एक समय था जब बचपन का मतलब खुला आकाश, मिट्टी की सोंधी खुशबू, गली-मोहल्लों की रौनक और दोस्तों के साथ मैदान में घंटों खेलना होता था। बच्चों की दुनिया किताबों, कहानियों, खिलौनों और कल्पनाओं से भरी रहती थी। स्कूल के दिनों में कॉमिक्स, नंदन, सरिता और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं आपस में बदल-बदलकर पढ़ी जाती थीं। नई पत्रिका मिल जाना किसी खजाने के हाथ लगने जैसा लगता था। लेकिन आज के संदर्भ में यह सब लगभग समाप्त हो चुका है। किताबों और पत्रिकाओं की जगह अब बच्चों के हाथों में मोबाइल ने ले ली है।
मेरा प्रिय खेल क्रिकेट और बैडमिंटन रहा है। शाम होते ही घरों के आसपास के मैदान बच्चों की किलकारियों से गूंज उठते थे। खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि मित्रता, प्रतिस्पर्धा और जीवन के अनेक पाठ भी सिखाता था। लेकिन आज का दृश्य काफी बदल चुका है। बच्चे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। तकनीक के इस युग में मोबाइल फोन उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सुविधा और मनोरंजन का यह साधन धीरे-धीरे बचपन की सहजता और स्वाभाविकता को अपने भीतर समेटता जा रहा है।
आज घरों में अक्सर यह दृश्य देखने को मिल जाता है कि बच्चा रो रहा है तो उसे चुप कराने के लिए मोबाइल थमा दिया जाता है। खाना खिलाना हो, कुछ देर व्यस्त रखना हो या स्वयं को समय देना हो, मोबाइल सबसे आसान उपाय बन गया है। धीरे-धीरे यह आदत बच्चों के जीवन में इतनी गहराई तक प्रवेश कर जाती है कि वे वास्तविक दुनिया की अपेक्षा स्क्रीन की दुनिया में अधिक समय बिताने लगते हैं।
मोबाइल के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों के खेल-कूद की संस्कृति को सबसे अधिक प्रभावित किया है। कभी बच्चे कबड्डी, खो-खो, क्रिकेट, गिल्ली-डंडा और अनेक पारंपरिक खेल खेलते थे। इन खेलों से न केवल उनका शारीरिक विकास होता था, बल्कि टीम भावना, सहयोग और सामाजिक व्यवहार भी विकसित होता था। आज अधिकांश बच्चे मोबाइल गेम्स में व्यस्त रहते हैं। उनकी उंगलियां तो तेजी से चलती हैं, लेकिन उनके कदम मैदान की ओर कम ही बढ़ते हैं। परिणामस्वरूप शारीरिक गतिविधियां घट रही हैं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं।
मोबाइल ने बच्चों की कल्पनाशक्ति पर भी गहरा प्रभाव डाला है। पहले बच्चे कहानियां सुनते थे, चित्र बनाते थे और अपनी कल्पना से नई दुनिया रचते थे। अब तैयार वीडियो और त्वरित मनोरंजन उनकी सोच को सीमित करने लगे हैं। हर प्रश्न का उत्तर इंटरनेट पर उपलब्ध है, इसलिए खोजने, समझने और स्वयं प्रयोग करने की जिज्ञासा भी कहीं न कहीं कम होती जा रही है।
पहले यदि कागज से कोई खिलौना, नाव, हवाई जहाज या अन्य वस्तु बनानी होती थी, तो बच्चे घंटों माथापच्ची करते थे। कई बार असफल होते, फिर दोबारा प्रयास करते और अंततः कुछ नया सीखते थे। यही प्रक्रिया उनकी रचनात्मकता और समस्या-समाधान की क्षमता को विकसित करती थी। आज इंटरनेट पर हर चीज का तैयार तरीका उपलब्ध है। इससे सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन स्वयं सोचने, प्रयोग करने और सीखने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ती दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि व्यावहारिक अनुभव और रचनात्मक चिंतन धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।
एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन सामाजिक संबंधों में देखने को मिलता है। पहले बच्चे मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ खेलते, झगड़ते, रूठते और फिर मान भी जाते थे। इसी प्रक्रिया में वे जीवन के व्यावहारिक पाठ सीखते थे। आज उनकी मित्रता का बड़ा हिस्सा आभासी दुनिया तक सीमित होता जा रहा है। मोबाइल पर सैकड़ों मित्र हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में साथ बैठकर बातचीत करने वाले मित्रों की संख्या लगातार घट रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में मोबाइल के सकारात्मक पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। ज्ञान प्राप्त करने, नई चीजें सीखने और दुनिया से जुड़े रहने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। समस्या मोबाइल में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और अत्यधिक उपयोग में है। जब तकनीक सुविधा के बजाय लत का रूप लेने लगे, तब वह चिंता का विषय बन जाती है।
यदि वर्तमान स्थिति इसी प्रकार बनी रही, तो आने वाले समय में इसके दुष्परिणाम और अधिक स्पष्ट दिखाई देंगे। बच्चे साफ-सुथरे कमरों में बैठकर मोबाइल और नए-नए गैजेट्स चलाने में तो दक्ष हो जाएंगे, लेकिन शारीरिक गतिविधियों की कमी उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। मोटापा, आंखों की समस्याएं, तनाव और अन्य जीवनशैली संबंधी बीमारियां कम उम्र में ही उन्हें घेर सकती हैं। दवाइयों पर निर्भरता बढ़ेगी और स्वस्थ एवं सक्रिय जीवन एक चुनौती बन सकता है।
हालांकि अभी भी समय हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है। यदि हम बच्चों की ओर गंभीरता से ध्यान दें और स्वयं भी मोबाइल के मोह से कुछ दूरी बनाएं, तो स्थिति को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। बच्चों को खेल, पुस्तकें, रचनात्मक गतिविधियां और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करना होगा। आखिर बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं।
मोबाइल और तकनीक आधुनिक जीवन की आवश्यकता हैं, लेकिन इन्हें जीवन का केंद्र नहीं बनना चाहिए। बचपन की असली पहचान खुली हवा, खेल के मैदान, दोस्ती, जिज्ञासा और नए अनुभवों में है। यदि हम इन मूल्यों को बचाने में सफल रहे, तो आने वाली पीढ़ी तकनीक का उपयोग भी करेगी और जीवन का आनंद भी ले सकेगी। अन्यथा भविष्य की तस्वीर कैसी होगी, इसकी कल्पना मात्र से चिंता होने लगती है।