‘यार … ओके (OK) पर क्लिक कर। अरे बुद्धू तेरे को समझ नहीं आती। मैं क्या कह रहा हूं।’ मां पास आकर बच्चे को समझाती है। ‘बेटा आराम से समझा, उसे नहीं समझ आ रही होगी। अब तेरी तरह एक्सपर्ट थोड़े ही है।’ उत्तर में बच्चा मां से कहता है, ‘मम्मी मैं दोस्त को कब से समझा रहा हूं समझता ही नहीं है। कैसे एप में ज्वाइन होना है।’
पड़ोस में एक बच्चे की बातें सुनकर मुझे हंसी भी आयी और मैं उसकी इन बातों का मजा भी ले रहा था। सोचने लगा कि कोरोना ने आज सबको डिजिटल करने की सोच रखी है। हमें तो कोरोना का अहसानमंद होना पड़ेगा कि जो काम मोदी सरकार इतना जोर देकर नहीं कर पायी, कोरोना ने एक झटके में करा दिया।
खैर, ये बातें हर परिवार में किसी न किसी के साथ जरूर हो रही होंगी। वैसे भी हम सबकी आदत है जब तक सिर पर नहीं पड़ती कोई काम जल्दी से करते ही नहीं। कोरोना क्या आया, सबको घर पर बैठने को मजबूर कर दिया। अगर इसके नकारात्मक रूप को छोड़ दें और सकारात्मक पक्ष को देखें तो इसने सबको डिजिटल कर दिया है। स्कूल, ऑफिस डिजिटल हो गये। घर से काम हो रहा है। ऑन-लाइन शॉपिंग को तरजीह दी जा रही है। स्कूल-कॉलेज अब ऑन-लाइन चल रहे हैं। परिवार में मम्मी-पापा, दादा-दादी, बच्चे सबको मोबाइल की जरूरत आन पड़ी है। परिवार डिज़िटल हो रहा है न!
यहां तक तो ठीक है लेकिन हद तो तब हो गई जब कोरोना के चक्कर में, घर बैठे हैं तो अपना समय पास करने के लिए कोई कवि-कवियत्री बन गया। कोई लेखक तो कोई कहानीकार। कोई कंप्यूटर सीख रहा है तो कोई लैपटॉप में टाइप करने को आतुर है। कोई समाचारपत्रों में अपने लेख भेज रहा है। अब क्या करें जब कोरोना ने घर बैठने पर मजबूर कर दिया तो उसने कल्पनाओं के पंख भी दे दिये हैं। कोई अपनी भावनाएं कविताओं के माध्यम से कॉपी में उड़ेल रहा है तो कोई कल्पनाओं की दुनिया में खोकर कहानियां लिख रहा है। सब कुछ न कुछ करना चाह रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी का नया सफर शुरू जो हो गया है।
बहरहाल, कोरोना ने ये अच्छे काम तो किये, लेकिन घर के मुखिया के साथ कुछ ज्यादा ज्यादती कर दी है। उसकी जेब ढीली करवाने की ‘कोरोना’ ने सोच रखी है। अब परिवार में किसी को मोबाइल चाहिए तो किसी को नया लैपटॉप, तो सबको नेट भी चाहिए। यह तो होना ही था…बेचारा… मुखिया क्या करे…! यही कह सकता है स्वस्थ रहें, खुश रहें…
खैर, ये बातें हर परिवार में किसी न किसी के साथ जरूर हो रही होंगी। वैसे भी हम सबकी आदत है जब तक सिर पर नहीं पड़ती कोई काम जल्दी से करते ही नहीं। कोरोना क्या आया, सबको घर पर बैठने को मजबूर कर दिया। अगर इसके नकारात्मक रूप को छोड़ दें और सकारात्मक पक्ष को देखें तो इसने सबको डिजिटल कर दिया है। स्कूल, ऑफिस डिजिटल हो गये। घर से काम हो रहा है। ऑन-लाइन शॉपिंग को तरजीह दी जा रही है। स्कूल-कॉलेज अब ऑन-लाइन चल रहे हैं। परिवार में मम्मी-पापा, दादा-दादी, बच्चे सबको मोबाइल की जरूरत आन पड़ी है। परिवार डिज़िटल हो रहा है न!
यहां तक तो ठीक है लेकिन हद तो तब हो गई जब कोरोना के चक्कर में, घर बैठे हैं तो अपना समय पास करने के लिए कोई कवि-कवियत्री बन गया। कोई लेखक तो कोई कहानीकार। कोई कंप्यूटर सीख रहा है तो कोई लैपटॉप में टाइप करने को आतुर है। कोई समाचारपत्रों में अपने लेख भेज रहा है। अब क्या करें जब कोरोना ने घर बैठने पर मजबूर कर दिया तो उसने कल्पनाओं के पंख भी दे दिये हैं। कोई अपनी भावनाएं कविताओं के माध्यम से कॉपी में उड़ेल रहा है तो कोई कल्पनाओं की दुनिया में खोकर कहानियां लिख रहा है। सब कुछ न कुछ करना चाह रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी का नया सफर शुरू जो हो गया है।
बहरहाल, कोरोना ने ये अच्छे काम तो किये, लेकिन घर के मुखिया के साथ कुछ ज्यादा ज्यादती कर दी है। उसकी जेब ढीली करवाने की ‘कोरोना’ ने सोच रखी है। अब परिवार में किसी को मोबाइल चाहिए तो किसी को नया लैपटॉप, तो सबको नेट भी चाहिए। यह तो होना ही था…बेचारा… मुखिया क्या करे…! यही कह सकता है स्वस्थ रहें, खुश रहें…
