कल तक हम बाज़ार में सामान ढूँढ़ते थे, आज हम बाज़ार में भावना ढूँढ़ रहे हैं। मैंने ‘खरीदारी की बदलती दुनिया’ शीर्षक से लिखा था कि सब कुछ उँगलियों पर आ गया है। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन, जब सुबह-सुबह घंटियों की आवाज़ के साथ घटस्थापना हुई, तो लगा कि कुछ चीज़ें आज भी उँगलियों पर नहीं, हथेलियों पर ही महसूस होती हैं।
नवरात्रि में बाज़ार सिर्फ बाज़ार नहीं रहता, वह मंदिर की सीढ़ी बन जाता है। जहाँ सनातनी परिवार नवरात्रि की तैयारी के लिए सामान लेने पहुँचते हैं। आपने देखा होगा, अमावस्या की शाम से ही बाज़ार का रंग बदल जाता है। लाल चुनरी का वह लाल, ऐप की स्क्रीन वाला लाल नहीं है। उस लाल में धूप की गंध है, कुमकुम का स्पर्श है।
कलश के लिए जो नारियल हम ढूँढ़ते हैं, उसे हम सिर्फ उसकी कीमत देखकर नहीं चुनते। उसे हाथ में लेकर हिलाते हैं, उसकी आवाज़ सुनते हैं। दुकानदार भी मुस्कुराकर कह देता है, “बहन जी, ले लो, माँ खुश होंगी।” यह वाक्य किसी एल्गोरिदम में नहीं लिखा।
यही तो अंतर है। साल भर हम प्रोडक्ट खरीदते हैं, नवरात्रि में हम प्रतीक खरीदते हैं। साल भर हम कहते हैं, ‘यह सस्ता मिल रहा है, ले लेते हैं।’ नवरात्रि में हम कहते हैं, ‘यह माँ को अच्छा लगेगा, ले लेते हैं।’ खरीदने वाला वही हाथ है, लेकिन उस हाथ के पीछे की नीयत बदल जाती है।
कल मैंने एक महिला को एक छोटी-सी दुकान पर ज्वारे उगाने के लिए मिट्टी के सकोरे देखते हुए देखा। दुकानदार ने कहा, ‘मैडम, यही सकोरा आपको ऑनलाइन आधे दाम में मिल जाएगा।’
महिला मुस्कुराकर बोली, ‘भैया, मिट्टी का सकोरा ऑनलाइन खरीदने में वह बात कहाँ? इसे हाथ में लेकर देखना, इसकी मिट्टी को महसूस करना और फिर खरीदना, यह अलग ही अनुभव है। इसे हाथ से छूकर फिर खरीदने का जो आत्मीय सुख मिलता है, वह ऑनलाइन कहाँ?’सच कहें तो हम टेक्नोलॉजी के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें सिर्फ खरीदा नहीं जाता, महसूस भी किया जाता है।
इसीलिए तो नवरात्रि की खरीदारी आज भी ऑफलाइन ज्यादा महसूस होती है। चुनरी को छूना पड़ता है, लहंगे के घेर को घुमाकर देखना पड़ता है, दीये की मिट्टी को हाथ में लेकर परखना पड़ता है। ये चीज़ें ‘ऐड टू कार्ट’ में नहीं, अंजुरी में आती हैं।
बाज़ार में आज भीड़ है, लेकिन वह भीड़ शोर नहीं, श्रद्धा है। हर कोई कुछ न कुछ लेकर जा रहा है, लेकिन थैले में सामान कम और संकल्प ज्यादा है। कोई नौ दिन के व्रत का संकल्प लेकर जा रहा है, कोई नई शुरुआत का। कोई माँ की खुशी को ध्यान में रखकर सामान चुन रहा है और खुशी-खुशी अपने घर की ओर लौट रहा है।
शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में बाज़ार को कभी सिर्फ व्यापार की जगह नहीं माना गया। हमारे यहाँ बाज़ार भी पूजा का एक रूप बन जाता है, जहाँ हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से अपने परिवार, अपनी परंपरा और अपने विश्वास के लिए कुछ चुन-चुनकर घर लाते हैं।
आज जब आप बाज़ार जाएँ, तो सिर्फ सामान की सूची मत देखिए। थोड़ा ठहरिए। उस लाल चुनरी को छूकर देखिए। उस कलश वाले नारियल को हाथ में लेकर सुनिए। उस छोटे से मिट्टी के दीये को उठाकर देखिए।
शायद आपको महसूस हो कि आप बाज़ार में नहीं, माँ को ढूँढ़ रहे हैं। माँ कहीं बाहर नहीं हैं। वह उसी लाल चुनरी में हैं, उसी मिट्टी के दीये में हैं, उसी छोटे से सकोरे में हैं, जिसे आप ज्वारे उगाने के लिए घर ले जा रहे हैं।
शायद वह आपको देखकर चुपचाप मुस्कुरा रही हैं और कह रही हैं, ‘तुमने मेरे लिए इतने प्रेम से कुछ चुना है, तो मैं भी तुम्हारे जीवन में सुख, शांति और विश्वास भरने का आशीर्वाद क्यों न दूँ?’
शायद यही नवरात्रि की सबसे बड़ी खरीदारी है। हम सामान लेकर बाज़ार से लौटते हैं, लेकिन माँ का आशीर्वाद अपने साथ लेकर घर आते हैं। और तब समझ आता है, बाज़ार में हम माँ को ढूँढ़ने गए थे, लेकिन लौटे तो माँ हमारे भीतर ही मिल गईं।
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

1 comment:
Its called sentiments, people are very deeply committed with their sentiments. Navratri pujan is also based on our sentiments its true what we feel by our heart how we would like to pray our almighty for blessings
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