26 मई, 2025

जिसने उलझाई, वही सुलझाएगा

एक बार वृंदावन में एक संत हुए — कदम खंडी जी महाराज। उनकी जटाएं बहुत विशाल थीं और वे वृंदावन के सघन वनों में जाकर एकांत में भजन किया करते थे।

एक दिन वे वन की ओर जा रहे थे, तो उनकी जटाएं रास्ते की झाड़ियों में उलझ गईं। उन्होंने बहुत प्रयास किया, पर जटाएं सुलझ नहीं सकीं। अंततः थककर वहीं बैठ गए। बैठे-बैठे वे गुनगुनाने लगे:

‘हे मुरलीधर, छलिया मोहन, हम भी तुमको दिल दे बैठे,
ग़म पहले से ही कम तो ना थे, एक और मुसीबत ले बैठे।’

इधर ब्रज के बहुत से प्रेमीजन इकट्ठा हो गए और बोले, ‘बाबा, हम आपकी जटाएं सुलझा देते हैं।’
पर बाबा ने सबको डांट दिया और कहा:

‘जिसने उलझाई हैं, वही आएगा अब सुलझाने!’

अब बाबा वहीं बैठे, प्रतीक्षा करते-करते भक्ति में डूब गए। वे विरह में गा उठे:

‘तुम आते नहीं मनमोहन, क्यों इतना हमको तड़पाते हो क्यों?
प्राण पखेरू लगे उड़ने, तुम हाय अभी शर्माते हो क्यों?’

तभी सामने से लगभग 15-16 वर्ष का एक अनुपम सुंदर किशोर आता हुआ दिखा — हाथ में लकुटी, चाल में ऐसी लय कि करोड़ों कामदेव भी लजा जाएं। मुख मंडल तेजस्वी, मुस्कान में करुणा और प्रेम।

वह किशोर पास आकर बोला:
‘बाबा, हम हूं सुलझा दें आपकी जटाएं।’
बाबा ने पूछा: ‘आप कौन हैं श्रीमान?’
किशोर बोला: ‘हम हैं कुंज बिहारी।’
बाबा बोले: ‘हम तो किसी कुंज बिहारी को नहीं जानते।’

कुछ देर बाद वही किशोर फिर आया और बोला:
‘बाबा, अब सुलझा दूं आपकी जटाएं?’
बाबा ने फिर पूछा: ‘अब कौन हो तुम?’
वह बोला: ‘हम हैं निकुंज बिहारी।’
बाबा बोले: ‘उन्हें भी नहीं जानते हम।’

किशोर मुस्कुरा कर बोला: ‘तो फिर किसे जानते हो, बाबा?’
बाबा बोले: ‘हम तो केवल 'निभृत निकुंज बिहारी' को जानते हैं।’

तब भगवान ने तत्काल 'निभृत निकुंज बिहारी' का स्वरूप धारण कर लिया और बोले:
‘बाबा, अब तो पहचान लिया ना? अब सुलझा दें आपकी जटाएं?’

बाबा ने गौर से देखा और फिर बोले:
‘क्यों रे लाला! हमें पागल बनाता है? निभृत निकुंज बिहारी तो श्री राधा जी के बिना एक पल भी नहीं रह सकते, और तू अकेले खड़ा है?’

तभी पीछे से एक मधुर, रसीली आवाज आई:
‘बाबा, हम यहीं हैं।’

यह थीं हमारी श्री राधा रानी
उन्होंने आगे बढ़कर कहा:
‘अब हम मिलकर सुलझा देते हैं आपकी जटाएं।’

बाबा भाव-विभोर होकर बोले:
‘लाडली! जब तुम्हारा दर्शन हो गया, तो अब यह जीवन ही सुलझ गया।
जटाओं की उलझन अब कुछ भी नहीं!’

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