
हम शहरों में आ तो गए, लेकिन दिवाली गाँव में ही छोड़ आए। यह बात मैं हर साल दिवाली के आसपास सोचता हूँ। हम गाँव से शहर आए, फिर शहर से फ्लैट में आ गए। और शायद फ्लैट में आते-आते ज़िंदगी भी फ्लैट हो गई। ज़िंदगी आगे बढ़ती गई, घर बड़े होते गए, सुविधाएँ बढ़ती गईं, लेकिन पता नहीं क्यों दिवाली हर साल थोड़ी छोटी होती चली गई। बाहर से देखें तो आज हमारे पास दिवाली के लिए पहले से बहुत कुछ है—बड़ी-बड़ी लाइटें, सजावट, मिठाइयाँ, नए कपड़े, महंगे उपहार और बाजारों की चमक। लेकिन उस सबके बीच बचपन वाली दिवाली कहीं दिखाई नहीं देती।
गाँव में दिवाली सिर्फ एक दिन नहीं होती थी। दिवाली कई दिनों पहले से ही घर के भीतर उतरने लगती थी। सुबह उठते ही लगता था कि आज कुछ अलग है, जैसे पूरे गाँव की हवा में ही त्योहार घुल गया हो। आँगन के साथ-साथ घर के बाहर के छोटे रास्तों, पगडंडियों और चौखट के आसपास की भी सफाई होती थी। कहीं झाड़ू लग रही होती, कहीं आँगन लीपा-पोता जा रहा होता, तो कहीं बच्चे घर के कोनों से मिट्टी और जाले निकालने में लगे होते। घर को लीपा-पोता जाता था, दरवाजे पर आम के पत्तों या फूलों का तोरण लगाया जाता था और देखते ही देखते साधारण-सा घर भी जैसे दिवाली के स्वागत के लिए तैयार हो जाता था। चूल्हे पर कुछ न कुछ पक रहा होता था और पूरे घर में उस खाने की खुशबू फैल रही होती थी। बड़े सुबह से काम में लगे रहते। दादी की आवाज आती थी, ‘अरे सारे दरवाजे खोल दो, लक्ष्मी आएगी। आज के दिन दरवाजे बंद नहीं रखते।’ तब शायद हमें इस बात की गहराई समझ नहीं आती थी। लगता था, दादी हर साल यही कहती हैं। लेकिन आज शहर के इस बंद फ्लैट में बैठकर लगता है कि दादी सिर्फ दरवाजे खोलने की बात नहीं करती थीं, वह घर खोलने की बात करती थीं।
भीतर उतनी रोशनी नहीं
आज हमारे पास सफाई के लिए मेड है, रंगोली के लिए बाजार में बने-बनाए स्टिकर हैं, सजावट के लिए बिजली की लड़ियाँ हैं और पूजा का सामान एक ही दुकान से मिल जाता है। एसी चल रहा होता है, इसलिए दरवाजे और खिड़कियाँ बंद रहती हैं। बाहर रोशनी होती है, अंदर भी रोशनी होती है, लेकिन उस रोशनी के बीच कहीं वह पुरानी दिवाली दिखाई नहीं देती। कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि जब हमने अपने घर के सारे दरवाजे ही बंद कर रखे हैं, तो लक्ष्मी जी रास्ता कैसे खोजेंगी? शायद यह सवाल लक्ष्मी जी से ज्यादा हमसे है। सुविधा के लिए हमने दरवाजे बंद किए और पता ही नहीं चला कि कब रिश्तों के लिए भी जगह कम होती चली गई। पहले पड़ोसी के घर से आती आवाज अपने घर की लगती थी। किसी के यहाँ मिठाई बनी तो खुशबू पूरे मोहल्ले में फैलती थी। कोई बिना बुलाए घर आ गया तो उसके लिए जगह बन जाती थी। अब सामने वाले फ्लैट में कौन रहता है, यह भी कई बार पता नहीं होता। शुभकामना भी मोबाइल की स्क्रीन पर आती है और वहीं खत्म हो जाती है। शायद यही वजह है कि आज दिवाली पहले से ज्यादा चमकती है, लेकिन भीतर उतनी रोशनी नहीं करती।ज़िंदगी के बीच त्योहार
मेरे लिए दिवाली सिर्फ शाम को लक्ष्मी पूजा करने, नए कपड़े पहनने, मिठाई खाने और पटाखे चलाने का नाम नहीं है। दिवाली तो सुबह से शुरू होती है। जिस दिन घर की सफाई सिर्फ एक काम न होकर तैयारी लगे, जिस दिन आँगन में पैर रखते ही मन को लगे कि आज कोई खास दिन है, वही दिवाली है। गाँव में त्योहार की तैयारी में एक श्रद्धा होती थी। शहर में हमारे पास समय कम है, इसलिए हमने दिवाली को भी समय के हिसाब से छोटा कर लिया। सुबह ऑफिस जाना है, बच्चों को स्कूल भेजना है, बाजार से सामान लाना है, घर की सफाई करवानी है और शाम को पूजा करनी है। बस, दिवाली पूरी। पहले त्योहार के लिए जिंदगी थोड़ी रुकती थी, अब जिंदगी के बीच त्योहार के लिए थोड़ा-सा समय निकाला जाता है। फर्क शायद यहीं से शुरू हुआ है। गाँव में दिवाली घर में मनती थी, शहर में दिवाली घर के कैलेंडर में मनती है। अगर मुझसे कोई पूछे कि दिवाली की शुरुआत कैसे करनी चाहिए, तो मैं कहूँगा—सबसे पहले अपने घर को अपने हाथ से साफ कीजिए। जब अपने हाथ से झाड़ू लगाते थे तो लगता था जैसे हम कह रहे हों— ‘माँ, आइए, मैंने आपके लिए जगह खाली की है।’ आज मेड आई, उसने सफाई की और चली गई। घर साफ हो गया, लेकिन उस सफाई में हमारा मन कहाँ शामिल हुआ? इसलिए इस दिवाली कम से कम घर का कोई एक हिस्सा अपने हाथ से साफ कीजिए। पूजा की जगह, चौखट, बालकनी या वह कोना जहाँ आप दीया रखने वाले हैं। त्योहार में काम छोटा या बड़ा नहीं होता, उसके पीछे का भाव बड़ा होता है।अपनापन महसूस करें
इसी तरह रंगोली भी मेरे लिए सिर्फ सजावट नहीं है। चावल का आटा, हल्दी, कुमकुम और घर में मौजूद छोटी-छोटी चीजों से ही आँगन सज जाता था। रंगोली बहुत बड़ी नहीं होती थी, लेकिन उसमें अपनापन होता था। आज बाजार में खूबसूरत रंगोलियाँ मिल जाती हैं, जिन्हें बस लाकर रख देना है। लेकिन इस दिवाली दस मिनट निकालकर अपने हाथ से थोड़ी-सी रंगोली बनाइए। बहुत सुंदर बनाने की जरूरत नहीं है। टेढ़ी बने तो टेढ़ी सही, छोटी बने तो छोटी सही। बच्चों को साथ बैठाइए। उन्हें बताइए कि त्योहार केवल बाजार से सामान खरीदकर घर सजाने का नाम नहीं है। गाँव की दिवाली में सजावट कम थी, लेकिन भागीदारी ज्यादा थी। कोई घर साफ कर रहा था, कोई पकवान बना रहा था, कोई दीया तैयार कर रहा था, कोई तोरण लगा रहा था। शायद इसलिए वह दिवाली सिर्फ दिखाई नहीं देती थी, महसूस भी होती थी। आज हमें उसी भावना को बचाना है, उसकी हूबहू नकल नहीं करनी।घर बंद न हो, मन खुले
फिर बारी आती थी दरवाजे और खिड़कियाँ खोलने की। गाँव में दिवाली के दिन घर और बाहर के बीच दूरी कम हो जाती थी। किसी पड़ोसी की आवाज आती, बच्चे एक घर से दूसरे घर चले जाते, कोई मिठाई लेकर आ जाता, कोई बस शुभकामना देने खड़ा हो जाता। घर छोटे थे, लेकिन उनमें आने-जाने वालों के लिए जगह बहुत थी। इसलिए इस दिवाली दोपहर के बाद कुछ देर के लिए अपने घर के दरवाजे और खिड़कियाँ खोलकर देखिए। एसी बंद कर दीजिए। बाहर की हवा और रोशनी को अंदर आने दीजिए। हो सकता है आपको समझ आए कि दादी दरवाजा सिर्फ लक्ष्मी जी के लिए नहीं खुलवाती थीं। वह चाहती थीं कि घर बंद न हो, मन बंद न हो और त्योहार सिर्फ हमारे परिवार तक सीमित न रह जाए। शायद इसीलिए पुराने समय की दिवाली में पड़ोसी भी अपने लगते थे और पूरा मोहल्ला एक घर जैसा महसूस होता था।
गाँव में दीया भी केवल पूजा की वस्तु नहीं था। घर के कोने-कोने में दीये रखे जाते थे—तुलसी के पास, चौखट पर, रसोई में, आँगन में, छत पर और उन जगहों पर भी जहाँ शायद किसी की नजर न जाए। बिजली की इतनी रोशनी नहीं थी, इसलिए एक-एक दीये का उजाला महसूस होता था। आज हमारे घर बिजली की लड़ियों से जगमगा उठते हैं, लेकिन अपने हाथ से मिट्टी का एक दीया जलाने का सुख अब भी वैसा ही है। हमारे यहाँ यह मान्यता रही है कि उजाला शुभता का प्रतीक है और जहाँ उजाला होता है, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए इस दिवाली एक दीया ऐसा जरूर जलाइए जिसे आपने खुद अपने हाथ से रखा हो। उसे चौखट पर रखकर कुछ पल वहीं खड़े रहिए। उस छोटे-से दीये को देखिए और सोचिए कि हमारे जीवन में कितने लोग ऐसे रहे हैं जिन्होंने बिना किसी उम्मीद के हमारे लिए उजाला किया। माँ की वह सुबह, पिता की वह चिंता, दादा-दादी, नाना-नानी की वह आवाज, भाई-बहनों के साथ बिताए वे दिन—कितना कुछ है जो आज भी हमारे जीवन में अपनी गर्माहट लिए हुए है। उन दिनों का स्नेह, वह अपनापन और घर में बिखरी वह छोटी-छोटी खुशियाँ आज भी हमारी यादों में उसी तरह जीवित हैं।अपनों के साथ कुछ पल
मुझे लगता है शहर में आना गलत नहीं है। बेहतर जिंदगी के लिए गाँव छोड़ना भी गलत नहीं है। बच्चों की पढ़ाई, नौकरी और सुविधाओं के लिए शहर जरूरी है। लेकिन शहर में आकर अगर हम अपने त्योहारों की आत्मा ही पीछे छोड़ दें, तो कहीं न कहीं हम अपने भीतर का एक हिस्सा भी पीछे छोड़ देते हैं। अब न वैसा आँगन है, न वैसा चूल्हा, न पूरा परिवार एक जगह बैठता है। दादी की आवाज भी अब शायद घर के किसी कोने से नहीं आती। बचपन के दोस्त अलग-अलग शहरों में हैं, भाई-बहन अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं और वह घर, जिसमें कभी दिवाली की सुबह से रात तक चहल-पहल रहती थी, शायद अब उतना भरा हुआ नहीं है। लेकिन उन दिनों को वापस लाने के लिए किसी बड़े इंतजाम की जरूरत नहीं है। एक दीया, थोड़ी-सी सफाई, हाथ से बनाई छोटी-सी रंगोली, घर का खुला दरवाजा और अपने लोगों के साथ कुछ पल—इतना ही काफी है। हम अपने बच्चों को वही गाँव नहीं दे सकते जिसमें हम बड़े हुए, लेकिन उस गाँव की एक भावना जरूर दे सकते हैं। उन्हें बता सकते हैं कि त्योहार बाजार से नहीं, घर के लोगों से बनता है।
शहरों में लोग आ तो गए, लेकिन दिवाली गाँव में ही छोड़ आए—यह बात पूरी तरह सच नहीं होनी चाहिए। गाँव कहीं गया नहीं है। वह हमारी यादों में है, हमारी आदतों में है, हमारी बोली में है और उन छोटी-छोटी बातों में है जिन्हें हम अक्सर पुराना कहकर भूल जाते हैं। जब हम अपने बच्चे को पहली बार दीया जलाना सिखाते हैं, जब चौखट पर रंगोली बनाते हैं, जब किसी पड़ोसी के घर मिठाई लेकर जाते हैं, तब वही गाँव हमारे भीतर से बाहर आता है। शायद हमें गाँव लौटने की जरूरत नहीं है, हमें बस अपने भीतर से गाँव को मिटने नहीं देना है।दीये की लौ थोड़ी-सी काँपेगी
इस दिवाली मैं एक काम जरूर करना चाहता हूँ—एक दीया जलाकर कुछ देर उसके सामने बैठना। बिना मोबाइल के, बिना किसी शोर के। शायद उस दीये की लौ में मुझे अपना वह पुराना घर दिखाई दे, जहाँ दादी दरवाजे खोलने के लिए आवाज लगाती थीं। शायद मिट्टी से सना वह आँगन दिखाई दे, चूल्हे से उठता धुआँ दिखाई दे, पगडंडी पर भागते हुए हम दिखाई दें और दूर किसी घर से आती मिठाई की खुशबू भी महसूस हो। शायद एक पल के लिए लगे कि समय वहीं रुक गया है और हम फिर से बच्चे हो गए हैं। लेकिन फिर दीये की लौ थोड़ी-सी काँपेगी और हमें याद आएगा कि वह घर अब वैसा नहीं है, वे लोग अब वैसे नहीं हैं और हम भी अब वैसे नहीं रहे। यही तो जिंदगी है—कुछ लोग चले जाते हैं, कुछ घर पीछे छूट जाते हैं, कुछ आवाजें हमेशा के लिए खामोश हो जाती हैं, लेकिन उनकी दी हुई रोशनी हमारे भीतर रह जाती है। इसलिए इस दिवाली जब दीया जलाएँ, तो सिर्फ अपने घर के लिए मत जलाइए। उन लोगों की याद में भी जलाइए, जिन्होंने कभी आपकी ज़िंदगी की खुशहाली और शुभता के लिए दीया जलाया था। और जो लोग आज हमारे साथ हैं, उनके जीवन की खुशहाली, सुख-शांति और शुभता के लिए भी एक दीया जरूर जलाइए। आखिर दिवाली सिर्फ घर को रोशन करने का त्योहार नहीं, बल्कि अपने आसपास के रिश्तों में सुख, शुभता और अपनापन बनाए रखने का भी अवसर है।
अगर दीया जलाते-जलाते आँखें भर आएँ, तो उन्हें पोंछिए मत। कुछ आँसू दु:ख के नहीं होते, वे इस बात के होते हैं कि हमें कभी इतना प्यार मिला था कि आज भी उसकी याद आँखों को भिगो देती है। शायद यही हमारी असली दिवाली है—जब घर रोशनी से नहीं, यादों से भर जाए; जब दीये की लौ के साथ बीते हुए लोग भी कुछ पल के लिए हमारे पास लौट आएँ; और जब हम समझें कि गाँव हमने पीछे नहीं छोड़ा... गाँव तो आज भी हमारे भीतर उसी पुराने दरवाजे के पीछे खड़ा है। बस, हर दिवाली वह धीरे से कहता है— ‘अरे, सारे किवाड़ खोल दो... मैं अभी यहीं हूँ।’
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari










