एक दिन प्यारी श्रीराधा रानी ने श्यामसुन्दर से कहा, ‘आज हमारे मन में आपकी मुरली बजाने की इच्छा हो रही है।’
श्यामसुन्दर मुस्कराकर बोले, ‘प्यारीजू! यह मुरली आपसे नहीं बजेगी।’
राधा रानी को आश्चर्य हुआ। वे बोलीं, ‘क्यों? क्या मुझे मुरली बजाना नहीं आता?’
श्यामसुन्दर ने विनम्रता से उत्तर दिया, ‘नहीं नहीं प्यारीजू! आप तो चौंसठों गुणों से परिपूर्ण हैं, पर यह मुरली आपसे नहीं बजेगी।’
राधा रानी ने श्यामसुन्दर के हाथ से मुरली ली और उसे बजाने का प्रयास किया। उन्होंने उसमें हवा भरी, परंतु मुरली से कोई स्वर नहीं निकला। राधाजी मुस्कराईं और बोलीं, ‘प्यारे! अवश्य ही तुम कोई जादू कर रहे हो।’
उसी समय ललिता सखी वहाँ आ पहुँचीं। राधाजी ने उन्हें देखते ही कहा, ‘ललिते! देखो न, यह मुरली मुझसे नहीं बज रही। क्या तुम भी श्यामसुन्दर से मिली हुई हो?’
ललिता सखी ने विनम्र भाव से उत्तर दिया, ‘हे स्वामिनी! यह मुरली आपसे इसलिए नहीं बज रही, क्योंकि आप इसमें किसका नाम भर रही हैं?’
राधा रानी ने कहा, ‘मैं तो कृष्ण नाम भर रही हूँ।’
ललिता सखी मुस्कराईं और बोलीं, ‘यही तो बात है। इस मुरली में कृष्ण नाम से स्वर नहीं फूटेगा। यह मुरली तो आपके नाम की अनन्य है। श्यामसुन्दर जब इसे बजाते हैं, तब केवल आपके ही नाम का गुणगान करते हैं। आप इसमें राधे नाम भरिए, तब यह अवश्य बजेगी।’
राधा रानी ने ललिता की बात मानी और मुरली में ‘राधे’ नाम भरा। जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, मुरली से मधुर स्वर फूटने लगे। वह ऐसा सुरीला संगीत था, जिसे सुनकर स्वयं राधा रानी भावविभोर हो गईं। वे श्यामसुन्दर के अनन्य प्रेम से प्रसन्न होकर उन्हें अपने कंठ से लगा लिया।
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