06 अगस्त, 2026

सावन को आने दो…


आज जब मैं कंप्यूटर पर बैठकर यह लेख टाइप कर रहा था, तभी अचानक बाहर बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। कुछ ही क्षणों में झमाझम बारिश शुरू हो गई। अनायास ही उंगलियां कीबोर्ड पर ठहर गईं और मन खिड़की के बाहर चला गया। शहरों के कंक्रीट के जंगलों में बारिश का आनंद अब पहले जैसा कहां रह गया है। फिर भी मेरे घर के आंगन में लगी लोहे की टीन की छत पर जब बारिश की पहली बूंदें गिरती हैं, तो उनकी टप-टप एक ऐसा मधुर संगीत रच देती है, जो सीधे बचपन की गलियों में पहुंचा देता है।

एक समय था, जब बारिश केवल मौसम नहीं, उत्सव हुआ करती थी। पहली फुहार पड़ते ही बच्चे घरों से बाहर निकल आते। कोई भीगते हुए नाचता, कोई बहते पानी में कागज की नाव छोड़ देता। स्कूल से भीगकर घर लौटने में भी एक अनोखा आनंद था। किताबों और बस्ते को बचाने की नाकाम कोशिशें भी किसी खेल से कम नहीं लगती थीं। गलियों में बहते पानी पर छलांग लगाकर छींटे उड़ाना, छतों से गिरती बूंदों की लय सुनना और पेड़-पौधों को बारिश में झूमते देखना ऐसा अहसास देता था, मानो पूरी प्रकृति स्नान कर नई दुल्हन की तरह सज रही हो।

शाम ढलते-ढलते जब बारिश थमती, तो कभी-कभी आकाश में इंद्रधनुष मुस्कुरा उठता। धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती। ऐसा लगता जैसे इंद्रदेव ने अपना समूचा आशीर्वाद वर्षा के रूप में धरती पर बरसा दिया हो। बंजर जमीन भी जीवन से भर उठती थी।

लेकिन समय के साथ बारिश का अर्थ बदल गया। अब काले बादल घिरते ही मन में आनंद से पहले चिंता जन्म लेने लगती है। कहीं बादल न फट जाएं, कहीं भूस्खलन न हो जाए, कहीं पेड़ न गिर जाएं। मैदानी इलाकों में बाढ़, जलभराव और जाम की खबरें पहले याद आती हैं। बारिश, जो कभी जीवन का उत्सव थी, आज कई लोगों के लिए परेशानी का पर्याय बनती जा रही है।

अब लोग कहते हैं—बारिश न हो तो अच्छा है। किसी को दफ्तर पहुंचना है, किसी को दुकान खोलनी है, किसी को बच्चों को स्कूल छोड़ना है। मानो हमने अपने जीवन को इस तरह गढ़ लिया है कि प्रकृति के लिए उसमें कोई जगह ही नहीं बची। प्रश्न यह है कि बदली बारिश है या हमारा नजरिया?

कभी सोचिए, जिस प्रकृति ने हमें जीवन, जल, अन्न और सांस लेने की हवा दी, उसी से हम दूर क्यों होते जा रहे हैं? हमारे बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे कि कभी-कभी बारिश में भीग लेना भी सेहत के लिए अच्छा होता है। उनका आशय केवल शरीर से नहीं, मन से भी था। आज हम अपने बच्चों को बारिश की हर बूंद से बचाना चाहते हैं। डरते हैं कि कहीं उन्हें जुकाम या बुखार न हो जाए। विडंबना यह है कि जितना हम उन्हें प्रकृति से दूर रखते जा रहे हैं, उतनी ही उनकी प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर होती जा रही है।

प्रकृति हमें केवल संसाधन नहीं देती, वह जीवन जीने का तरीका भी सिखाती है। बारिश सिखाती है कि बरसना जरूरी है, मिट्टी सिखाती है कि जुड़े रहना जरूरी है और सावन याद दिलाता है कि जीवन केवल भागदौड़ का नाम नहीं, ठहरकर भी महसूस किया जा सकता है।

इसलिए सावन को आने दीजिए। कभी खिड़की से बाहर झांकने के बजाय बारिश में दो कदम चलकर देखिए। भीगी मिट्टी की सोंधी खुशबू को सांसों में भरिए, बूंदों का संगीत सुनिए और अपने भीतर के उस बच्चे को फिर से जगाइए, जो आज भी कहीं बारिश में भीगने का इंतजार कर रहा है।

याद रखिए, जितना हम प्रकृति के करीब रहेंगे, उतना ही जीवन के करीब रहेंगे। बंद कमरों से बारिश केवल दिखाई देती है, लेकिन उसका असली आनंद तो तभी मिलता है, जब हम उसकी बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस करते हैं। इस सावन, बस इतना कीजिए—प्रकृति से अपना रिश्ता फिर से जोड़ लीजिए। शायद यही रिश्ता हमें फिर से भीतर से हरा-भरा बना दे।

 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें