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24 October, 2026

दिवाली, तू है कहाँ! हमको आवाज़ दे

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हम शहरों में आ तो गए, लेकिन दिवाली गाँव में ही छोड़ आए। यह बात मैं हर साल दिवाली के आसपास सोचता हूँ। हम गाँव से शहर आए, फिर शहर से फ्लैट में आ गए। और शायद फ्लैट में आते-आते ज़िंदगी भी फ्लैट हो गई। ज़िंदगी आगे बढ़ती गई, घर बड़े होते गए, सुविधाएँ बढ़ती गईं, लेकिन पता नहीं क्यों दिवाली हर साल थोड़ी छोटी होती चली गई। बाहर से देखें तो आज हमारे पास दिवाली के लिए पहले से बहुत कुछ है—बड़ी-बड़ी लाइटें, सजावट, मिठाइयाँ, नए कपड़े, महंगे उपहार और बाजारों की चमक। लेकिन उस सबके बीच बचपन वाली दिवाली कहीं दिखाई नहीं देती।

गाँव में दिवाली सिर्फ एक दिन नहीं होती थी। दिवाली कई दिनों पहले से ही घर के भीतर उतरने लगती थी। सुबह उठते ही लगता था कि आज कुछ अलग है, जैसे पूरे गाँव की हवा में ही त्योहार घुल गया हो। आँगन के साथ-साथ घर के बाहर के छोटे रास्तों, पगडंडियों और चौखट के आसपास की भी सफाई होती थी। कहीं झाड़ू लग रही होती, कहीं आँगन लीपा-पोता जा रहा होता, तो कहीं बच्चे घर के कोनों से मिट्टी और जाले निकालने में लगे होते। घर को लीपा-पोता जाता था, दरवाजे पर आम के पत्तों या फूलों का तोरण लगाया जाता था और देखते ही देखते साधारण-सा घर भी जैसे दिवाली के स्वागत के लिए तैयार हो जाता था। चूल्हे पर कुछ न कुछ पक रहा होता था और पूरे घर में उस खाने की खुशबू फैल रही होती थी। बड़े सुबह से काम में लगे रहते। दादी की आवाज आती थी, ‘अरे सारे दरवाजे खोल दो, लक्ष्मी आएगी। आज के दिन दरवाजे बंद नहीं रखते।’ तब शायद हमें इस बात की गहराई समझ नहीं आती थी। लगता था, दादी हर साल यही कहती हैं। लेकिन आज शहर के इस बंद फ्लैट में बैठकर लगता है कि दादी सिर्फ दरवाजे खोलने की बात नहीं करती थीं, वह घर खोलने की बात करती थीं।

भीतर उतनी रोशनी नहीं

आज हमारे पास सफाई के लिए मेड है, रंगोली के लिए बाजार में बने-बनाए स्टिकर हैं, सजावट के लिए बिजली की लड़ियाँ हैं और पूजा का सामान एक ही दुकान से मिल जाता है। एसी चल रहा होता है, इसलिए दरवाजे और खिड़कियाँ बंद रहती हैं। बाहर रोशनी होती है, अंदर भी रोशनी होती है, लेकिन उस रोशनी के बीच कहीं वह पुरानी दिवाली दिखाई नहीं देती। कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि जब हमने अपने घर के सारे दरवाजे ही बंद कर रखे हैं, तो लक्ष्मी जी रास्ता कैसे खोजेंगी? शायद यह सवाल लक्ष्मी जी से ज्यादा हमसे है। सुविधा के लिए हमने दरवाजे बंद किए और पता ही नहीं चला कि कब रिश्तों के लिए भी जगह कम होती चली गई। पहले पड़ोसी के घर से आती आवाज अपने घर की लगती थी। किसी के यहाँ मिठाई बनी तो खुशबू पूरे मोहल्ले में फैलती थी। कोई बिना बुलाए घर आ गया तो उसके लिए जगह बन जाती थी। अब सामने वाले फ्लैट में कौन रहता है, यह भी कई बार पता नहीं होता। शुभकामना भी मोबाइल की स्क्रीन पर आती है और वहीं खत्म हो जाती है। शायद यही वजह है कि आज दिवाली पहले से ज्यादा चमकती है, लेकिन भीतर उतनी रोशनी नहीं करती।

ज़िंदगी के बीच त्योहार

मेरे लिए दिवाली सिर्फ शाम को लक्ष्मी पूजा करने, नए कपड़े पहनने, मिठाई खाने और पटाखे चलाने का नाम नहीं है। दिवाली तो सुबह से शुरू होती है। जिस दिन घर की सफाई सिर्फ एक काम न होकर तैयारी लगे, जिस दिन आँगन में पैर रखते ही मन को लगे कि आज कोई खास दिन है, वही दिवाली है। गाँव में त्योहार की तैयारी में एक श्रद्धा होती थी। शहर में हमारे पास समय कम है, इसलिए हमने दिवाली को भी समय के हिसाब से छोटा कर लिया। सुबह ऑफिस जाना है, बच्चों को स्कूल भेजना है, बाजार से सामान लाना है, घर की सफाई करवानी है और शाम को पूजा करनी है। बस, दिवाली पूरी। पहले त्योहार के लिए जिंदगी थोड़ी रुकती थी, अब जिंदगी के बीच त्योहार के लिए थोड़ा-सा समय निकाला जाता है। फर्क शायद यहीं से शुरू हुआ है। गाँव में दिवाली घर में मनती थी, शहर में दिवाली घर के कैलेंडर में मनती है। अगर मुझसे कोई पूछे कि दिवाली की शुरुआत कैसे करनी चाहिए, तो मैं कहूँगा—सबसे पहले अपने घर को अपने हाथ से साफ कीजिए। जब अपने हाथ से झाड़ू लगाते थे तो लगता था जैसे हम कह रहे हों— ‘माँ, आइए, मैंने आपके लिए जगह खाली की है।’ आज मेड आई, उसने सफाई की और चली गई। घर साफ हो गया, लेकिन उस सफाई में हमारा मन कहाँ शामिल हुआ? इसलिए इस दिवाली कम से कम घर का कोई एक हिस्सा अपने हाथ से साफ कीजिए। पूजा की जगह, चौखट, बालकनी या वह कोना जहाँ आप दीया रखने वाले हैं। त्योहार में काम छोटा या बड़ा नहीं होता, उसके पीछे का भाव बड़ा होता है।

अपनापन महसूस करें

इसी तरह रंगोली भी मेरे लिए सिर्फ सजावट नहीं है। चावल का आटा, हल्दी, कुमकुम और घर में मौजूद छोटी-छोटी चीजों से ही आँगन सज जाता था। रंगोली बहुत बड़ी नहीं होती थी, लेकिन उसमें अपनापन होता था। आज बाजार में खूबसूरत रंगोलियाँ मिल जाती हैं, जिन्हें बस लाकर रख देना है। लेकिन इस दिवाली दस मिनट निकालकर अपने हाथ से थोड़ी-सी रंगोली बनाइए। बहुत सुंदर बनाने की जरूरत नहीं है। टेढ़ी बने तो टेढ़ी सही, छोटी बने तो छोटी सही। बच्चों को साथ बैठाइए। उन्हें बताइए कि त्योहार केवल बाजार से सामान खरीदकर घर सजाने का नाम नहीं है। गाँव की दिवाली में सजावट कम थी, लेकिन भागीदारी ज्यादा थी। कोई घर साफ कर रहा था, कोई पकवान बना रहा था, कोई दीया तैयार कर रहा था, कोई तोरण लगा रहा था। शायद इसलिए वह दिवाली सिर्फ दिखाई नहीं देती थी, महसूस भी होती थी। आज हमें उसी भावना को बचाना है, उसकी हूबहू नकल नहीं करनी।

घर बंद न हो, मन खुले

फिर बारी आती थी दरवाजे और खिड़कियाँ खोलने की। गाँव में दिवाली के दिन घर और बाहर के बीच दूरी कम हो जाती थी। किसी पड़ोसी की आवाज आती, बच्चे एक घर से दूसरे घर चले जाते, कोई मिठाई लेकर आ जाता, कोई बस शुभकामना देने खड़ा हो जाता। घर छोटे थे, लेकिन उनमें आने-जाने वालों के लिए जगह बहुत थी। इसलिए इस दिवाली दोपहर के बाद कुछ देर के लिए अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ खोलकर देखिए। एसी बंद कर दीजिए। बाहर की हवा और रोशनी को अंदर आने दीजिए। हो सकता है आपको समझ आए कि दादी दरवाजा सिर्फ लक्ष्मी जी के लिए नहीं खुलवाती थीं। वह चाहती थीं कि घर बंद न हो, मन बंद न हो और त्योहार सिर्फ हमारे परिवार तक सीमित न रह जाए। शायद इसीलिए पुराने समय की दिवाली में पड़ोसी भी अपने लगते थे और पूरा मोहल्ला एक घर जैसा महसूस होता था।

गाँव में दीया भी केवल पूजा की वस्तु नहीं था। घर के कोने-कोने में दीये रखे जाते थे—तुलसी के पास, चौखट पर, रसोई में, आँगन में, छत पर और उन जगहों पर भी जहाँ शायद किसी की नजर न जाए। बिजली की इतनी रोशनी नहीं थी, इसलिए एक-एक दीये का उजाला महसूस होता था। आज हमारे घर बिजली की लड़ियों से जगमगा उठते हैं, लेकिन अपने हाथ से मिट्टी का एक दीया जलाने का सुख अब भी वैसा ही है। हमारे यहाँ यह मान्यता रही है कि उजाला शुभता का प्रतीक है और जहाँ उजाला होता है, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए इस दिवाली एक दीया ऐसा जरूर जलाइए जिसे आपने खुद अपने हाथ से रखा हो। उसे चौखट पर रखकर कुछ पल वहीं खड़े रहिए। उस छोटे-से दीये को देखिए और सोचिए कि हमारे जीवन में कितने लोग ऐसे रहे हैं जिन्होंने बिना किसी उम्मीद के हमारे लिए उजाला किया। माँ की वह सुबह, पिता की वह चिंता, दादा-दादी, नाना-नानी की वह आवाज, भाई-बहनों के साथ बिताए वे दिन—कितना कुछ है जो आज भी हमारे जीवन में अपनी गर्माहट लिए हुए है। उन दिनों का स्नेह, वह अपनापन और घर में बिखरी वह छोटी-छोटी खुशियाँ आज भी हमारी यादों में उसी तरह जीवित हैं।

अपनों के साथ कुछ पल

मुझे लगता है शहर में आना गलत नहीं है। बेहतर जिंदगी के लिए गाँव छोड़ना भी गलत नहीं है। बच्चों की पढ़ाई, नौकरी और सुविधाओं के लिए शहर जरूरी है। लेकिन शहर में आकर अगर हम अपने त्योहारों की आत्मा ही पीछे छोड़ दें, तो कहीं न कहीं हम अपने भीतर का एक हिस्सा भी पीछे छोड़ देते हैं। अब न वैसा आँगन है, न वैसा चूल्हा, न पूरा परिवार एक जगह बैठता है। दादी की आवाज भी अब शायद घर के किसी कोने से नहीं आती। बचपन के दोस्त अलग-अलग शहरों में हैं, भाई-बहन अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं और वह घर, जिसमें कभी दिवाली की सुबह से रात तक चहल-पहल रहती थी, शायद अब उतना भरा हुआ नहीं है। लेकिन उन दिनों को वापस लाने के लिए किसी बड़े इंतजाम की जरूरत नहीं है। एक दीया, थोड़ी-सी सफाई, हाथ से बनाई छोटी-सी रंगोली, घर का खुला दरवाजा और अपने लोगों के साथ कुछ पल—इतना ही काफी है। हम अपने बच्चों को वही गाँव नहीं दे सकते जिसमें हम बड़े हुए, लेकिन उस गाँव की एक भावना जरूर दे सकते हैं। उन्हें बता सकते हैं कि त्योहार बाजार से नहीं, घर के लोगों से बनता है।
शहरों में लोग आ तो गए, लेकिन दिवाली गाँव में ही छोड़ आए—यह बात पूरी तरह सच नहीं होनी चाहिए। गाँव कहीं गया नहीं है। वह हमारी यादों में है, हमारी आदतों में है, हमारी बोली में है और उन छोटी-छोटी बातों में है जिन्हें हम अक्सर पुराना कहकर भूल जाते हैं। जब हम अपने बच्चे को पहली बार दीया जलाना सिखाते हैं, जब चौखट पर रंगोली बनाते हैं, जब किसी पड़ोसी के घर मिठाई लेकर जाते हैं, तब वही गाँव हमारे भीतर से बाहर आता है। शायद हमें गाँव लौटने की जरूरत नहीं है, हमें बस अपने भीतर से गाँव को मिटने नहीं देना है।

दीये की लौ थोड़ी-सी काँपेगी

इस दिवाली मैं एक काम जरूर करना चाहता हूँ—एक दीया जलाकर कुछ देर उसके सामने बैठना। बिना मोबाइल के, बिना किसी शोर के। शायद उस दीये की लौ में मुझे अपना वह पुराना घर दिखाई दे, जहाँ दादी दरवाजे खोलने के लिए आवाज लगाती थीं। शायद मिट्टी से सना वह आँगन दिखाई दे, चूल्हे से उठता धुआँ दिखाई दे, पगडंडी पर भागते हुए हम दिखाई दें और दूर किसी घर से आती मिठाई की खुशबू भी महसूस हो। शायद एक पल के लिए लगे कि समय वहीं रुक गया है और हम फिर से बच्चे हो गए हैं। लेकिन फिर दीये की लौ थोड़ी-सी काँपेगी और हमें याद आएगा कि वह घर अब वैसा नहीं है, वे लोग अब वैसे नहीं हैं और हम भी अब वैसे नहीं रहे। यही तो जिंदगी है—कुछ लोग चले जाते हैं, कुछ घर पीछे छूट जाते हैं, कुछ आवाजें हमेशा के लिए खामोश हो जाती हैं, लेकिन उनकी दी हुई रोशनी हमारे भीतर रह जाती है। इसलिए इस दिवाली जब दीया जलाएँ, तो सिर्फ अपने घर के लिए मत जलाइए। उन लोगों की याद में भी जलाइए, जिन्होंने कभी आपकी ज़िंदगी की खुशहाली और शुभता के लिए दीया जलाया था। और जो लोग आज हमारे साथ हैं, उनके जीवन की खुशहाली, सुख-शांति और शुभता के लिए भी एक दीया जरूर जलाइए। आखिर दिवाली सिर्फ घर को रोशन करने का त्योहार नहीं, बल्कि अपने आसपास के रिश्तों में सुख, शुभता और अपनापन बनाए रखने का भी अवसर है। 

अगर दीया जलाते-जलाते आँखें भर आएँ, तो उन्हें पोंछिए मत। कुछ आँसू दु:ख के नहीं होते, वे इस बात के होते हैं कि हमें कभी इतना प्यार मिला था कि आज भी उसकी याद आँखों को भिगो देती है। शायद यही हमारी असली दिवाली है—जब घर रोशनी से नहीं, यादों से भर जाए; जब दीये की लौ के साथ बीते हुए लोग भी कुछ पल के लिए हमारे पास लौट आएँ; और जब हम समझें कि गाँव हमने पीछे नहीं छोड़ा... गाँव तो आज भी हमारे भीतर उसी पुराने दरवाजे के पीछे खड़ा है। बस, हर दिवाली वह धीरे से कहता है— ‘अरे, सारे किवाड़ खोल दो... मैं अभी यहीं हूँ।’ 
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari  

20 October, 2026

मेरा चाँद मुझे आया है नज़र


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मुझे आज भी याद है वह समय, जब करवाचौथ के दिन मैं ऑफिस से शाम करीब आठ बजे छुट्टी करके घर जाने के लिए निकलता था। तब शादी नहीं हुई थी। उम्र ऐसी थी कि करवाचौथ का मतलब तो समझ आता था, लेकिन उसके पीछे छिपी भावनाओं को शायद उतनी गहराई से समझने की समझ अभी नहीं आई थी। तब करवाचौथ मेरे लिए एक त्योहार था, एक खूबसूरत दृश्य था, लेकिन यह नहीं पता था कि एक दिन यही त्योहार मेरे अपने जीवन का हिस्सा बन जाएगा।

बात शिमला के माल रोड की है। चाँद निकलने का समय अक्सर साढ़े आठ बजे के बाद होता था और उस समय तक माल रोड का नज़ारा देखते ही बनता था। लगता था जैसे पूरी की पूरी बारात एक ही जगह के लिए निकल पड़ी हो। चारों ओर सजी-धजी सुहागिनें, अपने पतियों के साथ टहलती हुईं। किसी ने खूबसूरत साड़ी पहन रखी होती, किसी के हाथों में चूड़ियाँ खनक रही होतीं तो किसी के हाथ में सजी हुई पूजा की थाली और छलनी होती। हर कोई जैसे एक ही इंतज़ार में था—चाँद के निकलने का। 
फिर जैसे ही चाँद के निकलने की खबर होती, माल रोड का दृश्य अचानक बदल जाता। जिस दिशा से चाँद दिखाई देता, उधर सड़क पर एक अलग ही संसार बस जाता। सड़क के किनारे जलते छोटे-छोटे दीये, उनके बीच खड़ी सुहागिनें और अपने पति की लंबी उम्र और मंगल की कामना से भरी उनकी आँखें—सब कुछ इतना सुंदर और भावुक होता कि कुछ देर के लिए मन वहीं ठहर जाता। उस समय समझ नहीं आता था कि यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि किसी के लिए पूरे दिन की तपस्या और इंतज़ार का अंत है। 
छलनी से पहले चाँद को देखना और फिर उसी छलनी से पति का चेहरा देखना... उस पल में जैसे पूरे व्रत की भावना समा जाती थी। चाँद आसमान में होता था, लेकिन असली खुशी शायद सामने खड़े उस इंसान को देखने की होती थी, जिसके लिए पूरा दिन बिना अन्न और जल के गुज़ारा गया था। तब मैं बस यह दृश्य देखता था, आज उसकी भावना समझ पाता हूँ। 
माल रोड की रौनक देखते ही बनती थी। चारों तरफ रोशनी, लोगों की भीड़, सजी हुई महिलाएँ, हाथों में पूजा की थालियाँ और आसमान में चाँद का इंतज़ार। शिमला की ठंडी हवा में करवाचौथ की वह रात अपने आप में कुछ अलग ही लगती थी। 
जब मैं वहाँ से घर की ओर लौटता, तो रास्ता भी किसी त्योहार की कहानी कहता हुआ लगता। घर की ओर जाने वाली सड़क के दोनों किनारों पर दीये ही दीये दिखाई देते। शिमला की भौगोलिक स्थिति के कारण उस ओर से चाँद निकलता दिखाई देता था और शायद इसी वजह से रास्ते भर करवाचौथ की उस रात का उजाला कुछ और ही गहरा लगता था। उन दीयों को देखते हुए घर की ओर जाते समय मन में एक छोटी-सी इच्छा जरूर उठती थी। ‘जब हमारी शादी होगी, तब क्या हमारे लिए भी कोई इसी तरह करवाचौथ का व्रत रखेगा?’ 
तब यह केवल एक मासूम-सी कल्पना थी। पता नहीं था कि समय कभी उस कल्पना को सच भी कर देगा। यह भी नहीं पता था कि जिन लोगों को मैं उस समय दूर खड़े होकर देख रहा हूँ, एक दिन मैं भी उसी करवाचौथ का हिस्सा होऊँगा। 
लेकिन करवाचौथ से जुड़ा एक और किस्सा है, जो आज भी याद आता है तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। मैं और मेरा भाई अक्सर शाम के समय गाड़ी लेकर घूमने निकल जाते थे। जैसे ही आसमान में चाँद अपना मुखड़ा दिखाना शुरू करता, हम गाड़ी में एक गाना बजा देते—‘मेरा चाँद मुझे आया है नज़र।’ गाना बजते ही जैसे हलचल-सी मच जाती। आसपास खड़ी सुहागिनों को लगता, शायद चाँद निकल आया है। कई चेहरे आसमान की ओर उठ जाते, कई निगाहें चाँद को तलाशने लगतीं। कोई अपनी थाली संभालने लगती, कोई अपने पति की ओर देखने लगती। हमें यह देखकर एक अलग ही तरह की खुशी होती। 
हम जानते थे कि हम केवल एक गाना बजा रहे हैं, लेकिन उस गाने के बजते ही न जाने कितनी आँखों में इंतज़ार खत्म होने की उम्मीद जग जाती थी। उस समय यह सब एक मज़ाक और शरारत जैसा लगता था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस छोटी-सी शरारत में भी करवाचौथ की भावनाओं का कितना सुंदर संसार छिपा था। तब हम दूसरों के इंतज़ार को देखकर खुश होते थे, आज समझ आता है कि किसी का इंतज़ार भी प्रेम का ही एक रूप होता है। 
समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। वह लड़का, जो कभी माल रोड पर करवाचौथ के दिन दूसरों को व्रत करते और चाँद का इंतज़ार करते देखता था, आज स्वयं उस रिश्ते का हिस्सा है। कभी मन में सवाल उठता था कि क्या हमारे लिए भी कोई व्रत रखेगा। आज उस सवाल का जवाब मेरे जीवन में है। 
आज मेरा विवाह हो चुका है। और करवाचौथ का दिन आते ही शिमला का वह माल रोड, वे जगमगाते दीये, सजी हुई थालियाँ, छलनी के पीछे से झाँकते चेहरे और गाड़ी में बजता वह गीत—सब कुछ बरबस याद आ जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब मैं दूसरों के करवाचौथ को देखा करता था और आज करवाचौथ मेरे अपने घर में उतर आता है। 
शायद कुछ यादें इसलिए नहीं लौटतीं कि हम उन्हें याद करना चाहते हैं। वे इसलिए लौटती हैं क्योंकि कभी हमने उन्हें पूरे मन से जिया होता है। और कुछ सपने इसलिए याद रह जाते हैं क्योंकि समय उन्हें चुपचाप हमारे जीवन में सच कर चुका होता है। 
खैर, सुबह के चार बजते ही रसोई से सरगी की थाली की खनक सुनाई देने लगती है। धर्मपत्नी स्नान इत्यादि करके सर्वप्रथम पूजाघर में पूजापाठ से अपने दिन की शुरुआत करती है। वैसे तो सुबह सरगी खाने का चलन है, लेकिन हमारी वाली नहीं खाती। कहती है, ‘दिल नहीं करता।’ वह सारा दिन इसी तरह भूखी और प्यासी रहती है। मैं दरवाजे की ओट से देखता हूँ—वो भूखी है। लोग पूछते हैं, करवाचौथ क्या है? किताबें कहती हैं—पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी का निर्जला व्रत। लेकिन मेरे लिए करवाचौथ क्या है? मेरे लिए करवाचौथ वो दिन है जब मेरी सुबह चाय नहीं बनती, क्योंकि वो पानी भी नहीं पिएगी। सुबह ऑफिस जाते वक्त वो मुस्कुराती है। मैं भी मुस्कुराकर निकल जाता हूँ, लेकिन दिन भर ऑफिस में जाने कितनी बार उसका ख्याल आता है। सोचता हूँ, कैसे सारा दिन बिना पानी के रह रही होगी। सिर दर्द तो नहीं हो रहा होगा? थकान तो नहीं लग रही होगी? शायद हर पति के मन में अपनी पत्नी को लेकर ऐसी ही चिंता होती होगी। बस हम पुरुषों की एक दिक्कत है—हम महसूस बहुत कुछ करते हैं, लेकिन कह नहीं पाते। प्यार होता है, चिंता होती है, लेकिन उसका इज़हार अक्सर नहीं कर पाते। 
इस साल करवाचौथ 29 अक्तूबर, गुरुवार को है। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट तक और चाँद निकलने का समय रात 8 बजकर 17 मिनट पर है। लेकिन मेरे लिए चाँद घड़ी देखकर नहीं निकलता। मेरे लिए चाँद तब निकलता है जब वो छलनी हटाकर मुझे देखती है। घड़ी चाहे 8 बजकर 17 मिनट बताए, मेरे लिए उस समय का कोई खास मतलब नहीं। मेरे लिए उस रात की घड़ी उसकी आँखों से चलती है। 
सायं को वो साड़ी पहन रही है, चूड़ियाँ खनक रही हैं। तैयार होते-होते वो इत्र लगा रही है और देखते ही देखते पूरा कमरा उसकी खुशबू से ऐसे सराबोर हो जाता है, मानो कोई परी अभी-अभी इस कमरे में उतर आई हो। मैं छत पर जाकर बार-बार चाँद देख रहा हूँ, जैसे चाँद मेरे जल्दी देखने से जल्दी निकल आएगा। पड़ोस की छत से एक बच्चे की आवाज आती है—‘मम्मी, चाँद निकल आया!’ अचानक जैसे आसपास हलचल बढ़ जाती है। धर्मपत्नी सजी-धजी सामने आती है। हाथ में थाली, थाली में दीया, हाथों में चूड़ियाँ और छलनी में चाँद। लेकिन उस छलनी के पीछे सिर्फ चाँद नहीं है—मैं भी हूँ। 
वो मुझे देखती है। मैं उसे देखता हूँ। कुछ पल के लिए जैसे आसपास की सारी आवाजें धीमी पड़ जाती हैं। वो मेरे पैरों को स्पर्श करती है। उस एक पल में लगता है कि यह व्रत सिर्फ मेरी उम्र के लिए नहीं, हमारी उम्र के लिए है। हमारे साथ बिताए हुए उन वर्षों के लिए है, जो पीछे छूट गए हैं और उन वर्षों के लिए भी, जो अभी हमारे सामने हैं। उस पल में मुझे यह भी महसूस होता है कि विवाह सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है। विवाह शायद उस दूसरे इंसान की चिंता को अपनी चिंता बना लेने का नाम है। 
वो पानी पीती है मेरे हाथ से। पहला घूँट पीते ही कहती है—‘तुमने कुछ खाया?’ मैं झूठ बोल देता हूँ—‘हाँ, खा लिया था।’ जबकि सच उसे भी पता है और मुझे भी। बस, एक खामोशी। शायद रिश्तों की सबसे खूबसूरत बातें कई बार इसी खामोशी में कही जाती हैं। उसने पूरे दिन मेरे लिए पानी नहीं पिया और पानी पीते ही उसे मेरी चिंता है कि मैंने खाना खाया या नहीं। उस पल लगता है कि प्रेम आखिर इससे ज्यादा और क्या होगा? 
मेरे लिए चाँद 8 बजकर 17 मिनट पर नहीं निकलता। मेरे लिए चाँद तब निकलता है जब वो छलनी हटाती है और मुस्कुराकर मुझे देखती है। उस मुस्कान में पूरे दिन का व्रत है, मेरे लिए उसकी चिंता है, हमारे साथ की यादें हैं और आने वाले कल की एक अनकही प्रार्थना भी। 
शायद करवाचौथ का असली अर्थ यही है—एक-दूसरे के लिए जीना। एक का भूखा रहना और दूसरे का उसके भूखे होने की चिंता में रहना। एक का व्रत और दूसरे का मन ही मन उसके लिए दुआ करना। प्रेम हमेशा बड़े-बड़े शब्दों में नहीं होता। कभी वह सुबह की उस चाय में होता है जो नहीं बनती, कभी दरवाजे की ओट से उसे देखते हुए आँखों में उतर आता है और कभी छलनी के उस छोटे-से घेरे में पूरा संसार दिखाई देने लगता है। 
इसलिए इस करवाचौथ पर, अगर आप पति हैं, तो सिर्फ थाली मत पकड़िए—उस भावना को भी पकड़िए जिसके लिए आपकी पत्नी ने पूरा दिन बिना पानी के बिताया है। एक दिन उसके साथ भूखे रहकर देखिए, शायद आपको समझ आए कि प्रेम का स्वाद भोजन से नहीं, त्याग से बढ़ता है। उसके व्रत को केवल एक परंपरा मत समझिए। उसके पीछे छिपे प्रेम को महसूस कीजिए। क्योंकि कई बार पत्नी यह नहीं कहती कि वह आपसे कितना प्रेम करती है। वह बस सुबह उठती है, पूजा करती है, पूरा दिन बिना पानी के रहती है और शाम को छलनी के पीछे से आपको देखकर मुस्कुरा देती है। और शायद यही उसका सबसे बड़ा इज़हार होता है। 
हम पुरुष अक्सर सोचते हैं कि हमें अपनी पत्नी को बताना चाहिए कि हम उससे कितना प्यार करते हैं। लेकिन कई बार वह हमसे पहले ही बता चुकी होती है—बिना एक शब्द कहे। उसके व्रत में, उसकी थाली में, उसकी आँखों के इंतज़ार में और उस मुस्कान में, जो चाँद देखने के बाद सबसे पहले हमारे लिए आती है। 
इसलिए उस रात जब वो पानी का पहला घूँट मेरे हाथ से पीकर फिर पूछेगी—‘तुमने कुछ खाया?’ तो शायद मैं इस बार भी कह दूँगा—‘हाँ, खा लिया था।’ वो शायद फिर भी समझ जाएगी कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। और मैं भी समझ जाऊँगा कि उसने पूरे दिन मेरे लिए जो रखा है, उसके सामने मेरे पास देने के लिए शब्द बहुत छोटे हैं। 
‘चाँद तो आसमान में सिर्फ एक है, लेकिन मेरा पूरा आसमान मेरे सामने खड़ा है।’ शायद इसी को कहते हैं—‘किसी के व्रत में अपना जीवन दिखाई देना।’ 
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

19 October, 2026

एक कटोरी खीर नहीं, चाँद तले मन धर आओ

“ शरद पूर्णिमा की रात सिखाती है कि श्रीकृष्ण की मुरली तो रोज बजती है, हर किसी के जीवन में। कभी किसी बीमार की सेवा के रूप में, कभी किसी भूखे को रोटी खिलाने के रूप में, कभी एकांत में बैठकर ‘राधे’ कहने के रूप में। हम क्या करते हैं? हम कहते हैं—‘अभी थोड़ा काम निपटा लूं, फिर भजन करूंगा।’ और वो ‘फिर’ कभी नहीं आता। 
इस बात को एक छोटी सी कथा से समझते हैं। एक बार वृंदावन में शरद की पूर्णिमा की रात थी। चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से चमक रहा था। यमुना किनारे वन में एक दिव्य प्रकाश फैला था। श्यामसुंदर ने अपनी मुरली उठाई और ऐसी तान छेड़ी कि सारी गोपियां अपना सुध-बुध खोकर दौड़ी चली आईं। 
वृंदावन में उस रात भी कुछ घरों में चूल्हे जल रहे थे। किसी गोपी ने सोचा, ‘अभी तो आटा गूंथा है, मुरली बाद में सुन लूंगी।’ किसी ने सोचा, ‘बच्चा सो रहा है, अभी जाना ठीक नहीं।’ किसी ने सोचा, ‘लोग क्या कहेंगे? रात को वन में जाना?’ वे गोपियां नहीं आईं। मुरली तो उनके कानों में भी पड़ी थी, पर वे अपने कामों में उलझी रहीं। और जो आईं? वे तो आधी रोटी तवे पर छोड़कर आईं, कोई अपने काजल को एक आंख में ही लगाकर दौड़ पड़ी, कोई अपने बच्चे को झूले में झूलता छोड़कर। लोक-लाज, काम-काज सब छोड़कर। 
जो गोपियां उस रात नहीं गईं, वे सुबह पछताईं। बोलीं, ‘हाय, वो रात तो चली गई, अब तो मुरली फिर नहीं बजेगी।’ और जो गईं, उनका नाम आज भी वृंदावन की हवा लेती है। 
ये कहानी सिर्फ वृंदावन की नहीं, हमारी भी है। हमारे जीवन में भी मुरली रोज बजती है। सुबह जब मां फोन करती है और हम कहते हैं —‘अभी मीटिंग में हूं, बाद में बात करता हूं।’ वो मुरली ही तो थी। रास्ते में कोई वृद्ध हाथ बढ़ाता है और हम ‘फुर्सत नहीं है’ कहकर आगे बढ़ जाते हैं, वो मुरली ही तो थी। रात को अकेले में मन कहता है, ‘थोड़ी देर बैठ, बस राधे-राधे बोल’, और हम कहते हैं— ‘नींद आ रही है, कल करूंगा।’ 
तार्किक दृष्टि से देखो तो मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि उसके पास समय बहुत है। वह सोचता है कि भजन, प्रेम, सेवा के लिए कोई अलग मुहूर्त आएगा। पर शरद पूर्णिमा कहती है—मुहूर्त तो अभी है। जो गोपी आटा गूंथते हुए सोच रही थी कि ‘बाद में जाऊंगी’, क्या उसके आटे ने उसे बचा लिया? नहीं। पर जो आधी रोटी छोड़कर गई, वो अमर हो गई। 
अब जरा रहस्य को समझो—शरद पूर्णिमा वाले दिन खीर तो बहाना है। असल में, उस रात थोड़ी देर के लिए अपने सारे काम छोड़कर चंद्रमा के नीचे बैठो। अपने अधूरे कामों को, अपनी चिंताओं को थोड़ी देर छोड़ दो। शायद उसी पल तुम्हें भी तुम्हारी मुरली सुनाई दे जाए। महारास आज भी चल रहा है, यमुना किनारे नहीं, हमारे ही भीतर। जब मन सोलह कलाओं से शांत होता है, तब भीतर का श्याम आज भी मुरली बजाता है। 
विज्ञान कहता है इस रात चंद्रमा धरती के सबसे करीब होता है। आयुर्वेद कहता है इस रात चंद्रमा की किरणों में ‘सोम’ तत्व सबसे अधिक होता है, जो औषधि के समान है। सोम का अर्थ है - प्रेम, करुणा, शांति, क्षमा। लेकिन भक्ति का रहस्य इससे भी गहरा है। 
सोचो, दूध क्या है? दूध हमारे मन जैसा है - सफेद, कोमल, पर जल्दी खट्टा हो जाने वाला। अगर इसे ऐसे ही छोड़ दो तो खराब हो जाएगा। पर जब इसे चंद्रमा की शीतलता, यानी प्रेम की शीतलता में रखते हो, तो इसमें अमृत घुल जाता है। 
यही शीतलता खीर को पूर्णता प्रदान करती है। विचार कीजिए कि इसका खीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जैसे चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर भी शीतल रहता है, घमंड नहीं करता, वैसे ही खीर भी रात भर शीतलता पीकर मीठी हो जाती है। वो अब सिर्फ खाने की चीज नहीं रही, प्रसाद बन गई। 
शरद पूर्णिमा हमें दो बातें सिखाती है—पहली, जैसे चंद्रमा अपनी सोलह कला से पूरा चमकता है, वैसे ही जब हम अभिमान को छोड़ देते हैं, तभी हम पूरे होते हैं। चंद्रमा में दाग है, फिर भी वो पूज्य है। वो पूरा है। हम भी अपने दागों के साथ पूरे हो सकते हैं, बस अभिमान छोड़ना होगा कि ‘मैं परफेक्ट हूं।’ 
दूसरी, इस रात खीर बाहर इसलिए रखते हैं क्योंकि जैसे खीर चंद्रमा की शीतल किरणों से मीठी हो जाती है, वैसे ही हमारा मन भी प्रेम की शीतलता से मीठा हो जाता है। क्रोध की आग में तपे हुए मन को एक रात की शीतलता चाहिए।  
खीर को रखने का सबसे शुभ समय रात 10 बजे से लेकर सुबह 4-5 बजे तक माना जाता है। खीर बनाकर छत पर, खुले आसमान के नीचे, उस पर महीन मलमल का कपड़ा ढक कर रख दीजिए ताकि धूल न पड़े पर चाँदनी सीधी भीतर उतर सके। फिर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कीजिए। कहते हैं इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, और उसकी हर किरण में अमृत घुला होता है। अगर पूरी रात न रख सकें तो कम से कम रात 10 बजे से 12:30 बजे तक जरूर रखिए, यही अमृत-काल कहलाता है। 
अब सवाल है कि खीर किस पात्र में रखी जाए? सबसे श्रेष्ठ है चाँदी का बर्तन, क्योंकि चाँदी चंद्रमा की ही धातु मानी जाती है। और दूसरा श्रेष्ठ है मिट्टी का सकोरा, क्योंकि मिट्टी प्रकृति से जुड़ी है। इसके बाद कांसे या स्टील का बर्तन भी चल सकता है। ध्यान रहे, खीर हमेशा गाय के दूध और चावल से ही बनाएं। 
और हां, यही वो रात है जब समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसीलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा कहते हैं। ‘कोऽजागर’ संस्कृत में पूछा जाता है—‘कौन जाग रहा है?’ माँ लक्ष्मी उस घर में आती हैं, जहाँ कोई अपने भीतर के मोह को छोड़कर जाग रहा हो। वो जागना आंखों का नहीं, आत्मा का जागना है। 
इसलिए इस शरद पूर्णिमा की रात, एक काम करना। सारे काम दस मिनट के लिए रोक देना। बस दस मिनट के लिए अपना मन चाँद के नीचे रख देना। कुछ मत मांगना, बस बैठना। हो सकता है, बहुत दिनों बाद तुम्हें तुम्हारी अपनी मुरली की आवाज सुनाई दे - जो कह रही हो-‘आ गया? मैं तो यहीं हूँ, तेरे इसी मन में। तू ही तो कहीं और भटक रहा था।’ इस शरद पूर्णिमा, खीर तो रख ही देना, पर साथ में मन भी धर आना चाँद तले। 
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

17 October, 2026

श्रीराम से वैर या मोक्ष की तलाश?

shriram se vair ya moksha ki talaash ravan ka rahasya

“लोग कहते हैं श्रीराम ने रावण को मारा, मैं कहता हूं जब राम जागता है तो रावण खुद मर जाता है। इस एक लाइन में दशहरे का सारा रहस्य छिपा है। हम हर साल बाहर रावण का पुतला जलाते हैं, पर क्या हमने कभी अंदर के रावण को देखा है? आज हम बाहर की कहानी नहीं, अंदर की कहानी को समझने की कोशिश करेंगे, क्योंकि असली दशहरा बाहर नहीं, अंदर घटता है। 

  दशहरा का असली अर्थ क्या है? दश + हरा का रहस्य  

दशहरा का अर्थ लोग केवल दशहरा ही समझते हैं, पर इसकी एक प्रतीकात्मक व्याख्या है—दश + हरा। दश मतलब दस और हरा मतलब हारा हुआ, समाप्त किया हुआ। यानी दस बुराइयों को हराने वाला दिन। हम कहते हैं रावण के दस सिर थे, पर क्या सच में किसी इंसान के दस सिर हो सकते हैं? ये दस सिर हमारे अंदर की दस वृत्तियां भी मानी जा सकती हैं, जिनके साथ हम रोज जीते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, भय, आलस्य और हिंसा। जब तक ये दस हमारे अंदर जिंदा हैं, तब तक जीवन में असली दशहरा नहीं आता। जिस दिन ये दस हार जाते हैं, उसी दिन जीवन में राम का जन्म होता है और तभी दशहरा पूरा होता है।

रा + म = राम, रावण के नाम में ही छिपे थे राम

यहां एक बात उल्लेखनीय है, जिसे बहुत कम लोगों ने इस दृष्टि से देखा है। रावण का पहला अक्षर है ‘रा’ और उसकी धर्मपत्नी मंदोदरी का पहला अक्षर है ‘म’। अगर दोनों को जोड़ दें तो रा + म = राम। कितना बड़ा रहस्य है यह! रावण के घर में, उसके नाम में और उसकी पत्नी के नाम में भी राम छिपे हुए दिखाई देते हैं। यही तो हमारे साथ भी होता है। राम हमारे अंदर ही बैठे हैं, हमारे हर शब्द में, हमारी हर सांस में हैं, पर हम उन्हें बाहर खोजते रहते हैं।
रावण जानता था कि राम कौन हैं। वह श्रीराम की शक्ति, मर्यादा और सत्य को पहचानता था और मन से उन्हें स्वीकार भी करता था। फिर भी वह उनके सामने झुकने को तैयार नहीं था। इसके पीछे केवल उसका अहंकार नहीं, बल्कि एक गहरी सोच की कल्पना भी की जाती है। वह अपनी प्रजा और अपने भाइयों के सामने जान-बूझकर अहंकार और वैर का प्रदर्शन करता रहा। उसे भय था कि यदि वह स्वयं राम की महानता स्वीकार कर लेगा, तो राक्षस जाति के भीतर चला आ रहा वैर और प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा। रावण चाहता था कि यह संघर्ष अपने अंतिम परिणाम तक पहुंचे। उसकी दृष्टि में श्रीराम के हाथों उसका अंत केवल उसका अंत नहीं था, बल्कि पूरी राक्षस जाति के लिए मुक्ति का मार्ग बन सकता था। वह जानता था कि जब मोक्ष की घड़ी आएगी, तब वह अकेला नहीं होगा, उसकी जाति भी उसी मुक्ति में सम्मिलित होगी। इसलिए उसका श्रीराम के विरुद्ध खड़ा होना केवल विरोध नहीं था; उसके पीछे एक ऐसी सोच की कल्पना की जाती है, जिसमें अपनी जाति के कल्याण और अंततः उसके उद्धार की भावना छिपी थी। बाहर से वह श्रीराम का विरोधी बना रहा, लेकिन भीतर से वह उस सत्य को पहचानता था, जिसके सामने अंततः उसे भी जाना था।
अब सवाल उठता है कि रावण बुरा था क्या? हम बचपन से सुनते आए हैं कि रावण राक्षस था, इसलिए बुरा था। लेकिन क्या किसी व्यक्ति को केवल उसके बाहरी रूप से समझा जा सकता है? अगर रावण केवल बुराई का प्रतीक था, तो फिर उसके चरित्र में इतना ज्ञान, तप, विद्या और शिवभक्ति क्यों दिखाई देती है? रावण महाज्ञानी था, वेदों का ज्ञाता था, संगीत और शास्त्रों का विद्वान था और भगवान शिव का महान भक्त था। उसके व्यक्तित्व में ज्ञान भी था, सामर्थ्य भी था, तप भी था और अहंकार भी था। यही रावण के चरित्र का सबसे बड़ा रहस्य है—एक व्यक्ति के भीतर अच्छाई और बुराई दोनों साथ रह सकती हैं।
एक रहस्यात्मक व्याख्या यह भी कहती है कि रावण जानता था कि वह राक्षस योनि में है। वह शिव का भक्त था और उसके विश्वास के अनुसार भक्त को भगवान स्वयं नहीं मारते। मुक्ति उसे श्रीराम के हाथों ही मिल सकती थी। रावण जानता था कि श्रीराम के हाथों उसका अंत होगा तो उसे इस योनि से मुक्ति मिल सकती है, लेकिन उसकी सोच केवल अपने तक सीमित नहीं थी। उसने सोचा कि अगर मैं अकेला मुक्त हो गया तो मेरी प्रजा का क्या होगा? मेरी पूरी राक्षस जाति इसी अंधकार में रह जाएगी। इसलिए उसने ऐसा मार्ग चुना, जिसके कारण श्रीराम को स्वयं लंका तक आना पड़े और जब राम आएं तो केवल उसका ही नहीं, पूरी राक्षस जाति का उद्धार हो।
कहा जाता है कि रावण के महल में एक गुप्त स्थान था, जहां वह अकेला बैठकर श्रीराम का स्मरण करता था। बाहर वह श्रीराम का शत्रु था, लेकिन भीतर राम के चरणों में समर्पित एक भक्त। अंत में जब उसकी सेना, उसके भाई और उसके बेटे सब चले गए और राक्षस जाति का अंत सामने दिखाई देने लगा, तब वह स्वयं श्रीराम का स्मरण करते हुए अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा करने लगा। उस रहस्यात्मक कल्पना में वह प्रभु से कहता है—प्रभु, मैं जानता हूं मेरा अंत समय आ गया है और मैं चाहता हूं कि मेरा अंत आपके हाथों हो। कितनी विचित्र सोच थी उसकी। वह केवल मरना नहीं चाहता था, वह मोक्ष चाहता था और वह भी अकेले नहीं, सबके साथ।सभी कहते हैं रावण ने सीता का हरण किया, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जिस रावण के पास सोने की लंका थी, वह सीता को अशोक वाटिका में क्यों रखेगा? वह चाहता तो उन्हें अपने महल में, रानियों के बीच रख सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा? 

लोक-व्याख्याओं में इसके अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। एक रहस्यात्मक व्याख्या यह भी कहती है कि माता सीता उस समय वनवास में थीं, इसलिए रावण ने उन्हें महल में न रखकर अशोक वाटिका में रखा, जो वन का ही एक हिस्सा थी। उसने माता सीता को कभी स्पर्श तक नहीं किया—ऐसी मान्यता भी इस कथा में कही जाती है। उसके सामने केवल एक स्त्री नहीं थी, उसके सामने शक्ति थी, भक्ति थी और मर्यादा थी। भक्ति को छुआ नहीं जाता, भक्ति को तो पूजा जाता है।
यहां से एक प्रश्न उठता है—फिर वह कौन-सा निर्णय था, जिसने इस पूरी कथा को उसके अंतिम परिणाम तक पहुंचा दिया? माता सीता का हरण। अब इसे आप शूर्पणखा की जिद कहें, नियति का विधान कहें या फिर रावण का अपनी राक्षस जाति को मोक्ष दिलाने का संकल्प—इस पर विचार करना हमें स्वयं है। हम अक्सर हर घटना को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं। हम कहते हैं—रावण ने सीता का हरण किया, बस यहीं तक हमारी सोच रुक जाती है। लेकिन क्या हमने कभी उस घटना के पीछे छिपी सोच, उस रहस्य और उस गहरे उद्देश्य को समझने का प्रयास किया?

असली दशहरा बाहर नहीं, अंदर मनाना है 

आज दशहरे के दिन हम रावण का पुतला जलाकर जश्न मनाते हैं। कभी सोचा है कि हम जिस रावण के पुतले का दहन कर रहे हैं, उसके पीछे रावण का संकल्प था, उसकी सोच थी और राक्षस जाति के उद्धार की एक रहस्यात्मक कथा थी। लेकिन हम किस सोच से उसके जलाने का संकल्प ले रहे हैं? हमारी सोच केवल नकारात्मकता को खत्म करने तक सीमित है। हमने कभी सकारात्मकता को अपनाने की नहीं सोची। हम हर साल रावण जलाते हैं, पर क्या हमारे अंदर का काम, क्रोध और अहंकार जलता है? नहीं जलता, क्योंकि हम बाहर का रावण जला रहे हैं, अंदर का नहीं।
इसलिए इस दशहरे पर एक काम करो। बाहर का पुतला तो दुनिया जलाएगी, तुम अंदर का रावण जलाओ। तुम्हारे अंदर जो ‘रा’ और ‘म’ अलग-अलग पड़े हैं, उन्हें जोड़ो। जब रा और म जुड़ेंगे, तभी अंदर राम जागेगा और जिस दिन अंदर का राम जाग गया, उस दिन अंदर का रावण खुद मर जाएगा। यही दशहरे का असली रहस्य है—रावण को बाहर जलाने से पहले राम को भीतर जगाना।

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari  

16 October, 2026

शरीर सजता रहा, आत्मा कब सजेगी?


नवरात्र के दिन चल रहे हैं। चारों ओर माता की भक्ति का वातावरण है। कहीं पूजा-अर्चना हो रही है, कहीं मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ है, कहीं गरबा और डांडिया की धूम है तो कहीं लोग नौ दिनों तक व्रत और उपवास रखकर मां की आराधना में लीन हैं। नवरात्र हमारे लिए केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, संयम और साधना से जुड़ा हुआ अवसर है। इन दिनों बहुत से लोग अपने खान-पान में बदलाव करते हैं, फलाहार करते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज रखते हैं। इसके पीछे धार्मिक आस्था के साथ-साथ आत्मसंयम की भावना भी जुड़ी हुई है। लेकिन नवरात्र के इन नौ दिनों में एक विचार ऐसा भी है, जिस पर शायद हमें थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए।

हम व्रत रखकर अपने शरीर के भोजन को तो नियंत्रित कर रहे हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि हमारे भीतर रहने वाली आत्मा को हम क्या दे रहे हैं? शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हम प्रतिदिन कितनी मेहनत करते हैं, लेकिन आत्मिक विकास और भीतर की शांति के लिए हम कितना समय निकालते हैं? 
सुबह उठते ही हम अपने शरीर की चिंता शुरू कर देते हैं। स्नान करते हैं, साफ कपड़े पहनते हैं, बालों में तेल लगाते हैं, शैम्पू करते हैं, चेहरे पर क्रीम लगाते हैं, धूप और धूल से बचने के उपाय करते हैं। शरीर पर थोड़ी-सी गंदगी दिखाई दे जाए तो हमें अच्छा नहीं लगता। हम तुरंत उसे साफ कर लेते हैं। शरीर को सुंदर और आकर्षक बनाए रखने के लिए भी हम न जाने कितने प्रयास करते हैं। यह सब स्वाभाविक भी है, क्योंकि शरीर हमारे जीवन का माध्यम है और उसकी देखभाल करना आवश्यक है। लेकिन इसी शरीर के भीतर जो मन है, जो चेतना है, जिसे हम आत्मा के नाम से जानते हैं, उसकी सफाई और देखभाल के बारे में हम कितनी बार सोचते हैं? मन में क्रोध जमा हो रहा हो, किसी के प्रति ईर्ष्या हो, किसी से वर्षों पुरानी नाराजगी हो, अहंकार बढ़ता जा रहा हो, दूसरों की सफलता देखकर मन परेशान होता हो या नकारात्मक विचार लगातार भीतर जगह बना रहे हों, तो क्या हम उतने ही सजग होते हैं जितने शरीर पर लगी धूल को लेकर होते हैं? शरीर की गंदगी हमें दिखाई देती है, इसलिए हम उसे साफ कर लेते हैं, लेकिन मन की गंदगी दिखाई नहीं देती, इसलिए अक्सर उसे नजरअंदाज कर देते हैं। 
यही वे नौ दिन हैं, जब नवरात्र हमारे लिए एक सुंदर अवसर बन सकता है। व्रत को केवल भोजन छोड़ने या अपनी पसंद की चीजों से कुछ दिनों तक दूरी बनाने तक सीमित न रखकर यदि हम इसे अपने भीतर झांकने का अवसर बना लें, तो इन नौ दिनों का अर्थ कहीं अधिक गहरा हो सकता है। शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है, लेकिन आत्मा को भी अपने प्रकार के पोषण की आवश्यकता होती है। प्रेम आत्मा का भोजन हो सकता है, करुणा उसका भोजन हो सकती है, सत्य उसका भोजन हो सकता है, प्रार्थना और ध्यान उसका भोजन हो सकते हैं, किसी जरूरतमंद की सहायता करना उसका भोजन हो सकता है और किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना भी आत्मा के लिए एक प्रकार का पोषण हो सकता है।   
इस बार मैंने भी नौ दिन व्रत रखने का संकल्प लिया है। पहले दो दिन शरीर में कुछ कमी और सुस्ती महसूस हुई, लेकिन तीसरे दिन के बाद मुझे अपने भीतर एक अलग तरह की ऊर्जा का अनुभव होने लगा। ऐसा लगा जैसे शरीर कुछ हल्का हो गया हो, जैसे शरीर पर पड़ा कोई बोझ थोड़ा उतर गया हो। पिछले कुछ समय से जिस अनिद्रा और बेचैनी का अनुभव कर रहा था, उसमें भी मुझे व्यक्तिगत रूप से राहत महसूस हुई। रात को बिस्तर पर जाते ही नींद आने लगी और सुबह उठने पर शरीर में एक ताजगी और नई ऊर्जा का अनुभव हुआ। मैं इसे किसी चिकित्सा दावे के रूप में नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत अनुभव के रूप में कह रहा हूं। 
अब तक इन व्रत के दिनों में मेरा भोजन भी बहुत सीमित रहा है। सुबह एक गिलास दूध और दिन में कभी एक केला तो कभी एक सेब लेता रहा हूं। शाम को कभी साबूदाना, कभी उबले हुए आलू और कभी थोड़ा-सा दही लिया है। मात्रा इतनी ही रखी कि शरीर को आवश्यक सहारा मिलता रहे; पेट भरने या स्वाद के लिए खाने का विचार नहीं रहा। इन दिनों मेरा ध्यान भोजन से अधिक संयम और साधना पर रहा है। मेरे लिए यह अनुभव केवल इतना नहीं है कि मैंने कुछ दिनों से कम भोजन किया है, बल्कि यह भी है कि जब हम अपनी आदतों पर थोड़ी लगाम लगाते हैं तो शरीर और मन दोनों को अपने भीतर झांकने का अवसर मिलता है। हालांकि हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है और उपवास सबके लिए एक जैसा उपयुक्त नहीं हो सकता। विशेष रूप से किसी बीमारी, गर्भावस्था या नियमित दवाओं की स्थिति में उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। 
हमारे सनातन जीवन-दर्शन में व्रत और उपवास की परंपरा सदियों से चली आ रही है। समय के साथ हमने इसे केवल भोजन से दूरी बनाने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे साधना, संयम और आत्मनियंत्रण से जोड़ दिया। शायद यही कारण है कि व्रत का आध्यात्मिक पक्ष इतना महत्वपूर्ण बन गया। उपवास में केवल पेट को विराम देना ही उद्देश्य नहीं रहा, बल्कि इंद्रियों को संयमित करना, मन को एकाग्र करना और अपने भीतर की शक्ति को पहचानना भी इसकी भावना का हिस्सा रहा है। 
आज विज्ञान भी अलग-अलग प्रकार के उपवास और सीमित समय में भोजन करने के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों का अध्ययन कर रहा है, हालांकि इसके लाभ और जोखिम व्यक्ति तथा उपवास के तरीके के अनुसार अलग हो सकते हैं और इस विषय पर शोध अभी जारी है। मेरे अपने अनुभव ने मुझे इतना जरूर महसूस कराया कि भोजन की मात्रा और समय में संयम रखने से मुझे इस बार शरीर में हल्कापन, नींद में सुधार और ताजगी का अनुभव हुआ। इसलिए मेरे लिए उपवास केवल आध्यात्मिक पोषण का माध्यम नहीं रहा, बल्कि शरीर के प्रति सजग होने और अपनी जीवनशैली को कुछ समय के लिए अनुशासित करने का अवसर भी बना।
इस बार अगर हम नौ दिनों के लिए भोजन में संयम के साथ अपने व्यवहार में भी थोड़ा संयम जोड़ दें तो शायद नवरात्र हमारे जीवन में एक अलग ही परिवर्तन लेकर आए। हम कुछ समय प्रार्थना में बैठ सकते हैं, कुछ समय शांत होकर अपने भीतर झांक सकते हैं और स्वयं से पूछ सकते हैं कि आखिर हम अपने जीवन में क्या हासिल करना चाहते हैं। 
जीवन की सच्चाई यही है कि शरीर एक दिन यहीं रह जाएगा। जीवन की यात्रा में एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य को इस शरीर को छोड़कर आगे बढ़ना पड़ता है। तब हमारे साथ क्या जाएगा? शायद यही प्रश्न हमें भीतर तक सोचने के लिए मजबूर कर सकता है। तब यह महत्व कम हो जाएगा कि हमने कौन से कपड़े पहने थे, हमारे पास कितनी वस्तुएं थीं या लोग हमारे बाहरी रूप को कितना पसंद करते थे। महत्व शायद इस बात का होगा कि हमने अपने भीतर क्या संजोया था, हमने दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया था, कितने लोगों के लिए हमारे मन में प्रेम था, कितनों के दुख को समझा था और अपने जीवन को कितना सार्थक बनाने का प्रयास किया था। 
इसीलिए नवरात्र को मैं शरीर के साथ-साथ आत्मा के पोषण का भी अवसर मानता हूं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने भीतर भी थोड़ी सफाई करें? कई बार एक शांत क्षण, एक सच्ची प्रार्थना, किसी के प्रति क्षमा का भाव या किसी जरूरतमंद के लिए किया गया छोटा-सा अच्छा काम भी भीतर बहुत कुछ बदल सकता है। 
इस नवरात्र जब हम माता के सामने दीप जलाएं और व्रत का संकल्प लें, तो एक बार स्वयं से यह प्रश्न जरूर करें—मैं अपने शरीर को तो भोजन दे रहा हूं, लेकिन अपनी आत्मा को क्या दे रहा हूं? क्या उसे केवल पूजा के कुछ मिनट मिलते हैं या मेरे पूरे जीवन में उसके लिए कोई स्थान है? क्या मैं अपने मन को अच्छे विचारों से भर रहा हूं? क्या मेरे भीतर दूसरों के लिए प्रेम और करुणा बढ़ रही है? इन प्रश्नों के उत्तर शायद तुरंत न मिलें, लेकिन प्रश्न स्वयं में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कभी-कभी जीवन बदलने के लिए किसी बड़े उत्तर की नहीं, केवल एक सच्चे प्रश्न की जरूरत होती है। 
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

13 October, 2026

नवरात्रि में खरीदने का आत्मीय सुख


कल तक हम बाज़ार में सामान ढूँढ़ते थे, आज हम बाज़ार में भावना ढूँढ़ रहे हैं। मैंने ‘खरीदारी की बदलती दुनिया’ शीर्षक से लिखा था कि सब कुछ उँगलियों पर आ गया है। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन, जब सुबह-सुबह घंटियों की आवाज़ के साथ घटस्थापना हुई, तो लगा कि कुछ चीज़ें आज भी उँगलियों पर नहीं, हथेलियों पर ही महसूस होती हैं। 

नवरात्रि में बाज़ार सिर्फ बाज़ार नहीं रहता, वह मंदिर की सीढ़ी बन जाता है। जहाँ सनातनी परिवार नवरात्रि की तैयारी के लिए सामान लेने पहुँचते हैं। आपने देखा होगा, अमावस्या की शाम से ही बाज़ार का रंग बदल जाता है। लाल चुनरी का वह लाल, ऐप की स्क्रीन वाला लाल नहीं है। उस लाल में धूप की गंध है, कुमकुम का स्पर्श है। 

कलश के लिए जो नारियल हम ढूँढ़ते हैं, उसे हम सिर्फ उसकी कीमत देखकर नहीं चुनते। उसे हाथ में लेकर हिलाते हैं, उसकी आवाज़ सुनते हैं। दुकानदार भी मुस्कुराकर कह देता है, “बहन जी, ले लो, माँ खुश होंगी।” यह वाक्य किसी एल्गोरिदम में नहीं लिखा। 

यही तो अंतर है। साल भर हम प्रोडक्ट खरीदते हैं, नवरात्रि में हम प्रतीक खरीदते हैं। साल भर हम कहते हैं, ‘यह सस्ता मिल रहा है, ले लेते हैं।’ नवरात्रि में हम कहते हैं, ‘यह माँ को अच्छा लगेगा, ले लेते हैं।’ खरीदने वाला वही हाथ है, लेकिन उस हाथ के पीछे की नीयत बदल जाती है। 

कल मैंने एक महिला को एक छोटी-सी दुकान पर ज्वारे उगाने के लिए मिट्टी के सकोरे देखते हुए देखा। दुकानदार ने कहा, ‘मैडम, यही सकोरा आपको ऑनलाइन आधे दाम में मिल जाएगा।’

महिला मुस्कुराकर बोली, ‘भैया, मिट्टी का सकोरा ऑनलाइन खरीदने में वह बात कहाँ? इसे हाथ में लेकर देखना, इसकी मिट्टी को महसूस करना और फिर खरीदना, यह अलग ही अनुभव है। इसे हाथ से छूकर फिर खरीदने का जो आत्मीय सुख मिलता है, वह ऑनलाइन कहाँ?’
 

सच कहें तो हम टेक्नोलॉजी के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें सिर्फ खरीदा नहीं जाता, महसूस भी किया जाता है। 

इसीलिए तो नवरात्रि की खरीदारी आज भी ऑफलाइन ज्यादा महसूस होती है। चुनरी को छूना पड़ता है, लहंगे के घेर को घुमाकर देखना पड़ता है, दीये की मिट्टी को हाथ में लेकर परखना पड़ता है। ये चीज़ें ‘ऐड टू कार्ट’ में नहीं, अंजुरी में आती हैं। 

बाज़ार में आज भीड़ है, लेकिन वह भीड़ शोर नहीं, श्रद्धा है। हर कोई कुछ न कुछ लेकर जा रहा है, लेकिन थैले में सामान कम और संकल्प ज्यादा है। कोई नौ दिन के व्रत का संकल्प लेकर जा रहा है, कोई नई शुरुआत का। कोई माँ की खुशी को ध्यान में रखकर सामान चुन रहा है और खुशी-खुशी अपने घर की ओर लौट रहा है। 

शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में बाज़ार को कभी सिर्फ व्यापार की जगह नहीं माना गया। हमारे यहाँ बाज़ार भी पूजा का एक रूप बन जाता है, जहाँ हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से अपने परिवार, अपनी परंपरा और अपने विश्वास के लिए कुछ चुन-चुनकर घर लाते हैं। 

आज जब आप बाज़ार जाएँ, तो सिर्फ सामान की सूची मत देखिए। थोड़ा ठहरिए। उस लाल चुनरी को छूकर देखिए। उस कलश वाले नारियल को हाथ में लेकर सुनिए। उस छोटे से मिट्टी के दीये को उठाकर देखिए। 

शायद आपको महसूस हो कि आप बाज़ार में नहीं, माँ को ढूँढ़ रहे हैं। माँ कहीं बाहर नहीं हैं। वह उसी लाल चुनरी में हैं, उसी मिट्टी के दीये में हैं, उसी छोटे से सकोरे में हैं, जिसे आप ज्वारे उगाने के लिए घर ले जा रहे हैं। 

शायद वह आपको देखकर चुपचाप मुस्कुरा रही हैं और कह रही हैं, ‘तुमने मेरे लिए इतने प्रेम से कुछ चुना है, तो मैं भी तुम्हारे जीवन में सुख, शांति और विश्वास भरने का आशीर्वाद क्यों न दूँ?’ 

शायद यही नवरात्रि की सबसे बड़ी खरीदारी है। हम सामान लेकर बाज़ार से लौटते हैं, लेकिन माँ का आशीर्वाद अपने साथ लेकर घर आते हैं। और तब समझ आता है, बाज़ार में हम माँ को ढूँढ़ने गए थे, लेकिन लौटे तो माँ हमारे भीतर ही मिल गईं। 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

11 October, 2026

खरीदारी की बदलती दुनिया


एआई ने आपके खरीदारी का तरीका बदल दिया है। आप सोचेंगे कैसे। जी हां, आम दुकानदार से लेकर बड़े ब्रांड तक आज यही सोच रहे हैं। कुछ महीने पहले तक हम कुछ भी खरीदने के लिए गूगल पर सर्च करते थे, फिर अमेजन, फ्लिपकार्ट या मिंत्रा पर जाते थे, कीमत की तुलना करते थे, रिव्यू पढ़ते थे और फिर ऑर्डर करते थे। अब पूरा खेल बदल गया है।

चैटजीपीटी, जेमिनी, मेटा एआई और परप्लेक्सिटी जैसे एआई टूल्स ने शॉपिंग का बटन अपनी चैट के अंदर ही लगा दिया है। आप सिर्फ लिखते हैं, मुझे पंद्रह हजार के अंदर बेस्ट रनिंग शूज बताओ, और एआई सिर्फ लिस्ट नहीं देता। वह आपकी उपलब्ध जानकारी के आधार पर आपका साइज, आपका बजट, आपके पुराने पसंदीदा ब्रांड और आपके पैर की चौड़ाई जैसी पसंद को ध्यान में रखकर सीधे खरीदने का लिंक दे सकता है। 

यहीं पर गूगल की नींद उड़ी हुई है। अभी तक गूगल सर्च का राजा था। सारा ट्रैफिक वहीं से आता था। ब्रांड गूगल विज्ञापन पर पैसा लगाते थे ताकि आप उनकी साइट पर आएं। लेकिन एआई शॉपिंग टूल्स ने बीच के पूरे स्टेप को काट दिया है। ओपनएआई ने अपने शॉपिंग फीचर्स को और तेज कर दिया है, जिसमें आप चैट में ही प्रोडक्ट की फोटो देख सकते हैं, साइज सेलेक्ट कर सकते हैं और जहां यह सुविधा उपलब्ध हो, वहां दूसरी वेबसाइट पर गए बिना खरीदारी पूरी कर सकते हैं। इसे ही कहते हैं एआई एजेंट आपका पर्सनल शॉपर बन गया है। 

उसे पता होता है कि आपको किस तरह के कपड़े पसंद हैं, आपने पिछले महीने क्या देखा था और क्या पसंद किया था। आपकी पत्नी का जन्मदिन कब है, यह भी उसे पता है। वह खुद आपको याद दिलाएगा कि तुम्हें गिफ्ट लेना था, ये तीन ऑप्शन सबसे अच्छे हैं। गूगल पर आप सर्च करते थे, एआई पर आप बात करते हैं। आप उससे कई बार सवाल पूछ सकते हैं। छोटी से छोटी चीज के बारे में पूरी जानकारी ले सकते हैं। यही सबसे बड़ा फर्क है। इसका असर छोटे बिजनेस पर सबसे ज्यादा दिख रहा है। 

पहले एक छोटी दुकान को गूगल पर रैंक करने के लिए एसईओ, विज्ञापन और इंस्टाग्राम रील्स सब कुछ करना पड़ता था। अब अगर उसका प्रोडक्ट एआई के कैटलॉग में जुड़ा है तो एआई खुद उसे सही कस्टमर के सामने ले आता है। वह अपने आप एआई शॉपिंग रिजल्ट में दिखने लगता है। अब ऑर्डर सीधे एआई चैट से आ रहे हैं, गूगल से नहीं। एआई सिर्फ सस्ता प्रोडक्ट नहीं बेचता, वह भरोसा बेचता है। 

सवाल उठता है कि क्या गूगल खत्म हो जाएगा। जवाब है नहीं, लेकिन गूगल की भूमिका बदल जाएगी। गूगल अभी भी प्रोडक्ट खोजने के लिए बड़ा है, लेकिन आखिर में खरीदने की जगह अब एआई चैट बन रही है। गूगल ने भी अपना एआई मोड और शॉपिंग ग्राफ तेज किया है, लेकिन लोगों का भरोसा धीरे-धीरे चैट पर शिफ्ट हो रहा है। वजह है वहां फालतू की चीजें कम हैं। गूगल पर आप शूज सर्च करो तो विज्ञापन, स्पॉन्सर्ड लिस्ट और अलग-अलग फीचर के बाद असली रिजल्ट आता है। लेकिन चैटजीपीटी पर आप शूज सर्च करो तो तीन साफ ऑप्शन मिलते हैं, वे क्यों अच्छे हैं इसकी वजह मिलती है और कुछ मामलों में सीधे खरीदारी का विकल्प भी मिल जाता है।

खरीदने वाले को या यूजर को वही चाहिए, कम कन्फ्यूजन और ज्यादा सफाई। जेन ज़ी में अधिकतर टिकटॉक या एआई चैट पर भी सर्च कर रहे हैं। भारत के लिए यह बदलाव और भी बड़ा है। यहां लोग पहले से ही वॉट्सऐप पर दुकानदार से चैट करके शॉपिंग करते हैं। एआई शॉपिंग उसी आदत को बड़ा बना रहा है। आप हिंदी में लिखो और एआई आपको उसी बजट में प्रोडक्ट दिखा देगा। इसमें गूगल ट्रांसलेट वाली फील नहीं, बल्कि एकदम देसी शॉपर वाली फील आती है।

लेकिन हर अच्छी चीज के साथ जोखिम भी है। एआई शॉपिंग में सबसे बड़ा सवाल भरोसे और प्राइवेसी का है। एआई को आपके बारे में उतनी जानकारी मिल सकती है, जितनी संबंधित सेवा को आपकी बातचीत, खाते, कनेक्टेड सेवाओं या आपकी अनुमति वाले अन्य स्रोतों से उपलब्ध होती है। आप क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कितना खर्च करते हैं—ऐसी जानकारी कुछ सेवाओं के पास हो सकती है। यहां तक कि अगर आप उससे पूछेंगे कि ‘मैं कौन हूं’ तो वह आपके उपलब्ध डेटा और बातचीत के आधार पर आपके बारे में जानकारी बता सकता है। आप किस तरह के इंसान हैं, आपको क्या पसंद है, आपके लिए क्या गलत है और क्या सही है। आपका लोगों के साथ व्यवहार कैसा है, यह भी उसे पता होता है। अगर यही डेटा गलत हाथ में चला गया तो क्या होगा। क्या वह वही प्रोडक्ट दिखा रहा है जो सबसे अच्छा है या वह दिखा रहा है जिस कंपनी ने उसे ज्यादा कमीशन दिया है। अभी तक इस पर कोई साफ नियम नहीं है। 

आने वाले दो साल में शॉपिंग का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। गूगल सर्च खत्म नहीं होगा, लेकिन वह सिर्फ रिसर्च का टूल बनकर रह जाएगा, खरीदने का टूल नहीं। खरीदने की जगह एआई चैट ले सकती है। 

कस्टमर के लिए सीख यही है कि एआई शॉपर बहुत काम का है, लेकिन आंख बंद करके उस पर भरोसा मत करो, कीमत एक बार खुद भी चेक कर लो। आखिर में पैसा आपका है, च्वाइस भी आपकी ही होनी चाहिए, चाहे सलाह एआई की ही क्यों न हो। 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari  

10 October, 2026

सफ़र भी छूट जाएगा


सफ़र भी छूट जाएगा, शहर भी छूट जाएगा,
जहाँ पहली साँस ली थी, वो घर भी छूट जाएगा।
जिस आँगन में गिर-गिर कर संभलना सीखा था,
माँ की दुआओं का वो असर भी छूट जाएगा।
जिन गलियों में बचपन हँसते-हँसते बीता था,
वक़्त के साथ वो मंज़र भी छूट जाएगा।
वो स्कूल का कमरा, वो मैदान, वो खिड़की वाला कोना,
जहाँ से दुनिया को पहली बार देखा था, वो नज़ारा भी छूट जाएगा।
वो लकड़ी की बेंच, वो चॉक की धूल, वो आखिरी घंटी का इंतज़ार,
वो दोस्तों संग लंच बाँट कर खाना, वो सब भी छूट जाएगा।
जिन हाथों ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया था,
एक दिन उन हाथों का सहारा भी छूट जाएगा।
सोचा न था कभी एक दिन ऐसा भी आएगा,
अपनों का साथ और उनका प्यार भी छूट जाएगा।
बस यादों का कारवाँ साथ रह जाएगा,
बाकी तो एक दिन सारा सफ़र ही छूट जाएगा।
क्योंकि सच यही है, ज़िंदगी चाहे जितनी अपनी लगे,
एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा,
इंसान सिर्फ़ यादों में रह जाएगा।
ज़िंदगी आगे बढ़ती जाएगी,
लोग अपनी-अपनी राहों में मस्त हो जाएंगे,
मुलाकातें कम और बातें छोटी होती जाएंगी,
सफ़र खत्म हो जाएंगे,
लेकिन कुछ लोग हमेशा मुसाफ़िर बनकर दिल में रह जाएंगे।

ये सिर्फ़ मेरी नहीं, हम सबकी कहानी है। ये लाइनें मैंने किसी किताब से नहीं लिखीं। ये तब लिखी गईं जब मैं अपने ही घर के आँगन को देख रहा था। जहाँ मैं गिर-गिर कर संभलना सीखा था, आज वहाँ सन्नाटा है। माँ की दुआओं का वो आँचल आज भी वहीं है, पिता का साया भी साथ में है, बस हम ही वहाँ नहीं हैं। 

हम सब कहीं न कहीं बेहतर ज़िंदगी के नाम पर अपना वो घर-आँगन छोड़ आए हैं। हमने सोचा था शहर में घर बना लेंगे, तो सब मिल जाएगा। घर तो बन गया, पर वो खिड़की वाला कोना नहीं मिला, जहाँ से पूरी दुनिया अपनी लगती थी। वो स्कूल की लकड़ी वाली बेंच नहीं मिली, जिस पर बैठ कर हमने बिना वजह घंटों हँसा था। दर्द ज्यादा तब होता है जब अहसास होता है कि जिन हाथों ने हमारी उँगली पकड़ कर हमें चलना सिखाया था, आज उन हाथों को हमारे सहारे की जरूरत है। 

हम अपनी राहों में इतने मस्त हो गए कि मुलाकातें सच में कम हो गईं और बातें सिर्फ़ इतनी रह गईं – ‘माँ कैसी हो, पापा जी कैसे हो?’ और उधर से बस एक ही जवाब आता है – ‘बेटा, थक गया होगा, थोड़ा आराम कर ले।’ कहाँ मिलेगा ऐसा बोलने वाला? दुनिया में कोई नहीं कहता ऐसा। उनका इतना भर कह देना, जैसे सारी थकान मिट जाती है। 

एक बार अपने माँ-बाप से भी उनका हालचाल पूछ लो। शायद वे भी इसी आस में जी रहे हैं कि बच्चे कम से कम पूछते तो हैं। इतना पूछना और उनकी हर साँस में आशीर्वाद का वो कारवाँ, जिसे देखा या सुना नहीं जा सकता, केवल महसूस किया जा सकता है... कभी सोचा है? सच यही है… 

सफ़र छूट जाते हैं, शहर छूट जाते हैं, लोग छूट जाते हैं। साथ कुछ रह जाता है तो बस यादों का कारवाँ। इसलिए अगर आज आप अपने गाँव में हो, अपने घर में हो, अपने माँ-बाप के पास हो, तो एक बार उस आँगन में बैठ जाओ। उस खिड़की वाले कोने को जी भर कर देख लो। 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

09 October, 2026

चेहरा सच नहीं बोलता!


जरा सोचिए... एक सुबह आप अपना मोबाइल खोलते हैं और सोशल मीडिया पर आपका ही एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में आप कुछ ऐसा कहते या करते दिखाई दे रहे हैं, जो आपने कभी किया ही नहीं। लोग उस वीडियो को सच मानकर आपके बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। आप सफाई देना चाहते हैं, लेकिन तब तक वह वीडियो हजारों लोगों तक पहुंच चुका है। डरावना लगता है न? लेकिन आज की कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में ऐसा केवल किसी प्रसिद्ध व्यक्ति या मशहूर हस्ती के साथ ही नहीं, बल्कि आप और मेरे जैसे किसी आम व्यक्ति के साथ भी हो सकता है। इसी तकनीक का एक खतरनाक रूप है डीपफेक।

डी पफेक एक ऐसी तकनीक है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या हाव-भाव को किसी दूसरे वीडियो या ध्वनि में इस तरह बदला जाता है कि वह बिल्कुल वास्तविक जैसा दिखाई या सुनाई दे। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के चेहरे को दूसरे व्यक्ति के वीडियो पर इस तरह लगा दिया जाए कि देखने वाले को वह उसी व्यक्ति का चेहरा लगे। इसी तरह किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करके उससे ऐसी बातें कहलवाई जा सकती हैं, जो उसने वास्तव में कभी कही ही नहीं थीं। 

डीपफेक का इस्तेमाल हमेशा गलत काम के लिए ही नहीं होता। फिल्म, मनोरंजन, शिक्षा और रचनात्मक कार्यों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इसका गलत इस्तेमाल कई गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके माध्यम से झूठी खबरें और अफवाहें फैलाई जा सकती हैं, किसी व्यक्ति की छवि खराब की जा सकती है, फर्जी बयान या भाषण तैयार किए जा सकते हैं और लोगों के साथ धोखाधड़ी या ठगी की जा सकती है। इसका इस्तेमाल लोगों को भ्रमित करने और गलत जानकारी फैलाने के लिए भी किया जा सकता है। इसलिए सोशल मीडिया पर कोई चौंकाने वाला वीडियो दिखाई दे तो उसे तुरंत सच मान लेना सही नहीं है। सवाल उठता है कि फिर असली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए गए वीडियो में अंतर कैसे पहचानें?  

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए गए वीडियो पहले की तुलना में काफी बेहतर हो चुके हैं। इसलिए केवल देखकर हर डीपफेक वीडियो को पहचानना आसान नहीं है। फिर भी कुछ संकेत ऐसे हैं, जिन पर ध्यान देकर किसी वीडियो के संदिग्ध होने का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

सबसे पहले चेहरे और आंखों पर ध्यान दें। क्या आंखों की गति असामान्य लग रही है? क्या पलकें सामान्य तरीके से झपक रही हैं? क्या चेहरे के भाव और आवाज एक-दूसरे से मेल खाते हैं? चेहरे की हरकतों और व्यक्ति के बोलने के तरीके के बीच किसी तरह का असामान्य अंतर दिखाई दे तो सावधान हो जाएं।  

इसके बाद होंठ और आवाज का मिलान देखें। ध्यान दें कि व्यक्ति के होंठ उसकी आवाज के साथ सही तरीके से चल रहे हैं या नहीं। यदि आवाज कुछ और कह रही हो और होंठों की गति उससे ठीक से मेल न खा रही हो तो वीडियो संदिग्ध हो सकता है। 

चेहरे के किनारों को भी ध्यान से देखें। कई बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से बदले गए चेहरे के आसपास हल्का धुंधलापन, असामान्य किनारे या त्वचा की बनावट में अंतर दिखाई दे सकता है। ऐसे में वीडियो को रोककर चेहरे, कान, बाल और गर्दन के आसपास के हिस्से को ध्यान से देखना उपयोगी हो सकता है।  

हाथ और उंगलियों पर भी ध्यान दें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री में हाथ और उंगलियां लंबे समय से एक चुनौती रहे हैं। हालांकि, तकनीक में काफी सुधार हुआ है, फिर भी कुछ वीडियो में उंगलियों का आकार, संख्या या उनकी गति असामान्य दिखाई दे सकती है।  

आवाज की स्वाभाविकता भी जांचें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार आवाज कभी-कभी बहुत साफ, एक जैसी या सपाट सुनाई दे सकती है। व्यक्ति के बोलने के सामान्य अंदाज, सांस लेने, शब्दों के बीच रुकने और भावनाओं पर ध्यान दें। यानी वीडियो में दिखाई देने वाली हर छोटी-बड़ी हरकत को ध्यान से देखना जरूरी है। हालांकि, केवल आवाज के आधार पर किसी वीडियो को असली या नकली नहीं माना जा सकता, क्योंकि आज की तकनीक काफी स्वाभाविक आवाज भी तैयार कर सकती है।  

आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े उपकरण इतने उन्नत हो चुके हैं कि केवल आंखों से देखकर डीपफेक की पहचान करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए वीडियो के स्रोत और उसके संदर्भ की भी जांच जरूर करें। यह वीडियो सबसे पहले किसने प्रसारित किया? क्या किसी विश्वसनीय समाचार माध्यम ने इसकी पुष्टि की है? क्या संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक सामाजिक माध्यम खातों पर भी यही वीडियो मौजूद है? क्या वीडियो का पूरा संस्करण उपलब्ध है? इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। अगर आपके पास ऐसा कोई संदिग्ध वीडियो आता भी है तो सबसे पहले उसे आगे प्रसारित करने से बचें। 

वीडियो की तारीख भी जांचें। कई बार कोई पुराना वीडियो किसी नई घटना के साथ जोड़कर प्रसारित कर दिया जाता है। पुराना वीडियो अपने आप में डीपफेक नहीं होता, लेकिन उसके साथ गलत दावा जोड़कर उसे भ्रामक बनाया जा सकता है। इसलिए वीडियो कब बनाया गया था और पहली बार कब प्रसारित हुआ था, इसकी जानकारी हासिल करना भी जरूरी है। 

कुछ सामाजिक माध्यम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े उपकरण कृत्रिम रूप से तैयार या बदली गई सामग्री के बारे में संकेत या पहचान उपलब्ध कराते हैं। हालांकि ऐसे किसी संकेत की मौजूदगी या अनुपस्थिति को अकेले अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। किसी वीडियो की वास्तविकता जानने के लिए उसके स्रोत, संदर्भ और अन्य विश्वसनीय जानकारियों की भी जांच करनी चाहिए। 

आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार वीडियो और वास्तविक वीडियो के बीच अंतर करना और भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में हमारी सबसे बड़ी ताकत सतर्कता और सही जानकारी होगी। किसी वीडियो को केवल इसलिए सच न मानें क्योंकि वह देखने में वास्तविक लगता है।  हमारी थोड़ी-सी सावधानी किसी गलत सूचना को हजारों लोगों तक पहुंचने से रोक सकती है। 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

08 October, 2026

भविष्य हमारी सोच से अलग?

 

सोचिए, आप घर बैठे किसी खास विषय के बारे में जानना चाहते हैं, लेकिन सवाल ऐसा है जिसका जवाब आपको आसानी से कहीं नहीं मिल रहा। आप सोचते हैं कि आखिर इसका सही उत्तर कहां मिलेगा? अब कल्पना कीजिए कि आपके सामने ऐसी तकनीक हो, जिससे आप अपना सवाल पूछें और कुछ ही क्षणों में जवाब मिल जाए। इतना ही नहीं, आप अपने मन की कल्पना के अनुसार घर का इंटीरियर डिजाइन तैयार करवा सकते हैं, नक्शा बनवा सकते हैं, किसी भी तरह की तस्वीर तैयार कर सकते हैं और अपने पहनावे से लेकर पूरे लुक तक के अलग-अलग सुझाव पा सकते हैं। आपको बस अपनी जरूरत और सोच के अनुसार निर्देश देना है और तकनीक उसी आधार पर आपके सामने परिणाम रख देती है। यही है कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जो अब केवल सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं रही, बल्कि हमारी कल्पना को तस्वीर और विचार को उपयोगी परिणाम में बदलने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रही है। पढ़ाई से लेकर खेती, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कारोबार तक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता धीरे-धीरे हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनती जा रही है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता दुनिया में तेजी से अपनी जगह बना रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, खेती, उद्योग और सरकारी सेवाओं सहित कई क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। इस समय पूरी दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर प्रतिस्पर्धा है और अलग-अलग देश इस तकनीक में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। 
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तैयारी के मामले में दुनिया के शीर्ष दस उभरते बाजारों में शामिल है। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है और इससे पता चलता है कि देश में इस नई तकनीक के लिए जरूरी क्षमता और आधार तेजी से तैयार हो रहा है। 
भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में निजी निवेश भी तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2024 तक भारत में निजी क्षेत्र का कृत्रिम बुद्धिमत्ता निवेश बढ़कर करीब 4.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां और निवेशक कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आने वाले समय की महत्वपूर्ण तकनीक के रूप में देख रहे हैं। भारत की बड़ी सॉफ्टवेयर कार्यशक्ति, सूचना प्रौद्योगिकी सेवा क्षेत्र, तकनीकी प्रतिभा और कम लागत में तकनीकी समाधान तैयार करने की क्षमता इसकी बड़ी ताकत है। भारत में अलग-अलग भाषाओं में करोड़ों लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए स्थानीय भाषाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवाएं विकसित होने पर इसका लाभ बड़े स्तर पर आम लोगों तक पहुंच सकता है। 
अब इसे जमीनी स्तर पर समझें तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिल सकता है। मौसम की जानकारी, फसल की स्थिति, सिंचाई का सही समय, कीट और रोग के शुरुआती संकेत तथा बाजार से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने में यह तकनीक मदद कर सकती है। यदि किसान अपनी भाषा में मोबाइल के माध्यम से ऐसी जानकारी प्राप्त कर सकें तो उन्हें छोटे-छोटे फैसले लेने में सुविधा होगी और अनावश्यक खर्च कम करने में भी मदद मिल सकती है। 
शिक्षा के क्षेत्र में भी इसका असर तेजी से दिखाई दे सकता है। विद्यार्थी किसी कठिन विषय को सरल भाषा में समझने, अभ्यास करने और अपनी जरूरत के अनुसार जानकारी प्राप्त करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल कर सकते हैं। गांव और छोटे शहरों के विद्यार्थियों के लिए यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, क्योंकि उन्हें कई विषयों की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सकती है। हालांकि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मिलने वाले हर उत्तर को तुरंत सही मानना उचित नहीं है। विद्यार्थियों को किताबों, शिक्षकों और विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी की पुष्टि भी करनी चाहिए। 
स्वास्थ्य के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता डॉक्टरों के काम में महत्वपूर्ण सहायता दे सकती है। मरीज की रिपोर्ट और उपलब्ध चिकित्सकीय आंकड़ों का विश्लेषण करने, बीमारी के कुछ शुरुआती संकेत पहचानने और चिकित्सकीय चित्रों को समझने में यह तकनीक उपयोगी हो सकती है। जरा कल्पना कीजिए, आने वाले समय का अस्पताल आज के अस्पताल से कितना अलग हो सकता है। क्या ऐसा संभव है कि अस्पताल में कई काम रोबोट संभाल रहे हों, मरीजों की जांच और रिपोर्ट का विश्लेषण कृत्रिम बुद्धिमत्ता कर रही हो और ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों को रोबोटिक तकनीक सहायता दे रही हो? यह भविष्य की एक संभावित तस्वीर हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉक्टरों की जगह पूरी तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता ले लेगी या हर ऑपरेशन की सफलता शत प्रतिशत होगी। चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अंतिम निर्णय और जिम्मेदारी प्रशिक्षित डॉक्टरों की ही रहनी चाहिए। सही तरीके से इस्तेमाल होने पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता डॉक्टरों का समय बचाने, बीमारी के संकेतों को जल्दी समझने और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 
अब रोजगार के क्षेत्र को देखें तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कुछ काम करने के तरीके जरूर बदलेंगे, लेकिन इसके साथ नए प्रकार के रोजगार भी पैदा होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेषज्ञ, आंकड़ा विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर विकास, साइबर सुरक्षा और तकनीकी सेवाओं से जुड़े लोगों की मांग बढ़ सकती है। भारत में वैश्विक क्षमता केंद्रों में काम करने वाले पेशेवरों की संख्या भी बढ़ी है और यह करीब 19 लाख से बढ़कर 23.6 लाख तक पहुंची है। यह भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता का एक संकेत है। ऐसे में युवाओं के लिए नई तकनीक सीखना जरूरी होगा, क्योंकि आने वाले समय में केवल पारंपरिक शिक्षा के बजाय तकनीकी और डिजिटल कौशल का महत्व भी बढ़ेगा। 
छोटे दुकानदार, व्यापारी और कारोबारी भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लाभ उठा सकते हैं। हिसाब-किताब को व्यवस्थित करने, ग्राहकों से जुड़ी जानकारी समझने, प्रचार सामग्री तैयार करने और रोजमर्रा के काम को आसान बनाने में यह तकनीक मदद कर सकती है। बैंकों और कंपनियों में भी कई प्रक्रियाओं को तेज करने और बड़ी मात्रा में आंकड़ों का विश्लेषण करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपयोगी हो सकती है। इससे समय की बचत हो सकती है और काम करने की क्षमता बढ़ सकती है। 
हालांकि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। तकनीकी शिक्षा, डिजिटल कौशल, इंटरनेट की पहुंच, निजी आंकड़ों की सुरक्षा और जिम्मेदार तरीके से कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल, इन सभी पर ध्यान देना जरूरी होगा। खासकर गांवों और छोटे शहरों में यह सुनिश्चित करना होगा कि नई तकनीक का लाभ केवल बड़ी कंपनियों और बड़े शहरों तक सीमित न रह जाए। 
हम अभी अमेरिका, चीन या किसी अन्य देश से भारत की तुलना नहीं कर रहे हैं। इतना जरूर कहा जा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब भविष्य की केवल कल्पना नहीं रह गई है, बल्कि हमारे जीवन का हिस्सा बनती जा रही है। आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आम जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari   

07 October, 2026

भीड़ से नहीं, भीतर से

 

 

मनुष्य जब झूठ बोलता है, तो सबसे पहले उसकी अंतरात्मा उसे कठघरे में खड़ा करती है। बाहर की दुनिया शायद उसके झूठ को स्वीकार कर ले, लोग उसके शब्दों पर विश्वास भी कर लें, लेकिन भीतर कहीं एक आवाज़ लगातार कहती रहती है—‘तुमने सच नहीं कहा।’ यही अंतरात्मा मनुष्य के भीतर ईश्वर की वह छोटी-सी लौ है, जो अंधेरे में भी सत्य का रास्ता दिखाती है।   

वि विडंबना देखिए कि जब वही मनुष्य एक दिन साहस करके सच बोलने का निर्णय करता है तो कई बार उसका सामना समाज के विरोध से होता है। लोग उससे नाराज़ हो जाते हैं, रिश्ते टूटने लगते हैं और कभी-कभी सच बोलने वाला ही गलत साबित कर दिया जाता है। यहां तक कि परिवार के लोग भी कहने लगते हैं कि सच बोलने की क्या जरूरत थी। सवाल यह है—क्या सच वास्तव में इतना असहनीय है?

हम सब चाहते हैं कि समाज में भ्रष्टाचार न हो, अन्याय न हो, धोखा न हो और झूठ का अंत हो। हम चाहते हैं कि कोई सच्चाई सामने लाए, गलत के खिलाफ आवाज़ उठाए और व्यवस्था को आईना दिखाए। जब वही आईना हमारे सामने आकर खड़ा होता है, तो हम अक्सर उसे तोड़ देना चाहते हैं। सत्य केवल दूसरों की गलतियां उजागर नहीं करता, वह हमें भी हमारे भीतर झांकने के लिए मजबूर करता है। सच हमारे पूर्वाग्रहों, स्वार्थों और सुविधाओं को चुनौती देता प्रतीत होता है। इसलिए समाज को अक्सर सत्य से नहीं, अपनी पसंद के सत्य से प्रेम होता है। वह सत्य, जिससे अपना भला होता दिखाई देता है। वास्तव में उसे पता होता है कि यह सत्य नहीं है, फिर भी वह जानकर अनजान बना रहता है।

दूसरी ओर, हम चाहते हैं कि सच सामने आए, लेकिन ऐसा सच, जिससे हमारी मान्यताओं, हमारे रिश्तों, हमारे हितों और हमारी प्रतिष्ठा पर कोई आंच न आए। यही आज की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है।

सच बोलना आसान नहीं होता। झूठ कभी-कभी लोगों को जोड़ देता है, क्योंकि वह सबको उनकी सुविधा के अनुसार जीने देता है। लेकिन सच दीवारें तोड़ता है। एक व्यक्ति यदि परिवार में किसी गलत बात के खिलाफ आवाज़ उठाता है, तो उसे ‘बदतमीज़’ कहा जा सकता है। कार्यालय में अन्याय के खिलाफ बोलता है तो उसे ‘समस्या पैदा करने वाला’ समझा जा सकता है या उसे चतुर की उपाधि दे दी जाती है। समाज में किसी पाखंड पर सवाल उठाता है तो लोग उसे ‘विद्रोही’ कह सकते हैं। अर्थात समस्या हमेशा सत्य में नहीं होती; समस्या यह होती है कि सत्य हमारे बनाए हुए आराम को भंग कर देता है। यदि हर व्यक्ति समाज की नाराज़गी के डर से चुप हो जाए, तो झूठ धीरे-धीरे व्यवस्था बन जाएगा और अन्याय फिर सामान्य बात लगने लगेगा।

अब आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो आध्यात्मिकता हमें यह सिखाती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा न्यायालय बाहर नहीं, उसके भीतर है। दुनिया हमें सम्मान दे या अपमान, स्वीकार करे या अस्वीकार—अंततः हमें अपनी अंतरात्मा के सामने ही खड़ा होना है। जब हम झूठ बोलते हैं, तो शायद दुनिया के सामने बच जाएं, लेकिन अपने भीतर से बचना कठिन होता है। जब हम सत्य बोलते हैं तो हो सकता है कि कुछ लोग हमसे दूर चले जाएं, हमारा साथ छोड़ दें। लेकिन आत्मा के भीतर एक गहरी शांति जन्म लेती है, जिसे केवल वही व्यक्ति महसूस कर सकता है जो सत्य के साथ खड़ा रहा हो।

यह भी सत्य है कि सत्य हमेशा तुरंत विजय नहीं देता। कभी-कभी सत्य बोलने वाले को अकेलेपन, उपेक्षा और विरोध से गुजरना पड़ता है। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह अकेलापन भी एक प्रकार की साधना है, एक तप है। सत्य की राह पर चलने वाला व्यक्ति भीड़ का नहीं, अपने विवेक का अनुसरण करता है। लेकिन सत्य बोलने का अर्थ कठोर होना नहीं है। सच बोलना जरूरी है, लेकिन सच को किस भावना से बोला जा रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सत्य के पीछे अहंकार है तो वह किसी को तोड़ सकता है। लेकिन यदि सत्य के पीछे करुणा है तो वही सत्य किसी जीवन को बदल सकता है। इसलिए सत्य के साथ विवेक और करुणा भी आवश्यक हैं।

अंततः फैसला हमें ही करना है। समाज कभी पूरी तरह हमारे साथ नहीं होगा। आज जो व्यक्ति सत्य के कारण विरोध झेल रहा है, संभव है कि कल वही सत्य समाज के लिए मार्गदर्शक बन जाए। इसलिए जीवन में एक समय ऐसा आता है जब हमें तय करना पड़ता है कि हमें लोगों की स्वीकृति चाहिए या अपनी अंतरात्मा की शांति। बेशक झूठ हमें भीड़ में जगह दिला सकता है, लेकिन सत्य हमें अपने भीतर जगह देता है। शायद जीवन की सबसे बड़ी जीत यही है कि रात को जब हम स्वयं से मिलें, तो हमारी अंतरात्मा हमसे यह न कहे—‘तुमने सच जानते हुए भी झूठ का साथ दिया।’

क्योंकि अंततः समाज की आवाज़ से बड़ी एक आवाज़ हमारे भीतर है—अंतरात्मा की आवाज़। इसलिए सच बोलिए, लेकिन अहंकार से नहीं, करुणा से। सत्य पर चलिए, लेकिन दूसरों को नीचा दिखाने के लिए नहीं, स्वयं को भीतर से ऊंचा उठाने के लिए। याद रखिए, ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता भीड़ की स्वीकृति से नहीं, अपने भीतर के सत्य से होकर जाता है।

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari   

05 October, 2026

रिश्तों में ‘हम’ से ‘मैं’

 

आधुनिक जीवनशैली में अब कई ऐसी चीजें देखने, सुनने और समझने को मिल रही हैं, जो कभी अजीब लगती हैं तो कभी जिज्ञासा पैदा करती हैं। आजकल मनोविज्ञान से जुड़े कई शब्द हमारी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गए हैं। इन्हीं में एक शब्द है—‘नार्सिसिस्ट’। पहले यह शब्द बहुत कम सुनने को मिलता था, लेकिन अब पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्रों, ऑफिस और यहां तक कि पारिवारिक रिश्तों के संदर्भ में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है। आखिर नार्सिसिस्ट कौन होता है? क्या अपने आपको महत्व देना ही नार्सिसिज्म है? 

दरअसल, अपने आपको महत्व देना कोई गलत बात नहीं है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी भावनाओं, विचारों और उपलब्धियों का सम्मान हो। समस्या तब शुरू होती है, जब व्यक्ति को लगने लगे कि वह दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण है और उसे हमेशा विशेष महत्व मिलना ही चाहिए।

मसलन, किसी व्यक्ति का बेटा सफल होता है और वह खुशी-खुशी अपने भाई या किसी रिश्तेदार को उसकी उपलब्धि बताता है। सामने वाला सामान्य रूप से कह सकता है—‘बहुत अच्छी बात है, बेटे को मेरी तरफ से बधाई।’ लेकिन यदि सामने वाला तुरंत अपनी या अपने परिवार की उपलब्धियां गिनाने लगे—‘हमारे रिश्तेदार के बेटे ने भी ऐसा किया था, बल्कि उसने तो इससे भी बड़ा काम किया था’—तो बातचीत का रंग बदल जाता है।
यहां सवाल केवल तुलना का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम दूसरे की खुशी में सहजता से शामिल हो पाते हैं? क्या हम सामने वाले की उपलब्धि को उसी रूप में स्वीकार कर सकते हैं, बिना उसे अपनी उपलब्धि से छोटा किए?
कई बार हम देखते हैं कि कुछ लोग बातचीत में लगातार स्वयं को या अपने परिवार को आगे रखते हैं। किसी ने घर बनाया तो उन्होंने उससे बड़ा घर बनाने की बात शुरू कर दी। किसी के बच्चे ने परीक्षा में अच्छा किया तो वे अपने बच्चे की उपलब्धि बताने लगे। किसी ने नौकरी में तरक्की की तो उन्होंने अपने किसी रिश्तेदार की उससे बड़ी सफलता का उदाहरण दे दिया।
ऐसा व्यवहार हमेशा नार्सिसिज्म नहीं होता। कुछ लोग स्वभाव से ही तुलना करने वाले या अपनी उपलब्धियां बताने के आदी होते हैं। लेकिन यदि यह व्यवहार लगातार बना रहे और व्यक्ति दूसरे की उपलब्धि को स्वीकार करने के बजाय हर बार खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करे, तो इसमें नार्सिसिस्टिक प्रवृत्ति दिखाई दे सकती है।
पति-पत्नी के रिश्तों में भी ऐसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं। कभी पत्नी किसी बात से नाराज होकर तीन-चार दिन तक पति से रूखा व्यवहार करती है। पति समझ नहीं पाता कि आखिर गलती क्या हुई। कुछ दिन बाद पत्नी फिर सामान्य हो जाती है और पति भी सोचता है कि चलो, बात खत्म हुई। लेकिन कुछ दिनों बाद वही स्थिति दोबारा पैदा हो जाती है। क्या यह नार्सिसिज्म है? जरूरी नहीं।
कई बार इसके पीछे मन में जमा पुराने गिले-शिकवे, संवाद की कमी, अपेक्षाएं पूरी न होना या भावनात्मक चोट हो सकती है। समस्या तब बढ़ती है, जब नाराजगी बातचीत का माध्यम बनने के बजाय दूसरे व्यक्ति को दंड देने या नियंत्रित करने का तरीका बन जाए।
इसी तरह केवल यह कहना कि आजकल बड़े-बड़े फ्लैटों में रहने और चारदीवारी तक सीमित रहने से महिलाओं में नार्सिसिज्म बढ़ गया है, सही नहीं होगा। हां, सामाजिक मेलजोल कम होना, अकेलापन, एक जैसी दिनचर्या और बाहर निकलने के अवसर कम होना व्यक्ति में ऊब या चिड़चिड़ापन बढ़ा सकते हैं। लेकिन इससे किसी व्यक्ति को नार्सिसिस्ट नहीं कहा जा सकता। यह बात पुरुषों पर भी उतनी ही लागू होती है।
नार्सिसिज्म को समझने के लिए सबसे जरूरी है व्यवहार का लगातार बना रहने वाला पैटर्न। ऐसा व्यक्ति स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझ सकता है, लगातार प्रशंसा और विशेष महत्व की अपेक्षा कर सकता है, आलोचना स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर सकता है और अपनी गलतियों की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह दूसरे की भावनाओं और उपलब्धियों को उतना महत्व नहीं देता, जितना अपने महत्व को देता है।
यहां आत्मसम्मान और नार्सिसिज्म का अंतर समझना भी जरूरी है। ‘मैं भी महत्वपूर्ण हूं’ आत्मसम्मान है, जबकि ‘मैं दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण हूं’ नार्सिसिस्टिक सोच की ओर इशारा करता है।
रिश्तों की खूबसूरती इस बात में है कि हम केवल अपनी खुशी नहीं देखते, बल्कि दूसरे की खुशी में भी खुश होना सीखते हैं। भाई की सफलता पर भाई खुश हो, पत्नी की उपलब्धि पर पति गर्व करे और पति की सफलता पर पत्नी सहजता से प्रसन्न हो—यही रिश्तों की सहजता है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम हर रिश्ते में ‘मैं’ को बड़ा करने के बजाय थोड़ा-सा ‘हम’ को बड़ा करें। रिश्ते तब कमजोर नहीं होते, जब कोई एक व्यक्ति सफल होता है; वे तब कमजोर होते हैं, जब एक की सफलता दूसरे के लिए अपनी श्रेष्ठता साबित करने की चुनौती बन जाती है।
आखिर रिश्तों में सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि मैं कितना बड़ा हूं, बल्कि यह है कि मैं दूसरे की खुशी को कितनी सहजता से अपनी खुशी बना सकता हूं।

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari