जब से कोरोना महामारी फैली है, सारे कामकाज रुक गये हैं। स्कूल-कॉलेज तो बिल्कुल बंद हैं। सरकारी ऑफिस में कर्मचारियों की उपस्थिति भी कम ही है। प्राइवेट सेक्टर में तो नौकरियां या तो खत्म कर दी है या फिर कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसा नहीं है। हाल यह है कि सब ओर हालात ठीक नहीं है।
लेकिन इन दिनों घरों में भी कोरोना ने परिवार में सबको आलसी बना दिया है। कोरोना से पहले समय पर रात को सोते थे सुबह समय पर उठते थे। बच्चों का टिफिन तैयार होता था। समय पर ब्रेक फास्ट, बच्चों को स्कूल छोड़ने का निश्चित समय था। पति देव समय पर ऑफिस जाने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन अब इन कामों से सबको कोरोना ने छुट्टी दे दी। आलम यह है कि देर रात तक जागना, सुबह मनमर्जी उठना, न स्कूल की चिंता, न टिफिन की चिंता, स्कूल बैग पता नहीं कहां ऊंग रहा है। यूनिफार्म का पता नहीं। किस खूंटे में लटकी-लटकी मैली हो रही है। सब कुछ उलटा-पुलटा है। रोजमर्रा का अनुशासन समाप्त-सा हो चुका है। अब महसूस हो रहा है कि जिंदगी में अनुशासन बहुत जरूरी है। घर में बैठे-बैठे मोटे होते जा रहे हैं। लेकिन फिर भी शुक्र है कि बच्चों की ऑनलाइन कक्षाएं चल रही हैं। शहरों में फिर भी ठीक है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ कहा नहीं जा सकता है कि सब ठीक चल रहा होगा।
हां, इस ऑनलाइन कक्षा ने मम्मियों को ज्यादा मुश्किल में डाल दिया है। बच्चे तो सुबह उठते नहीं। मम्मियां बेचारी लैपटॉप या मोबाइल लेकर पहले बैठ जाती हैं कि बच्चों को टीचर क्या काम दे रही है। कभी-कभी तो स्थिति ऐसी हो जाती है कि मम्मियों के एक हाथ में मोबाइल तो दूसरे हाथ में बच्चे का पैर है। बच्चे को बेड से खींचते हुए कहती है उठ जा तेरा स्कूल लग गया है। बच्चे भी कहते हैं मम्मी आप देख लो मैडम कौन-सा हमें देख रही हैं, मुझे थोड़ा सोने दो। अजीब स्थिति हो गई है। मम्मियां अब तो बच्चे की कभी मैथ टीचर, कभी हिन्दी टीचर तो कभी अंग्रेजी या साइंस टीचर का सबका किरदार निभा रही है। बच्चे को सारे विषय पढ़ा रही है। पहले तो स्टूडेंट बनकर ऑनलाइन टीचर को सुनती है फिर बच्चे की मास्टरनी बनकर पढ़ा रही है। स्कूल की चिंता बच्चों से ज्यादा मम्मियों को है। अब मम्मियां घर की मास्टरनी बन गयी हैं। वाकई मम्मियों का किरदार बढ़ गया है।
