12 सितंबर, 2026

दरवाज़े वही, संबंध धुंधले


कभी-कभी आसपास का माहौल देखकर मन अनायास ही अतीत की ओर लौट जाता है। तब महसूस होता है कि समय ने केवल साल ही नहीं बदले, बल्कि लोगों की सोच, रिश्तों की गर्माहट और जीवन जीने का तरीका भी बदल दिया है।

सत्तर और अस्सी के दशक में जन्मी पीढ़ी शायद अंतिम ऐसी पीढ़ी है, जिसने अपने बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ-साथ माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को भी पूरी निष्ठा से निभाया। इस पीढ़ी के लिए परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित नहीं था, बल्कि माता-पिता, रिश्तेदार और पड़ोसी भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

आज समय बदल चुका है। नई पीढ़ी की सोच और प्राथमिकताएं भी अलग हैं। उनके लिए करियर, व्यक्तिगत समय, मानसिक शांति और बेहतर जीवन-शैली अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि हर पीढ़ी अपने समय के अनुसार सोचती है। लेकिन इस बदलाव के बीच एक चीज जो सबसे ज्यादा महसूस होती है, वह है मानवीय संवेदनाओं का धीरे-धीरे कम होना।

मुझे याद है, पहले यदि मोहल्ले या पड़ोस में किसी के घर कोई परेशानी आ जाती थी, तो लोग बिना बुलाए उसके साथ खड़े हो जाते थे। दुख की घड़ी हो या खुशी का अवसर, पड़ोसी परिवार के सदस्य की तरह साथ निभाते थे। उनके दो शब्द— 'हम आपके साथ हैं—ही पीड़ित व्यक्ति को हिम्मत देने के लिए काफी होते थे। उस समय पड़ोसी केवल घर के बगल में रहने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सुख-दुख का साथी होता था।

लेकिन आज शहरों में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यदि किसी पड़ोसी के घर कोई समस्या हो जाए, तो अक्सर सुनने को मिलता है—'यह उनका निजी मामला है, हमें क्या लेना-देना?' कई बार मदद का भाव लेकर आगे बढ़ने वाले को भी जवाब मिल जाता है—'हम अपना मामला खुद संभाल लेंगे।' परिणाम यह है कि लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं।

सिर्फ लोगों का व्यवहार ही नहीं बदला, पड़ोस की परिभाषा भी बदल गई है। पहले घरों के दरवाजे और दिल दोनों खुले रहते थे। आज दरवाजों पर सुरक्षा ताले हैं और दिलों पर अनकही दूरी। कई बार वर्षों तक साथ रहने के बावजूद लोगों को अपने पड़ोसी का नाम तक पता नहीं होता।

आज जब आसपास देखता हूं तो यह बदलाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। मेरे पड़ोस में हाल ही में शादी हुई और नई बहू घर आई। पड़ोसी से रोज मुलाकात होती है, नमस्ते और हालचाल भी पूछे जाते हैं, लेकिन आज तक उन्होंने अपनी पत्नी से परिचय नहीं करवाया। यह कोई शिकायत नहीं, बल्कि बदलते समय की एक सच्चाई है। शायद लोग अब अपने निजी दायरे में ही रहना पसंद करते हैं। पहले नए सदस्य के आने पर पूरा पड़ोस उससे परिचित हो जाता था, जबकि आज लोग अपने घरों और कमरों तक सीमित होते जा रहे हैं। यही बात कभी-कभी मन को सोचने पर मजबूर कर देती है कि सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कहीं पीछे छूटती जा रही है।

नौकरी के सिलसिले में जब से शहर में आया हूं, तब से यह बदलाव लगातार देख रहा हूं। कई बार मन को यह सब अच्छा नहीं लगता। लगता है कि आधुनिकता और सुविधाओं की दौड़ में कहीं न कहीं अपनापन पीछे छूटता जा रहा है। दुख-सुख में साथ खड़े होने की भावना कमजोर पड़ रही है और स्वार्थ धीरे-धीरे रिश्तों पर हावी होता जा रहा है।

फिर भी यह समय का सच है। हमें इसके साथ चलना पड़ता है। कई बार यदि आप किसी के मामले में दिलचस्पी दिखाएं या सहायता का हाथ बढ़ाएं, तो लोग आपको ही अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाला समझ लेते हैं। ऐसे में मन चाहे या न चाहे, लोग अपने-अपने दायरे में सिमटने लगते हैं।

फिर भी मेरा मानना है कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए बहुत बड़े प्रयासों की जरूरत नहीं होती। यदि हम अपने आसपास के लोगों के प्रति थोड़ी संवेदना, थोड़ा अपनापन और थोड़ा सहयोग बनाए रखें, तो समाज कहीं अधिक मानवीय बन सकता है। आखिर रिश्तों की गर्माहट ही वह चीज़ है, जो किसी भी आधुनिक सुविधा से कहीं अधिक मूल्यवान होती है।


1 टिप्पणी:

  1. आज के परिदृश्य के हिसाब से बिल्कुल सही टिप्पणी है तिवारी जी। आज का युग बस अपने तक ही सीमित रह गया है महंगाई ने आम लोगों की कमर तोड़ रखी है, हर कोई बस अपने-अपनो के बीच सिमटकर रह गया है।

    जवाब देंहटाएं