे कुदरत ने पहले से ही बनाकर इस धरती को बनाया हो। जंगलों के बीच छोटी-छोटी पगडंडिया भी देखने को मिलेगी। बड़े-बड़े पत्थरों का इस्तेमाल बैठने के लिए इस प्रकार किया कि जैसे सब कुछ पहले से ही बनाकर रखा हो।
बरसात या सर्दियों में बर्फ का पानी तालाब में चारों ओर बहकर आता था। शायद पानी को इकट्ठा करने के लिये हो। कहा जाता था कि इस मैदान में फलदार वृक्ष थे। उसे पानी देने के लिये यह तालाब बना गया हो। अंग्रेजों के लिए शिमला उनका मनपसंद स्थल था। उन द्वारा बनाये गये अपने रहने के लिए योजनाबद्ध मकान हमारे मकान के आसपास ही दो-चार बड़े-बड़े मकान थे जिन्हें कोठी कहा जाता था। कोठी यानी बड़े आकार के दो मंजिला मकान को कहा जाता था। वहां तक पहुंचने के लिए चौड़ा रास्ता जो आज भी देखने को मिल जायेगा। कहा जाता है कि इन चौड़े रास्तों में अंग्रेजों की घोड़ा बग्गी चलती थी। जैसे कि मैंने पहले भी कहा कि इसको बनाने में किसी प्रकार का सीमेंट या सरिये का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। चौड़े रास्तों को पक्की दीवारों और पत्थरों को तरतीब तरीके से लगाकर बनाया गया था। इन रास्तों को मैंने कभी बरसात में बहते या गिरते नहीं देखा। वैसे के वैसे ही ठीक प्रकार से हैं। कह सकते हैं कि पूरा क्षेत्र या जंगल अंग्रेजों के बेहतरीन योजनाबद्ध तरीके के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
खैर, बात बचपन के दिन की हो रही है। उस समय न तो टेलीविजन था। बच्चों में खेलने के लिए सामान्य खेल थे। क्रिकेट पहले स्थान पर आता है। फिर हॉकी, कबड्डी, फुटबाल, गुल्ली-डंडा, कंचे, स्टापू, बैडमिंटन, लुका-छिपी जैसे कई खेल थे। क्योंकि ग्राउंड पास ही था तो क्रिकेट सबसे ज्यादा खेला जाता। आसपास और दूर से भी बच्चे क्रिकेट खेलने या देखने आते थे। सारा दिन बच्चे उसी मैदान के चारों ओर बैठते और देखने को आते थे। शोर इतना होता मानो क्रिकेट स्टेडियम में मैच लगा हो। बच्चों की रविवार की या अन्य किसी दिन छुट्टी हो, सभी उसी ग्राउंड में खेलने या देखने को मिलेंगे। पहाड़ों में सर्दियों में बर्फबारी के कारण स्कूलों में छुट्टियां हो जाती थीं यानी जनवरी-फरवरी कभी मार्च तक। बच्चे यानी हम सब उसी ग्राउंड में क्रिकेट खेलते हुए मिल जाते। जो बच्चे खेलते नहीं थे वे आसपास सर्दियों में धूप सेंकते हुए क्रिकेट देखने का आनंद लेते। बरसातों के समय हरी-हरी घास में लेटे-लेटे खेल का मजा लेते। ग्राउंड के आसपास जो थोड़े-बहुत मकान थे वे अपने घर से बरामदे में बैठकर मैच का मज़ा लेते। क्योंकि हमारा मकान तो ग्राउंड के पास ही था तो मैं और मेरा भाई और पड़ोस के दोस्त सुबह सूरज निकलते ही मैदान में डट जाते। न भूख न प्यास। बस सारा दिन ग्राउंड में। कोई और आये न आये लेकिन हम सब पड़ोस के बच्चे उसी ग्राउंड में देखने को मिलेंगे। सभी के माता-पिता को भी पता होता था कि बच्चे कहां होंगे।
हां, एक बात और खेल-खेल कर शरीर इतना मजबूत हो गया कि उस समय खांसी, जुकाम, गला खराब, सिर-दर्द, पेट दर्द जैसी बीमारियां केवल सुनी थी। कभी शरीर को लगी नहीं। कभी-कभी गला खराब हो गया तो कालीमिर्च और अदरक की चाय अम्मा (अपनी माताश्री को मैं आज भी अम्मा ही कहता हूं) पिला देतीं और हम खुश होकर चाय का आनंद लेते थे। चाय का स्वाद तो उस समय चखा नहीं था। मेरे अम्मा-पापा कहते थे कि बच्चे चाय नहीं पीते। इसलिए हमें दूध पीकर ही संतुष्ट होना पड़ता। सुबह उठते ही रात की रोटी का चूरमा बनाकर और उस पर घी साथ में दूध मिलता था।
समय बदला आज न तो वह ग्राउंड रहा। न वह हरियाली और न ही वह पगडंडियां। पूरी जमीन बिल्डरों ने खरीद कर उस पर मकान बना दिये। धरती को छलनी कर दिया। फ्लैट बनाने के चक्कर में आसपास लगे तरतीब से लगाये पत्थर गायब हो गये। नाले-नालियां मिट्टी और कंक्रीट में कहीं दब गये या उखाड़ दिये गये। आसपास के पेड़ पत्थरों से छलनी हो गये हैं। पेड़ चुपचाप साफ कर दिये गये। आज मैदान की छाती पर बड़े-बड़े तीन-चार मंजिलें मकान खड़े हैं। कभी जिस ग्राउंड में बच्चों का शोर मन को सुकून देता था आज उसी ग्राउंड से चीखने की आवाजें कानों में सुनाई देती हैं। पेड़ों की आहें मन को अंदर तक झिंझोड़ देती हैं। विकास तो हमने किया लेकिन किस कीमत पर। सरकार से ग्राउंड को बचाने के लिए सबने प्रयास भी किये, प्रार्थनाएं भी की थीं ताकि आने वाली पीढ़ी और बच्चों को खेलने के लिए मिल सके। लेकिन सारे प्रयास विफल रहे। किसी ने भी हमारे मन में लगी गहरी चोट को महसूस नहीं किया। बच्चे फिट रहेंगे तभी तो हिन्दुस्तान हिट रहेगा। कैसे रहेंगे। पहाड़ों में खेलने को मैदान नहीं हैं, जो हैं उन पर बिल्डरों की नजरें हैं। अब जब भी आसपास नजर दौड़ाता हूं तो एक उदासी छा जाती है। सोचता हूं कोई तो लौटा दे बीते हुए दिन...!
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