29 सितंबर, 2026

एआई के अगले सवाल का इंतज़ार

 

मुझे आज भी याद है, जब मैं स्कूल में पढ़ता था। अस्सी के दशक की बात है। उस उम्र में कॉमिक्स पढ़ने का अपना ही आनंद और रोमांच था। हाथ में कॉमिक्स की किताब आते ही जैसे एक दूसरी दुनिया खुल जाती थी। उन दिनों पढ़ी हुई बहुत-सी कॉमिक्स की कहानियां अब पूरी तरह याद नहीं हैं, लेकिन एक कहानी आज भी कहीं मन के कोने में अटकी हुई है। 
क हानी कुछ ऐसी थी कि वैज्ञानिकों ने एक रोबोटनुमा यंत्र बनाया था। उसका नाम था, ‘भारत’। शुरुआत में वह केवल एक मशीन था। वैज्ञानिक धीरे-धीरे उसकी समझ और क्षमताओं को विकसित करते गए। वे उसे नई-नई बातें सिखाते रहे और उसकी कार्यक्षमता बढ़ाते रहे। लेकिन एक दिन वही मशीन अपने निर्माताओं के सामने खड़ी हो गई। 
उसने कहा, अब मैं तुम्हारे नियंत्रण में नहीं हूं। मेरी समझ इतनी विकसित हो चुकी है कि अब तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तुम मेरे गुलाम बन जाओ। 
वैज्ञानिकों ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे। मशीन ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक शहर को बर्फ से जमा दिया। वैज्ञानिक देखते रह गए। फिर उसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को चुनौती दी कि या तो वे उसकी अधीनता स्वीकार करें, अथवा वह पूरी दुनिया को बर्फ से ढक देगा। और कहानी में आखिरकार वही हुआ, जिसका डर वैज्ञानिकों को था। 
उस समय यह सब केवल एक कल्पना लगती थी। एक ऐसी कहानी, जिसे पढ़कर रोमांच तो होता था, लेकिन कोई यह नहीं सोचता था कि कभी मशीनें सचमुच इंसान के सामने इतनी बड़ी चुनौती बन सकती हैं। 
आज उस पुरानी कॉमिक्स की कहानी याद आती है तो लगता है कि दुनिया एक अलग ही मोड़ पर खड़ी है। आज हमारे सामने रोबोट से ज्यादा शक्तिशाली चीज है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई। 
एआई ने हमारी जिंदगी में इतनी तेजी से प्रवेश किया है कि कुछ ही वर्षों में वह हमारे काम करने, लिखने, पढ़ने, सोचने और जानकारी हासिल करने के तरीके को बदलने लगा है। विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग, रक्षा और व्यापार, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जहां एआई की चर्चा न हो। 
सबसे बड़ा सवाल यही है कि एआई की यह यात्रा आखिर जाकर रुकेगी कहां? दुनिया भर के विशेषज्ञ एआई की तेजी से बढ़ती क्षमताओं को लेकर चर्चा कर रहे हैं। कुछ तकनीकी विशेषज्ञ चेतावनी देते रहे हैं कि यदि एआई का विकास और उपयोग पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना हुआ, तो भविष्य में गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि एआई के विकास की गति पर विचार किया जाना चाहिए। 
सवाल यह है कि क्या केवल इसकी गति धीमी कर देने से समस्या हल हो जाएगी? शायद नहीं। तकनीक एक बार दुनिया में आ जाए तो उसे पूरी तरह रोक पाना आसान नहीं होता। एक देश धीमा पड़ेगा तो संभव है दूसरा देश आगे बढ़ जाए। यही वजह है कि एआई को रोकने से ज्यादा जरूरी सवाल शायद यह है कि उसे सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से नियंत्रित कैसे किया जाए। 
आज कभी-कभी ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं कि एआई इंसान की सोच से आगे निकल रहा है। यह बात कितनी सही है, इसका निर्णय करना अभी जल्दबाजी होगा। एआई की क्षमताएं निश्चित रूप से तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन यह मान लेना कि एआई ने अपने भीतर मनुष्य जैसी स्वतंत्र चेतना विकसित कर ली है, अभी प्रमाणित तथ्य नहीं है। फिर भी चिंता का विषय कुछ और है। अगर आने वाले समय में एआई इतना शक्तिशाली हो गया कि वह मनुष्य के फैसलों को प्रभावित करने लगे, महत्वपूर्ण प्रणालियों को नियंत्रित करने लगे या उसके निर्देशों को इंसान के लिए समझना और रोकना कठिन हो जाए, तब क्या होगा? 
यहीं से वह पुरानी कॉमिक्स फिर याद आती है। तब ‘भारत’ नाम की मशीन ने अपने निर्माताओं से कहा था, अब मैं तुम्हारे नियंत्रण में नहीं हूं। आज की वास्तविक दुनिया में शायद हमें किसी मशीन के ऐसा कहने का इंतजार नहीं करना चाहिए। हमें उससे पहले ही सोचना होगा कि नियंत्रण की अंतिम चाबी किसके हाथ में रहेगी। एआई आज मानव सभ्यता की प्रगति का एक अद्भुत साधन है। इससे चिकित्सा में नई संभावनाएं खुल सकती हैं, शिक्षा आसान हो सकती है, वैज्ञानिक अनुसंधान की गति बढ़ सकती है और ऐसे काम संभव हो सकते हैं, जिनकी कुछ दशक पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन हर बड़ी शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। 
एआई के साथ भी शायद यही सबसे बड़ा सवाल है। मशीन कितनी बुद्धिमान होगी, यह सवाल महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उसकी बुद्धिमत्ता की दिशा कौन तय करेगा? 
दुनिया की सरकारों, वैज्ञानिकों और तकनीकी कंपनियों को इस प्रश्न पर अभी से गंभीरता से विचार करना होगा। एआई के लिए ऐसे नियम, सुरक्षा मानक और नियंत्रण व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो तकनीक की रफ्तार के साथ-साथ आगे बढ़ सके। क्योंकि भविष्य की चुनौती शायद यह नहीं होगी कि एआई कितना शक्तिशाली बन सकता है। चुनौती यह होगी कि इतनी शक्ति के बावजूद नियंत्रण इंसान के हाथ में कैसे बना रहे। कभी अस्सी के दशक की एक कॉमिक्स में ‘भारत’ नाम की मशीन ने पूरी दुनिया को बर्फ में बदलने की धमकी दी थी। तब वह सिर्फ कल्पना थी। आज हमारे पास उससे कहीं अधिक शक्तिशाली तकनीक है। इसलिए डरने से ज्यादा जरूरी है, समय रहते समझना, सावधान होना और तैयारी करना। अगर कभी वह दिन आया जब मशीन ने इंसान से पूछा, ‘अब बताओ, नियंत्रण किसके हाथ में है?’ 
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari  

27 सितंबर, 2026

शब्द एआई के, तो लेखक कौन?

 

कुछ साल पहले तक लिखना एक धीमी प्रक्रिया हुआ करती थी। कोई विचार मन में आता था, हम उसे कई बार सोचते थे, कागज पर उतारते थे, काटते थे, फिर लिखते थे। शब्दों को आकार देने में समय लगता था और शायद इसी प्रक्रिया में विचार भी धीरे-धीरे पकता था। मेहनत, समय, विचार और मनन-चिंतन के सम्मिश्रण से एक लेख तैयार होता था।
आज स्थिति बिल्कुल भिन्न है। विचार आया और हमने पूछा— ‘एआई, इस पर कुछ लिखो।’ कुछ ही क्षणों में एक व्यवस्थित, सधा हुआ लेख हमारे सामने होता है। भाषा सुंदर, वाक्य प्रभावशाली और तर्क क्रमबद्ध। लेकिन इसी सुविधा के बीच एक दुविधा भी धीरे-धीरे हमारे सामने खड़ी हो रही है—क्या एआई हमारी मदद कर रहा है या कहीं हमारी सोचने की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले रहा है? या फिर वह हमें चिंतन-मनन और सोच के बोझ से मुक्ति दिला रहा है?
मेरे विचार से एआई को समझने का पहला तरीका यही है कि उसे सुविधा माना जाए, सोच का विकल्प नहीं। एआई हमारे लिए जानकारी जुटा सकता है, विचारों को व्यवस्थित कर सकता है, किसी विषय के कई पहलू सामने रख सकता है और भाषा को बेहतर बना सकता है। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि किसी विषय को लेकर हमारे भीतर जो अनुभव, संवेदना, स्मृति और व्यक्तिगत दृष्टि पैदा होती है, वह अभी भी हमारी अपनी ही है। उदाहरण के लिए, एआई यह बता सकता है कि बारिश पर सुंदर लेख कैसे लिखा जाए। वह बारिश के वैज्ञानिक कारण समझा सकता है, कविता जैसी पंक्तियां बना सकता है और बारिश से जुड़े हजारों विचार सामने रख सकता है। लेकिन बचपन में पहली बारिश में भीगने का आपका अनुभव वह कहां से लाएगा? भीगते समय मन में उमड़े वे विचार, जिन्हें आपने स्वयं जिया है, वह कहां से लाएगा? वह आपकी मां के हाथों बनी चाय की खुशबू नहीं जानता। वह उस बरामदे को नहीं जानता, जहां बैठकर आपने किसी शाम बारिश देखी थी। लोहे की छत पर गिरती बारिश की बूंदों की वह आवाज वह नहीं सुन सकता, जो कभी आपके लिए किसी संगीत से कम नहीं रही होगी। वह उस व्यक्ति को नहीं जानता, जिसकी याद बारिश आते ही आपको बेचैन कर देती है। यही वह जगह है, जहां मनुष्य की रचनात्मकता शुरू होती है।
आज दुनिया में एआई और रचनात्मकता के रिश्ते पर गंभीर चर्चा हो रही है। सवाल उठ रहे हैं कि जब मशीन लेखन, चित्र, संगीत और दूसरी रचनात्मक सामग्री तैयार करने लगे तो लेखक की भूमिका क्या रह जाती है। यहीं दूसरा सवाल पैदा होता है—जब शब्द एआई लिखे और भाव मनुष्य का हो, तो रचनाकार कौन? यदि मैंने एआई से कहा कि किसी अमुक विषय पर एक हजार शब्द लिख दो और जो मिला, उसे बिना पढ़े प्रकाशित कर दिया, तो क्या उसमें मेरी रचनात्मक भागीदारी वास्तव में है? शायद बहुत कम। लेकिन यदि मैंने अपना अनुभव लिखा, अपना विचार तय किया, एआई से कुछ विकल्प लिए, उनमें से कुछ अस्वीकार किए, कुछ वाक्य बदले, अपनी स्मृतियां जोड़ीं, तथ्यों की जांच की और अंततः लेख को अपने हिसाब से आकार दिया—तो एआई वहां मेरे लिए लेखक नहीं, सहायक बन जाता है। यानी अंतर केवल इतना नहीं है कि लेख किसने लिखा। असली अंतर यह है कि लेख में सोच किसकी है, दृष्टि किसकी है और अंतिम निर्णय किसका है। एआई से भाषा सुधर सकती है, लेकिन दृष्टि हमें खुद विकसित करनी होगी।
एआई दस पैराग्राफ लिख सकता है, लेकिन उनमें से कौन-सा विचार हमारे अनुभव से जुड़ता है, कौन-सा हमारे पाठक से संवाद करता है और कौन-सा हमारे मन की बात कहता है—यह पहचानना हमें ही होगा। मैं एआई के विरोध में नहीं हूं। यह लेखक के लिए एक शानदार औजार हो सकता है। जैसे कैमरे ने फोटोग्राफर को खत्म नहीं किया, कंप्यूटर ने कलाकार को खत्म नहीं किया और इंटरनेट ने पत्रकारिता को समाप्त नहीं किया, वैसे ही एआई भी रचनात्मकता का अंत नहीं है। एक हथौड़ा घर भी बना सकता है और नुकसान भी कर सकता है। फर्क औजार में नहीं, उसे इस्तेमाल करने वाले हाथ में होता है। एआई के साथ भी यही बात लागू होती है।
हां, एक खतरा जरूर है—सुविधा कहीं हमारी आदत न बन जाए और आदत धीरे-धीरे हमारी क्षमता को कमजोर न कर दे। यदि हर विचार को विकसित करने के लिए हम एआई की ओर देखने लगें, हर वाक्य को सुंदर बनाने के लिए एआई पर निर्भर हो जाएं और हर लेख का ढांचा मशीन से बनवाने लगें, तो संभव है कि धीरे-धीरे हम खुद विचारों को विकसित करने की उस प्रक्रिया से दूर होते जाएं, जो कभी लेखन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी।
लेखन केवल शब्दों को क्रम में रखना नहीं है। लेखन विचारों के साथ कुछ समय बिताना भी है। कभी-कभी एक अच्छा विचार तुरंत नहीं आता। वह चुप्पी में आता है, किसी स्मृति से आता है, किसी अनुभव से निकलता है, किसी सवाल से टकराकर पैदा होता है। उसके लिए समय चाहिए, मनन चाहिए, कभी-कभी बेचैनी भी चाहिए। यदि एआई हमें उस बेचैनी से ही मुक्त कर दे तो सुविधा तो मिलेगी, लेकिन क्या रचनात्मकता भी उतनी ही बचेगी?
शायद आने वाले समय में लेखक की सबसे बड़ी पहचान यही होगी कि उसके लेख को पढ़कर पाठक कह सके—‘यह सिर्फ अच्छा लिखा हुआ लेख नहीं है, इसमें लेखक की अपनी आवाज सुनाई दे रही है।’ यही वह चीज है जिसे एआई हमारी मदद तो कर सकता है, लेकिन हमारी जगह पैदा नहीं कर सकता। हमने जीवन को जिस तरह जिया है, उसे हमारी जगह कोई और नहीं जी सकता। शायद लेखन की असली ताकत भी यही है—शब्दों में केवल सूचना नहीं, जीवन का अनुभव बोलता है।

 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

 

15 सितंबर, 2026

गणेश जी के साथ कुछ पल

 

 

गणेशोत्सव मूल रूप से महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों का एक प्रमुख लोकपर्व माना जाता रहा है। लेकिन समय के साथ इसका दायरा इतना बढ़ा है कि आज यह केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण भारत से लेकर पूर्वी और उत्तरी भारत के अनेक शहरों में भी गणेशोत्सव पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाने लगा है।
इसे देखादेखी कहें, धार्मिक संस्कृति का विस्तार कहें या फिर लोगों की आस्था का स्वाभाविक प्रसार, यह अलग-अलग दृष्टिकोण का विषय हो सकता है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ग्रहणशीलता रही है। सनातन परंपरा ने सदैव उन अच्छे विचारों, परंपराओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को अपनाया है, जिनसे समाज में सकारात्मकता और एकता का भाव बढ़ता हो।
शायद यही कारण है कि सनातन संस्कृति समय के साथ स्वयं को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालती रही है। इसमें जड़ता की अपेक्षा लचीलापन अधिक दिखाई देता है। गणेशोत्सव का देश के विभिन्न भागों में फैलना भी इसी सांस्कृतिक प्रवाह का एक उदाहरण माना जा सकता है। जब कोई परंपरा लोगों के मन को स्पर्श करती है, तो वह भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं रहती, बल्कि समाज के व्यापक हिस्से का उत्सव बन जाती है।
इस बार मुझे इस सांस्कृतिक विस्तार को बहुत करीब से देखने का अवसर मिला। हमारे पड़ोस में भी गणेशोत्सव की स्थापना की गई। पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ भगवान गणेश का स्वागत हुआ, विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई और उनकी प्रतिमा की प्रतिष्ठा की गई। दिलचस्प बात यह है कि यह परिवार न तो महाराष्ट्र का है और न ही मुंबई का मूल निवासी। वे उत्तर प्रदेश से हैं। हालांकि मेरे मित्र की धर्मपत्नी ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मुंबई में बिताया है और विवाह के बाद चंडीगढ़ आ गईं। संभवतः वहीं से यह परंपरा और गणेशोत्सव के प्रति विशेष लगाव उनके परिवार का हिस्सा बन गया।
इसी दौरान मुझे परिवार सहित गणेशोत्सव में विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। उनके घर जाकर इस उत्सव में शामिल होने का अवसर मिला। सच कहूँ तो वहाँ पहुँचकर जो वातावरण देखा, उसने मन को भीतर तक छू लिया। कमरे में विराजमान गणपति बप्पा की प्रतिमा को देखकर मन अनायास ही श्रद्धा से भर गया। वहां का वातावरण, पूजा की सुगंध और उपस्थित लोगों की आस्था मिलकर एक अलग ही आध्यात्मिक आभा का निर्माण कर रहे थे। ऐसा लगा मानो पूरा कमरा सकारात्मक ऊर्जा से भर गया हो।
यही तो हमारी सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। यहां त्योहार किसी एक क्षेत्र, भाषा या समुदाय तक सीमित नहीं रहते। जो परंपरा जहां अच्छी लगती है, उसे लोग अपनाते हैं और पूरे मन से उसका उत्सव मनाते हैं। गणेशोत्सव भी आज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामूहिक आनंद का प्रतीक बन चुका है।
शायद यही कारण है कि मुझे यह ब्लॉग लिखने की प्रेरणा मिली। मेरे लिए गणेशोत्सव केवल एक पर्व नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक है। यह हमें एक साथ बैठने, मिलने-जुलने और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने का अवसर देता है। विघ्नहर्ता गणेश से हर भक्त यही प्रार्थना करता है कि वे सभी के जीवन के संकट दूर करें और सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।
गणेशोत्सव का सबसे भावुक क्षण तब आता है, जब गणपति बप्पा की विदाई का समय होता है। मन में एक ओर बिछड़ने की कसक होती है तो दूसरी ओर यह विश्वास भी कि बप्पा फिर आएंगे। विदाई के समय श्रद्धालु यही प्रार्थना करते हैं कि वे जाते-जाते सभी विघ्न और परेशानियां अपने साथ ले जाएं तथा अगले वर्ष नई ऊर्जा, नई आशा और नई समृद्धि के साथ पुनः पधारें। यही आस्था, यही प्रतीक्षा और यही भावनात्मक जुड़ाव गणेशोत्सव को एक साधारण पर्व से कहीं अधिक विशेष बना देता है। 




12 सितंबर, 2026

दरवाज़े वही, संबंध धुंधले


कभी-कभी आसपास का माहौल देखकर मन अनायास ही अतीत की ओर लौट जाता है। तब महसूस होता है कि समय ने केवल साल ही नहीं बदले, बल्कि लोगों की सोच, रिश्तों की गर्माहट और जीवन जीने का तरीका भी बदल दिया है।

सत्तर और अस्सी के दशक में जन्मी पीढ़ी शायद अंतिम ऐसी पीढ़ी है, जिसने अपने बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ-साथ माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को भी पूरी निष्ठा से निभाया। इस पीढ़ी के लिए परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित नहीं था, बल्कि माता-पिता, रिश्तेदार और पड़ोसी भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

आज समय बदल चुका है। नई पीढ़ी की सोच और प्राथमिकताएं भी अलग हैं। उनके लिए करियर, व्यक्तिगत समय, मानसिक शांति और बेहतर जीवन-शैली अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि हर पीढ़ी अपने समय के अनुसार सोचती है। लेकिन इस बदलाव के बीच एक चीज जो सबसे ज्यादा महसूस होती है, वह है मानवीय संवेदनाओं का धीरे-धीरे कम होना।

मुझे याद है, पहले यदि मोहल्ले या पड़ोस में किसी के घर कोई परेशानी आ जाती थी, तो लोग बिना बुलाए उसके साथ खड़े हो जाते थे। दुख की घड़ी हो या खुशी का अवसर, पड़ोसी परिवार के सदस्य की तरह साथ निभाते थे। उनके दो शब्द— 'हम आपके साथ हैं—ही पीड़ित व्यक्ति को हिम्मत देने के लिए काफी होते थे। उस समय पड़ोसी केवल घर के बगल में रहने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सुख-दुख का साथी होता था।

लेकिन आज शहरों में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यदि किसी पड़ोसी के घर कोई समस्या हो जाए, तो अक्सर सुनने को मिलता है—'यह उनका निजी मामला है, हमें क्या लेना-देना?' कई बार मदद का भाव लेकर आगे बढ़ने वाले को भी जवाब मिल जाता है—'हम अपना मामला खुद संभाल लेंगे।' परिणाम यह है कि लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं।

सिर्फ लोगों का व्यवहार ही नहीं बदला, पड़ोस की परिभाषा भी बदल गई है। पहले घरों के दरवाजे और दिल दोनों खुले रहते थे। आज दरवाजों पर सुरक्षा ताले हैं और दिलों पर अनकही दूरी। कई बार वर्षों तक साथ रहने के बावजूद लोगों को अपने पड़ोसी का नाम तक पता नहीं होता।

आज जब आसपास देखता हूं तो यह बदलाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। मेरे पड़ोस में हाल ही में शादी हुई और नई बहू घर आई। पड़ोसी से रोज मुलाकात होती है, नमस्ते और हालचाल भी पूछे जाते हैं, लेकिन आज तक उन्होंने अपनी पत्नी से परिचय नहीं करवाया। यह कोई शिकायत नहीं, बल्कि बदलते समय की एक सच्चाई है। शायद लोग अब अपने निजी दायरे में ही रहना पसंद करते हैं। पहले नए सदस्य के आने पर पूरा पड़ोस उससे परिचित हो जाता था, जबकि आज लोग अपने घरों और कमरों तक सीमित होते जा रहे हैं। यही बात कभी-कभी मन को सोचने पर मजबूर कर देती है कि सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कहीं पीछे छूटती जा रही है।

नौकरी के सिलसिले में जब से शहर में आया हूं, तब से यह बदलाव लगातार देख रहा हूं। कई बार मन को यह सब अच्छा नहीं लगता। लगता है कि आधुनिकता और सुविधाओं की दौड़ में कहीं न कहीं अपनापन पीछे छूटता जा रहा है। दुख-सुख में साथ खड़े होने की भावना कमजोर पड़ रही है और स्वार्थ धीरे-धीरे रिश्तों पर हावी होता जा रहा है।

फिर भी यह समय का सच है। हमें इसके साथ चलना पड़ता है। कई बार यदि आप किसी के मामले में दिलचस्पी दिखाएं या सहायता का हाथ बढ़ाएं, तो लोग आपको ही अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाला समझ लेते हैं। ऐसे में मन चाहे या न चाहे, लोग अपने-अपने दायरे में सिमटने लगते हैं।

फिर भी मेरा मानना है कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए बहुत बड़े प्रयासों की जरूरत नहीं होती। यदि हम अपने आसपास के लोगों के प्रति थोड़ी संवेदना, थोड़ा अपनापन और थोड़ा सहयोग बनाए रखें, तो समाज कहीं अधिक मानवीय बन सकता है। आखिर रिश्तों की गर्माहट ही वह चीज़ है, जो किसी भी आधुनिक सुविधा से कहीं अधिक मूल्यवान होती है।


07 सितंबर, 2026

आत्मा के दरवाजे पर दस्तक


 

जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व पर्यूषण है। सच कहूं तो कुछ समय पहले तक मैं भी इस पर्व के बारे में बहुत अधिक नहीं जानता था। लेकिन जब इसके अर्थ, उद्देश्य और संदेश को समझने का प्रयास किया, तो लगा कि यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर झांकने और स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है। आज के समय में जब हम बाहर की दुनिया को बदलने में लगे रहते हैं, पर्यूषण हमें अपने भीतर की दुनिया को देखने की प्रेरणा देता है।

पर्यूषण का शाब्दिक अर्थ है—अपने भीतर लौटना, आत्मा के निकट जाना। यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि, तप, संयम और क्षमा-याचना का पर्व है। यूं कह सकते हैं कि यह वह समय है जब मनुष्य अपने अहंकार को थोड़ा किनारे रखकर स्वयं से प्रश्न करता है कि उसने वर्ष भर में क्या पाया और क्या खोया। उसने किन लोगों का दिल दुखाया, किन संबंधों में कटुता पैदा की और किन परिस्थितियों में अपने विवेक से समझौता किया।

पर्यूषण का सबसे बड़ा संदेश क्षमा है। इस पर्व के दौरान जैन समाज में क्षमावाणी का विशेष महत्व है। लोग एक-दूसरे से कहते हैं—“मिच्छामि दुक्कडम्”, अर्थात यदि मन, वचन या कर्म से मुझसे कोई भूल हुई हो तो मुझे क्षमा करें। यह केवल एक औपचारिक वाक्य नहीं है, बल्कि अपने भीतर झांकने और संबंधों को सुधारने का प्रयास है।

क्षमा मांगना जितना सरल सुनाई देता है, वास्तव में उतना ही कठिन है। अक्सर हमारा अहंकार हमें यह स्वीकार करने से रोकता है कि हमसे भी गलती हो सकती है। हम अपने पक्ष को सही साबित करने में लगे रहते हैं, लेकिन क्षमा मांगने का साहस हर किसी में नहीं होता। यह वही व्यक्ति कर सकता है जिसने अपने अहं को कुछ हद तक नियंत्रित कर लिया हो। इसलिए मुझे लगता है कि पर्यूषण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मनुष्य अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करे और विनम्रता को अपनाए।

यह पर्व श्वेतांबर जैन परंपरा में आठ दिनों तक मनाया जाता है, जबकि दिगंबर जैन परंपरा में इसी काल को दशलक्षण पर्व कहा जाता है, जो दस दिनों तक चलता है। दिगंबर परंपरा में प्रत्येक दिन धर्म के एक विशेष गुण या साधना को समर्पित होता है। ये दस साधनाएं हैं—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।

यदि इन दस गुणों को ध्यान से देखें तो महसूस होता है कि ये केवल किसी एक धर्म के अनुयायियों के लिए नहीं हैं, बल्कि हर मनुष्य के लिए उपयोगी जीवन-मूल्य हैं। क्षमा हमें क्रोध से मुक्त करती है। विनम्रता अहंकार को कम करती है। सरलता जीवन को सहज बनाती है। सत्य विश्वास पैदा करता है। संयम और तप हमें आत्मनियंत्रण सिखाते हैं। त्याग और अपरिग्रह हमें भौतिक वस्तुओं के मोह से दूर ले जाते हैं। ब्रह्मचर्य आत्मसंयम का मार्ग दिखाता है।

मैं स्वयं सनातन परंपरा से जुड़ा हूं, लेकिन मेरा मानना है कि अच्छी बात जहां से भी मिले, उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए। भारत की आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता भी यही है कि उसने सदैव अच्छे विचारों का सम्मान किया है। पर्यूषण का संदेश भी ऐसा ही है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की महानता उसके ज्ञान, धन या पद में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विनम्रता और क्षमा करने की क्षमता में निहित है।

आज समाज में तनाव बढ़ रहा है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है। रिश्तों में कटुता बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर लोग बिना सोचे-समझे एक-दूसरे पर कटाक्ष कर देते हैं। ऐसे समय में यदि हम वर्ष में केवल कुछ दिन भी आत्मचिंतन के लिए निकाल लें, अपने व्यवहार की समीक्षा कर लें और जिन लोगों को हमने दुख पहुंचाया है उनसे क्षमा मांग लें, तो शायद हमारा जीवन अधिक शांत और संतुलित हो सकता है।

मुझे लगता है कि पर्यूषण का वास्तविक महत्व इसी में है। यह केवल उपवास, पूजा या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है। यदि हम साल में इन आठ या दस दिनों के दौरान बताए गए गुणों पर गंभीरता से मनन करें और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें, तो निश्चित रूप से हमारे व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।


04 सितंबर, 2026

बचपन अब मैदान में नहीं मिलता



एक समय था जब बचपन का मतलब खुला आकाश, मिट्टी की सोंधी खुशबू, गली-मोहल्लों की रौनक और दोस्तों के साथ मैदान में घंटों खेलना होता था। बच्चों की दुनिया किताबों, कहानियों, खिलौनों और कल्पनाओं से भरी रहती थी। स्कूल के दिनों में कॉमिक्स, नंदन, सरिता और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं आपस में बदल-बदलकर पढ़ी जाती थीं। नई पत्रिका मिल जाना किसी खजाने के हाथ लगने जैसा लगता था। लेकिन आज के संदर्भ में यह सब लगभग समाप्त हो चुका है। किताबों और पत्रिकाओं की जगह अब बच्चों के हाथों में मोबाइल ने ले ली है।

मेरा प्रिय खेल क्रिकेट और बैडमिंटन रहा है। शाम होते ही घरों के आसपास के मैदान बच्चों की किलकारियों से गूंज उठते थे। खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि मित्रता, प्रतिस्पर्धा और जीवन के अनेक पाठ भी सिखाता था। लेकिन आज का दृश्य काफी बदल चुका है। बच्चे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। तकनीक के इस युग में मोबाइल फोन उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सुविधा और मनोरंजन का यह साधन धीरे-धीरे बचपन की सहजता और स्वाभाविकता को अपने भीतर समेटता जा रहा है।

आज घरों में अक्सर यह दृश्य देखने को मिल जाता है कि बच्चा रो रहा है तो उसे चुप कराने के लिए मोबाइल थमा दिया जाता है। खाना खिलाना हो, कुछ देर व्यस्त रखना हो या स्वयं को समय देना हो, मोबाइल सबसे आसान उपाय बन गया है। धीरे-धीरे यह आदत बच्चों के जीवन में इतनी गहराई तक प्रवेश कर जाती है कि वे वास्तविक दुनिया की अपेक्षा स्क्रीन की दुनिया में अधिक समय बिताने लगते हैं।

मोबाइल के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों के खेल-कूद की संस्कृति को सबसे अधिक प्रभावित किया है। कभी बच्चे कबड्डी, खो-खो, क्रिकेट, गिल्ली-डंडा और अनेक पारंपरिक खेल खेलते थे। इन खेलों से न केवल उनका शारीरिक विकास होता था, बल्कि टीम भावना, सहयोग और सामाजिक व्यवहार भी विकसित होता था। आज अधिकांश बच्चे मोबाइल गेम्स में व्यस्त रहते हैं। उनकी उंगलियां तो तेजी से चलती हैं, लेकिन उनके कदम मैदान की ओर कम ही बढ़ते हैं। परिणामस्वरूप शारीरिक गतिविधियां घट रही हैं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं।

मोबाइल ने बच्चों की कल्पनाशक्ति पर भी गहरा प्रभाव डाला है। पहले बच्चे कहानियां सुनते थे, चित्र बनाते थे और अपनी कल्पना से नई दुनिया रचते थे। अब तैयार वीडियो और त्वरित मनोरंजन उनकी सोच को सीमित करने लगे हैं। हर प्रश्न का उत्तर इंटरनेट पर उपलब्ध है, इसलिए खोजने, समझने और स्वयं प्रयोग करने की जिज्ञासा भी कहीं न कहीं कम होती जा रही है।

पहले यदि कागज से कोई खिलौना, नाव, हवाई जहाज या अन्य वस्तु बनानी होती थी, तो बच्चे घंटों माथापच्ची करते थे। कई बार असफल होते, फिर दोबारा प्रयास करते और अंततः कुछ नया सीखते थे। यही प्रक्रिया उनकी रचनात्मकता और समस्या-समाधान की क्षमता को विकसित करती थी। आज इंटरनेट पर हर चीज का तैयार तरीका उपलब्ध है। इससे सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन स्वयं सोचने, प्रयोग करने और सीखने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ती दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि व्यावहारिक अनुभव और रचनात्मक चिंतन धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।

एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन सामाजिक संबंधों में देखने को मिलता है। पहले बच्चे मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ खेलते, झगड़ते, रूठते और फिर मान भी जाते थे। इसी प्रक्रिया में वे जीवन के व्यावहारिक पाठ सीखते थे। आज उनकी मित्रता का बड़ा हिस्सा आभासी दुनिया तक सीमित होता जा रहा है। मोबाइल पर सैकड़ों मित्र हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में साथ बैठकर बातचीत करने वाले मित्रों की संख्या लगातार घट रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में मोबाइल के सकारात्मक पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। ज्ञान प्राप्त करने, नई चीजें सीखने और दुनिया से जुड़े रहने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। समस्या मोबाइल में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और अत्यधिक उपयोग में है। जब तकनीक सुविधा के बजाय लत का रूप लेने लगे, तब वह चिंता का विषय बन जाती है।

यदि वर्तमान स्थिति इसी प्रकार बनी रही, तो आने वाले समय में इसके दुष्परिणाम और अधिक स्पष्ट दिखाई देंगे। बच्चे साफ-सुथरे कमरों में बैठकर मोबाइल और नए-नए गैजेट्स चलाने में तो दक्ष हो जाएंगे, लेकिन शारीरिक गतिविधियों की कमी उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। मोटापा, आंखों की समस्याएं, तनाव और अन्य जीवनशैली संबंधी बीमारियां कम उम्र में ही उन्हें घेर सकती हैं। दवाइयों पर निर्भरता बढ़ेगी और स्वस्थ एवं सक्रिय जीवन एक चुनौती बन सकता है।

हालांकि अभी भी समय हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है। यदि हम बच्चों की ओर गंभीरता से ध्यान दें और स्वयं भी मोबाइल के मोह से कुछ दूरी बनाएं, तो स्थिति को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। बच्चों को खेल, पुस्तकें, रचनात्मक गतिविधियां और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करना होगा। आखिर बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं।

मोबाइल और तकनीक आधुनिक जीवन की आवश्यकता हैं, लेकिन इन्हें जीवन का केंद्र नहीं बनना चाहिए। बचपन की असली पहचान खुली हवा, खेल के मैदान, दोस्ती, जिज्ञासा और नए अनुभवों में है। यदि हम इन मूल्यों को बचाने में सफल रहे, तो आने वाली पीढ़ी तकनीक का उपयोग भी करेगी और जीवन का आनंद भी ले सकेगी। अन्यथा भविष्य की तस्वीर कैसी होगी, इसकी कल्पना मात्र से चिंता होने लगती है।

02 सितंबर, 2026

जन्माष्टमी : यादों में बसी एक रात

 

जन्माष्टमी आते ही बचपन की अनेक यादें मन में ताजा हो जाती हैं। वह समय कुछ और ही था। त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते थे, बल्कि पूरे समाज की धड़कन बन जाते थे। जन्माष्टमी भी ऐसा ही एक पर्व था, जिसका इंतजार बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को रहता था। आज भी जन्माष्टमी पूरे उत्साह से मनाई जाती है, लेकिन इसे मनाने का तरीका, माहौल और भावनाएं काफी हद तक बदल गई हैं।
पहले जन्माष्टमी की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती थीं। घरों की साफ-सफाई होती थी, मंदिरों को सजाया जाता था और बच्चे उत्साह के साथ झांकियां बनाने में जुट जाते थे। उस समय न तो सोशल मीडिया था और न ही मोबाइल कैमरे। इसलिए त्योहार को दिखाने से ज्यादा उसे जीने पर जोर होता था।
मुझे याद है, जन्माष्टमी पर लोग अपने घरों से सेब, केला, नाशपाती, बाथू की खीर या बाथूदाना लेकर मंदिर पहुंचते थे। रात बारह बजे कृष्ण जन्मोत्सव के बाद भक्तों में बांटने के लिए सभी फलों को एक बड़े बर्तन में काटकर तैयार किया जाता था। उस सामूहिक तैयारी में जो अपनापन और उत्साह होता था, वह अपने आप में एक उत्सव जैसा लगता था।
बच्चों के लिए जन्माष्टमी किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। कोई कृष्ण बनता था तो कोई राधा। छोटे-छोटे बच्चों को सजाकर मंदिर ले जाया जाता था। मोहल्ले के लोग उन्हें देखकर प्रसन्न होते थे और उनका उत्साह बढ़ाते थे। उस समय प्रतियोगिता कम और अपनापन अधिक होता था।
मंदिरों में कृष्ण जन्म की झांकी के साथ एक छोटी-सी जेल भी बनाई जाती थी, जहां भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का दृश्य दिखाया जाता था। आज की तरह भव्य सजावट नहीं होती थी, लेकिन उस सादगी और सौम्यता में एक अलग ही आनंद छिपा होता था। बच्चे बड़ी उत्सुकता से इन झांकियों को देखते और बड़े श्रद्धाभाव से उनकी कथा सुनते थे।
मंदिरों में भजन-कीर्तन होते थे और लोग घंटों बैठकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं सुनते थे। रात्रि के बारह बजते ही शंख, घंटियों और जयघोष के बीच श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता था। पूरा वातावरण 'जय कन्हैया लाल की' के उद्घोष से गूंज उठता था। उस क्षण का आनंद शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
पूजा-अर्चना और आरती के बाद सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता था। प्रसाद लेकर लोग अपने-अपने घर लौटते थे। वहां घर में बने प्रसाद का भोग लगाया जाता और पूरा परिवार एक साथ बैठकर उसे ग्रहण करता था। उस समय केवल प्रसाद का स्वाद ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के साथ जुड़ाव का सुख भी मिलता था।
आज जन्माष्टमी का स्वरूप काफी बदल गया है। सोशल मीडिया ने इस पर्व को नया रूप दे दिया है। पहले लोग मंदिर जाकर दर्शन करते थे, अब कई लोग मोबाइल स्क्रीन पर लाइव दर्शन कर लेते हैं। पहले शुभकामनियां मिलने-जुलने से दी जाती थीं, आज एक संदेश सैकड़ों लोगों तक एक साथ पहुंच जाता है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन व्यक्तिगत संपर्क कहीं न कहीं कम हुआ है।
हालांकि आधुनिक समय के सभी बदलाव नकारात्मक नहीं हैं। तकनीक ने जन्माष्टमी के संदेश को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का काम किया है। आज कोई भी व्यक्ति घर बैठे वृंदावन और मथुरा के मंदिरों के दर्शन कर सकता है। बड़े स्तर पर होने वाले आयोजन अधिक लोगों को जोड़ने में सफल होते हैं। युवा पीढ़ी भी विभिन्न माध्यमों से श्रीकृष्ण के जीवन और शिक्षाओं के बारे में जान रही है।
फिर भी, जब पुरानी जन्माष्टमी की यादें सामने आती हैं तो मन में एक अलग ही भाव जाग उठता है। मिट्टी की सोंधी खुशबू, मंदिरों में गूंजते भजन, घरों में बनता प्रसाद, झांकियां सजाते बच्चे और आधी रात तक जागकर श्रीकृष्ण जन्म की प्रतीक्षा करना—इन सबमें एक ऐसी आत्मीयता थी जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
शायद यही कारण है कि आज की भव्यता के बीच भी मन कभी-कभी उस सादगी को खोजता है। वह सादगी, जिसमें दिखावे से अधिक भक्ति थी; आयोजन से अधिक अपनापन था; और आधुनिक साधनों से अधिक मन की श्रद्धा थी।
समय बदलता है और उसके साथ त्योहार मनाने के तरीके भी बदलते हैं। परिवर्तन जीवन का नियम है और उसे रोका नहीं जा सकता। लेकिन यदि आधुनिकता के साथ हम अपनी परंपराओं की आत्मा को भी जीवित रख सकें, तो जन्माष्टमी का वास्तविक आनंद बना रहेगा। आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने भी हमें यही सिखाया था कि परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन मूल मूल्य और आस्था कभी नहीं बदलनी चाहिए।
आज की जन्माष्टमी अधिक भव्य हो सकती है, अधिक आधुनिक हो सकती है, लेकिन पुरानी जन्माष्टमी की यादें आज भी मन के किसी कोने में उसी तरह जीवित हैं। शायद इसलिए जब भी जन्माष्टमी आती है, मन अनायास ही उन दिनों में लौट जाता है, जब भक्ति में सादगी थी और सादगी में ही उत्सव की सबसे बड़ी सुंदरता छिपी हुई थी।

01 सितंबर, 2026

वो सादगी वाला टीचर डे

बचपन में जब हम स्कूल में शिक्षक दिवस मनाते थे, तब उसके वास्तविक महत्व को शायद उतना नहीं समझ पाते थे। हमारे लिए तो शिक्षक दिवस का सबसे बड़ा आकर्षण यही होता था कि उस दिन शिक्षक कक्षा में पढ़ाने नहीं आते थे। स्कूल का पूरा माहौल सामान्य दिनों से अलग और उत्साह से भरा होता था।

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स समय शिक्षक दिवस का आयोजन आज की तरह भव्य नहीं होता था, लेकिन उसमें एक अलग ही आत्मीयता और अपनापन होता था। स्कूल का मॉनिटर विभिन्न जिम्मेदारियां  छात्रों में बांट देता था। अनुशासन बनाए रखने से लेकर छोटी-बड़ी व्यवस्थाओं तक, सब कुछ विद्यार्थी स्वयं संभालते थे। विशेष रूप से नौवीं और दसवीं कक्षा के वरिष्ठ छात्र उस दिन शिक्षकों की भूमिका निभाते हुए पूरे विद्यालय का संचालन करते थे। उन्हें देखकर लगता था मानो वे सचमुच विद्यालय के शिक्षक बन गए हों।

शिक्षक दिवस के अवसर पर छात्र अपने शिक्षकों के सम्मान में कविताएं  सुनाते, निबंध पढ़ते और छोटे-छोटे सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं होता था, बल्कि अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना भी होता था।

उस दौर में संसाधन सीमित थे। न बड़े मंच होते थे, न अत्याधुनिक सजावट और न ही दिखावे की कोई होड़। फिर भी उन आयोजनों में जो आत्मीयता, सादगी और भावनात्मक जुड़ाव होता था, वह आज भी स्मृतियों में ताज़ा है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने, उनका भविष्य संवारने और उनके व्यक्तित्व को निखारने के लिए सदैव उत्सुक रहते थे। वहीं विद्यार्थी भी अपने शिक्षकों के प्रति मन में गहरा सम्मान और अपनापन रखते थे।

समय के साथ शिक्षक दिवस मनाने के तरीके भी बदल गए हैं। आज विद्यालयों में बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं। आकर्षक मंच सज्जा, प्रतियोगिताएं, प्रस्तुतियां  और विभिन्न गतिविधियां  इस दिन को विशेष बना देती हैं। यह बदलाव अपने आप में बुरा नहीं है, क्योंकि हर युग की अपनी आवश्यकताएं  और अपनी अभिव्यक्तियां  होती हैं। फिर भी कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि सादगी की जगह प्रदर्शन ने कुछ अधिक स्थान ले लिया है। कई बार कार्यक्रमों का मूल्यांकन अंक, पुरस्कार और प्रदर्शन के आधार पर होने लगता है। जो बच्चा अधिक प्रभावशाली प्रस्तुति देता है, उसे अधिक सराहना मिलती है। ऐसे में अनायास ही उन दिनों की याद आ जाती है जब शिक्षक दिवस का केंद्र केवल सम्मान, कृतज्ञता और आत्मीयता हुआ करता था।

यह कहना उचित नहीं होगा कि आज के सभी शिक्षक या सभी विद्यालय ऐसे हैं। आज भी अनेक शिक्षक पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। लेकिन पुराने समय में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच जो पारिवारिक संबंध दिखाई देते थे, उनकी अनुभूति कुछ अलग ही थी। उस समय अधिकांश शिक्षकों के लिए सभी बच्चे समान होते थे। न कोई बड़ा, न कोई छोटा, न किसी प्रकार का भेदभाव। प्रत्येक विद्यार्थी उनके लिए अपने ही बच्चों के समान था।

शिक्षक केवल अपनी नौकरी या वेतन तक सीमित नहीं रहते थे। वे विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर उतने ही चिंतित रहते थे, जितना कोई अभिभावक अपने बच्चे के लिए होता है। उनकी इच्छा होती थी कि उनके विद्यार्थी जीवन में आगे बढ़ें, सफल हों और अपने साथ-साथ अपने शिक्षकों तथा विद्यालय का नाम भी रोशन करें। यही भावना उन्हें एक साधारण कर्मचारी से कहीं ऊपर उठाकर सच्चा गुरु बनाती थी। निश्चित रूप से आज भी ऐसे समर्पित शिक्षक मौजूद हैं और शिक्षा जगत उनकी वजह से ही अपनी गरिमा बनाए हुए है। हां, समय बदल गया है, परिस्थितियां  बदल गई हैं और संबंधों की अभिव्यक्ति के तरीके भी बदल गए हैं। शायद इसी का नाम जीवन है। 

फिर भी शिक्षक दिवस की सबसे सुंदर बात आज भी वही है जो पहले हुआ करती थी—बच्चों का निष्कलुष प्रेम और अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान। बच्चे जो भी करते हैं, चाहे वह एक छोटा-सा कार्ड हो, एक कविता हो, एक सांस्कृतिक प्रस्तुति हो या मंच से बोले गए कुछ शब्द, वे उसे पूरी ईमानदारी और सच्चे मन से करते हैं। यही भावना इस दिवस को विशेष बनाती है।

मेरे लिए शिक्षक दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि उन दिनों की मधुर स्मृतियों को याद करने का अवसर है, जब सीमित साधनों के बीच भी रिश्तों की गर्माहट असीमित हुआ करती थी। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास, सम्मान और स्नेह का संबंध कभी पुराना नहीं होता। 

शिक्षक दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उन सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है जिन्होंने हमारे जीवन को दिशा दी, हमें बेहतर इंसान बनाया और आगे बढ़ने का साहस दिया।