जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व पर्यूषण है। सच कहूं तो कुछ समय पहले तक मैं भी इस पर्व के बारे में बहुत अधिक नहीं जानता था। लेकिन जब इसके अर्थ, उद्देश्य और संदेश को समझने का प्रयास किया, तो लगा कि यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर झांकने और स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है। आज के समय में जब हम बाहर की दुनिया को बदलने में लगे रहते हैं, पर्यूषण हमें अपने भीतर की दुनिया को देखने की प्रेरणा देता है।पर्यूषण का शाब्दिक अर्थ है—अपने भीतर लौटना, आत्मा के निकट जाना। यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि, तप, संयम और क्षमा-याचना का पर्व है। यूं कह सकते हैं कि यह वह समय है जब मनुष्य अपने अहंकार को थोड़ा किनारे रखकर स्वयं से प्रश्न करता है कि उसने वर्ष भर में क्या पाया और क्या खोया। उसने किन लोगों का दिल दुखाया, किन संबंधों में कटुता पैदा की और किन परिस्थितियों में अपने विवेक से समझौता किया।
पर्यूषण का सबसे बड़ा संदेश क्षमा है। इस पर्व के दौरान जैन समाज में क्षमावाणी का विशेष महत्व है। लोग एक-दूसरे से कहते हैं—“मिच्छामि दुक्कडम्”, अर्थात यदि मन, वचन या कर्म से मुझसे कोई भूल हुई हो तो मुझे क्षमा करें। यह केवल एक औपचारिक वाक्य नहीं है, बल्कि अपने भीतर झांकने और संबंधों को सुधारने का प्रयास है।
क्षमा मांगना जितना सरल सुनाई देता है, वास्तव में उतना ही कठिन है। अक्सर हमारा अहंकार हमें यह स्वीकार करने से रोकता है कि हमसे भी गलती हो सकती है। हम अपने पक्ष को सही साबित करने में लगे रहते हैं, लेकिन क्षमा मांगने का साहस हर किसी में नहीं होता। यह वही व्यक्ति कर सकता है जिसने अपने अहं को कुछ हद तक नियंत्रित कर लिया हो। इसलिए मुझे लगता है कि पर्यूषण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मनुष्य अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करे और विनम्रता को अपनाए।
यह पर्व श्वेतांबर जैन परंपरा में आठ दिनों तक मनाया जाता है, जबकि दिगंबर जैन परंपरा में इसी काल को दशलक्षण पर्व कहा जाता है, जो दस दिनों तक चलता है। दिगंबर परंपरा में प्रत्येक दिन धर्म के एक विशेष गुण या साधना को समर्पित होता है। ये दस साधनाएं हैं—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।
यदि इन दस गुणों को ध्यान से देखें तो महसूस होता है कि ये केवल किसी एक धर्म के अनुयायियों के लिए नहीं हैं, बल्कि हर मनुष्य के लिए उपयोगी जीवन-मूल्य हैं। क्षमा हमें क्रोध से मुक्त करती है। विनम्रता अहंकार को कम करती है। सरलता जीवन को सहज बनाती है। सत्य विश्वास पैदा करता है। संयम और तप हमें आत्मनियंत्रण सिखाते हैं। त्याग और अपरिग्रह हमें भौतिक वस्तुओं के मोह से दूर ले जाते हैं। ब्रह्मचर्य आत्मसंयम का मार्ग दिखाता है।
मैं स्वयं सनातन परंपरा से जुड़ा हूं, लेकिन मेरा मानना है कि अच्छी बात जहां से भी मिले, उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए। भारत की आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता भी यही है कि उसने सदैव अच्छे विचारों का सम्मान किया है। पर्यूषण का संदेश भी ऐसा ही है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की महानता उसके ज्ञान, धन या पद में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विनम्रता और क्षमा करने की क्षमता में निहित है।
आज समाज में तनाव बढ़ रहा है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है। रिश्तों में कटुता बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर लोग बिना सोचे-समझे एक-दूसरे पर कटाक्ष कर देते हैं। ऐसे समय में यदि हम वर्ष में केवल कुछ दिन भी आत्मचिंतन के लिए निकाल लें, अपने व्यवहार की समीक्षा कर लें और जिन लोगों को हमने दुख पहुंचाया है उनसे क्षमा मांग लें, तो शायद हमारा जीवन अधिक शांत और संतुलित हो सकता है।
मुझे लगता है कि पर्यूषण का वास्तविक महत्व इसी में है। यह केवल उपवास, पूजा या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है। यदि हम साल में इन आठ या दस दिनों के दौरान बताए गए गुणों पर गंभीरता से मनन करें और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें, तो निश्चित रूप से हमारे व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।
07 सितंबर, 2026
आत्मा के दरवाजे पर दस्तक
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