27 सितंबर, 2026

शब्द एआई के, तो लेखक कौन?

 

कुछ साल पहले तक लिखना एक धीमी प्रक्रिया हुआ करती थी। कोई विचार मन में आता था, हम उसे कई बार सोचते थे, कागज पर उतारते थे, काटते थे, फिर लिखते थे। शब्दों को आकार देने में समय लगता था और शायद इसी प्रक्रिया में विचार भी धीरे-धीरे पकता था। मेहनत, समय, विचार और मनन-चिंतन के सम्मिश्रण से एक लेख तैयार होता था।
आज स्थिति बिल्कुल भिन्न है। विचार आया और हमने पूछा— ‘एआई, इस पर कुछ लिखो।’ कुछ ही क्षणों में एक व्यवस्थित, सधा हुआ लेख हमारे सामने होता है। भाषा सुंदर, वाक्य प्रभावशाली और तर्क क्रमबद्ध। लेकिन इसी सुविधा के बीच एक दुविधा भी धीरे-धीरे हमारे सामने खड़ी हो रही है—क्या एआई हमारी मदद कर रहा है या कहीं हमारी सोचने की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले रहा है? या फिर वह हमें चिंतन-मनन और सोच के बोझ से मुक्ति दिला रहा है?
मेरे विचार से एआई को समझने का पहला तरीका यही है कि उसे सुविधा माना जाए, सोच का विकल्प नहीं। एआई हमारे लिए जानकारी जुटा सकता है, विचारों को व्यवस्थित कर सकता है, किसी विषय के कई पहलू सामने रख सकता है और भाषा को बेहतर बना सकता है। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि किसी विषय को लेकर हमारे भीतर जो अनुभव, संवेदना, स्मृति और व्यक्तिगत दृष्टि पैदा होती है, वह अभी भी हमारी अपनी ही है। उदाहरण के लिए, एआई यह बता सकता है कि बारिश पर सुंदर लेख कैसे लिखा जाए। वह बारिश के वैज्ञानिक कारण समझा सकता है, कविता जैसी पंक्तियां बना सकता है और बारिश से जुड़े हजारों विचार सामने रख सकता है। लेकिन बचपन में पहली बारिश में भीगने का आपका अनुभव वह कहां से लाएगा? भीगते समय मन में उमड़े वे विचार, जिन्हें आपने स्वयं जिया है, वह कहां से लाएगा? वह आपकी मां के हाथों बनी चाय की खुशबू नहीं जानता। वह उस बरामदे को नहीं जानता, जहां बैठकर आपने किसी शाम बारिश देखी थी। लोहे की छत पर गिरती बारिश की बूंदों की वह आवाज वह नहीं सुन सकता, जो कभी आपके लिए किसी संगीत से कम नहीं रही होगी। वह उस व्यक्ति को नहीं जानता, जिसकी याद बारिश आते ही आपको बेचैन कर देती है। यही वह जगह है, जहां मनुष्य की रचनात्मकता शुरू होती है।
आज दुनिया में एआई और रचनात्मकता के रिश्ते पर गंभीर चर्चा हो रही है। सवाल उठ रहे हैं कि जब मशीन लेखन, चित्र, संगीत और दूसरी रचनात्मक सामग्री तैयार करने लगे तो लेखक की भूमिका क्या रह जाती है। यहीं दूसरा सवाल पैदा होता है—जब शब्द एआई लिखे और भाव मनुष्य का हो, तो रचनाकार कौन? यदि मैंने एआई से कहा कि किसी अमुक विषय पर एक हजार शब्द लिख दो और जो मिला, उसे बिना पढ़े प्रकाशित कर दिया, तो क्या उसमें मेरी रचनात्मक भागीदारी वास्तव में है? शायद बहुत कम। लेकिन यदि मैंने अपना अनुभव लिखा, अपना विचार तय किया, एआई से कुछ विकल्प लिए, उनमें से कुछ अस्वीकार किए, कुछ वाक्य बदले, अपनी स्मृतियां जोड़ीं, तथ्यों की जांच की और अंततः लेख को अपने हिसाब से आकार दिया—तो एआई वहां मेरे लिए लेखक नहीं, सहायक बन जाता है। यानी अंतर केवल इतना नहीं है कि लेख किसने लिखा। असली अंतर यह है कि लेख में सोच किसकी है, दृष्टि किसकी है और अंतिम निर्णय किसका है। एआई से भाषा सुधर सकती है, लेकिन दृष्टि हमें खुद विकसित करनी होगी।
एआई दस पैराग्राफ लिख सकता है, लेकिन उनमें से कौन-सा विचार हमारे अनुभव से जुड़ता है, कौन-सा हमारे पाठक से संवाद करता है और कौन-सा हमारे मन की बात कहता है—यह पहचानना हमें ही होगा। मैं एआई के विरोध में नहीं हूं। यह लेखक के लिए एक शानदार औजार हो सकता है। जैसे कैमरे ने फोटोग्राफर को खत्म नहीं किया, कंप्यूटर ने कलाकार को खत्म नहीं किया और इंटरनेट ने पत्रकारिता को समाप्त नहीं किया, वैसे ही एआई भी रचनात्मकता का अंत नहीं है। एक हथौड़ा घर भी बना सकता है और नुकसान भी कर सकता है। फर्क औजार में नहीं, उसे इस्तेमाल करने वाले हाथ में होता है। एआई के साथ भी यही बात लागू होती है।
हां, एक खतरा जरूर है—सुविधा कहीं हमारी आदत न बन जाए और आदत धीरे-धीरे हमारी क्षमता को कमजोर न कर दे। यदि हर विचार को विकसित करने के लिए हम एआई की ओर देखने लगें, हर वाक्य को सुंदर बनाने के लिए एआई पर निर्भर हो जाएं और हर लेख का ढांचा मशीन से बनवाने लगें, तो संभव है कि धीरे-धीरे हम खुद विचारों को विकसित करने की उस प्रक्रिया से दूर होते जाएं, जो कभी लेखन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी।
लेखन केवल शब्दों को क्रम में रखना नहीं है। लेखन विचारों के साथ कुछ समय बिताना भी है। कभी-कभी एक अच्छा विचार तुरंत नहीं आता। वह चुप्पी में आता है, किसी स्मृति से आता है, किसी अनुभव से निकलता है, किसी सवाल से टकराकर पैदा होता है। उसके लिए समय चाहिए, मनन चाहिए, कभी-कभी बेचैनी भी चाहिए। यदि एआई हमें उस बेचैनी से ही मुक्त कर दे तो सुविधा तो मिलेगी, लेकिन क्या रचनात्मकता भी उतनी ही बचेगी?
शायद आने वाले समय में लेखक की सबसे बड़ी पहचान यही होगी कि उसके लेख को पढ़कर पाठक कह सके—‘यह सिर्फ अच्छा लिखा हुआ लेख नहीं है, इसमें लेखक की अपनी आवाज सुनाई दे रही है।’ यही वह चीज है जिसे एआई हमारी मदद तो कर सकता है, लेकिन हमारी जगह पैदा नहीं कर सकता। हमने जीवन को जिस तरह जिया है, उसे हमारी जगह कोई और नहीं जी सकता। शायद लेखन की असली ताकत भी यही है—शब्दों में केवल सूचना नहीं, जीवन का अनुभव बोलता है।

 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

 

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