02 सितंबर, 2026

जन्माष्टमी : यादों में बसी एक रात

 

जन्माष्टमी आते ही बचपन की अनेक यादें मन में ताजा हो जाती हैं। वह समय कुछ और ही था। त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते थे, बल्कि पूरे समाज की धड़कन बन जाते थे। जन्माष्टमी भी ऐसा ही एक पर्व था, जिसका इंतजार बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को रहता था। आज भी जन्माष्टमी पूरे उत्साह से मनाई जाती है, लेकिन इसे मनाने का तरीका, माहौल और भावनाएं काफी हद तक बदल गई हैं।
पहले जन्माष्टमी की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती थीं। घरों की साफ-सफाई होती थी, मंदिरों को सजाया जाता था और बच्चे उत्साह के साथ झांकियां बनाने में जुट जाते थे। उस समय न तो सोशल मीडिया था और न ही मोबाइल कैमरे। इसलिए त्योहार को दिखाने से ज्यादा उसे जीने पर जोर होता था।
मुझे याद है, जन्माष्टमी पर लोग अपने घरों से सेब, केला, नाशपाती, बाथू की खीर या बाथूदाना लेकर मंदिर पहुंचते थे। रात बारह बजे कृष्ण जन्मोत्सव के बाद भक्तों में बांटने के लिए सभी फलों को एक बड़े बर्तन में काटकर तैयार किया जाता था। उस सामूहिक तैयारी में जो अपनापन और उत्साह होता था, वह अपने आप में एक उत्सव जैसा लगता था।
बच्चों के लिए जन्माष्टमी किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। कोई कृष्ण बनता था तो कोई राधा। छोटे-छोटे बच्चों को सजाकर मंदिर ले जाया जाता था। मोहल्ले के लोग उन्हें देखकर प्रसन्न होते थे और उनका उत्साह बढ़ाते थे। उस समय प्रतियोगिता कम और अपनापन अधिक होता था।
मंदिरों में कृष्ण जन्म की झांकी के साथ एक छोटी-सी जेल भी बनाई जाती थी, जहां भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का दृश्य दिखाया जाता था। आज की तरह भव्य सजावट नहीं होती थी, लेकिन उस सादगी और सौम्यता में एक अलग ही आनंद छिपा होता था। बच्चे बड़ी उत्सुकता से इन झांकियों को देखते और बड़े श्रद्धाभाव से उनकी कथा सुनते थे।
मंदिरों में भजन-कीर्तन होते थे और लोग घंटों बैठकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं सुनते थे। रात्रि के बारह बजते ही शंख, घंटियों और जयघोष के बीच श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता था। पूरा वातावरण 'जय कन्हैया लाल की' के उद्घोष से गूंज उठता था। उस क्षण का आनंद शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
पूजा-अर्चना और आरती के बाद सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता था। प्रसाद लेकर लोग अपने-अपने घर लौटते थे। वहां घर में बने प्रसाद का भोग लगाया जाता और पूरा परिवार एक साथ बैठकर उसे ग्रहण करता था। उस समय केवल प्रसाद का स्वाद ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के साथ जुड़ाव का सुख भी मिलता था।
आज जन्माष्टमी का स्वरूप काफी बदल गया है। सोशल मीडिया ने इस पर्व को नया रूप दे दिया है। पहले लोग मंदिर जाकर दर्शन करते थे, अब कई लोग मोबाइल स्क्रीन पर लाइव दर्शन कर लेते हैं। पहले शुभकामनियां मिलने-जुलने से दी जाती थीं, आज एक संदेश सैकड़ों लोगों तक एक साथ पहुंच जाता है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन व्यक्तिगत संपर्क कहीं न कहीं कम हुआ है।
हालांकि आधुनिक समय के सभी बदलाव नकारात्मक नहीं हैं। तकनीक ने जन्माष्टमी के संदेश को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का काम किया है। आज कोई भी व्यक्ति घर बैठे वृंदावन और मथुरा के मंदिरों के दर्शन कर सकता है। बड़े स्तर पर होने वाले आयोजन अधिक लोगों को जोड़ने में सफल होते हैं। युवा पीढ़ी भी विभिन्न माध्यमों से श्रीकृष्ण के जीवन और शिक्षाओं के बारे में जान रही है।
फिर भी, जब पुरानी जन्माष्टमी की यादें सामने आती हैं तो मन में एक अलग ही भाव जाग उठता है। मिट्टी की सोंधी खुशबू, मंदिरों में गूंजते भजन, घरों में बनता प्रसाद, झांकियां सजाते बच्चे और आधी रात तक जागकर श्रीकृष्ण जन्म की प्रतीक्षा करना—इन सबमें एक ऐसी आत्मीयता थी जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
शायद यही कारण है कि आज की भव्यता के बीच भी मन कभी-कभी उस सादगी को खोजता है। वह सादगी, जिसमें दिखावे से अधिक भक्ति थी; आयोजन से अधिक अपनापन था; और आधुनिक साधनों से अधिक मन की श्रद्धा थी।
समय बदलता है और उसके साथ त्योहार मनाने के तरीके भी बदलते हैं। परिवर्तन जीवन का नियम है और उसे रोका नहीं जा सकता। लेकिन यदि आधुनिकता के साथ हम अपनी परंपराओं की आत्मा को भी जीवित रख सकें, तो जन्माष्टमी का वास्तविक आनंद बना रहेगा। आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने भी हमें यही सिखाया था कि परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन मूल मूल्य और आस्था कभी नहीं बदलनी चाहिए।
आज की जन्माष्टमी अधिक भव्य हो सकती है, अधिक आधुनिक हो सकती है, लेकिन पुरानी जन्माष्टमी की यादें आज भी मन के किसी कोने में उसी तरह जीवित हैं। शायद इसलिए जब भी जन्माष्टमी आती है, मन अनायास ही उन दिनों में लौट जाता है, जब भक्ति में सादगी थी और सादगी में ही उत्सव की सबसे बड़ी सुंदरता छिपी हुई थी।

1 टिप्पणी:

  1. आपने तो पुरानी यादें ताजा कर दीं। जब कृष्णा के सीरियल को बड़ी स्क्रीन पर जन्माष्टमी को दिखाया जाता था सभी लाेग एक साथ मंदिर के बाहर इकट्ठा होकर मिलकर श्रीकृष्ण जी की लीलांओं का आनन्द लेते थे और 12 बजे शंख ध्वनि की गूंज के साथ उनका जन्मोत्सव प्रसाद बांटकर श्रद्धापूर्वक मनाते थे।

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