पंद्रह अगस्त आते ही हर गली तिरंगे के रंगों—केसरिया, सफेद और हरे—से सज जाती है। मोबाइल की स्क्रीन पर तिरंगे वाली तस्वीरें, व्हाट्सएप पर 'हैप्पी इंडिपेंडेंस डे' के संदेश और ऑफिस में छुट्टी का नोटिस देखकर मन खुश भी होता है। लेकिन इसी खुशी के बीच दिल में एक सवाल बार-बार उठता है—क्या हम सच में आजादी मना रहे हैं, या सिर्फ एक छुट्टी?
बचपन में 14 अगस्त की रात नींद नहीं आती थी। मन में एक अलग ही उत्साह होता था। माँ सुबह जल्दी उठाकर कहती थीं—“चल, नहा ले… झंडा फहराना है।” हाथ में कागज का तिरंगा होता था, आँखों में चमक और दिल में देश के लिए एक अनजाना-सा गर्व। स्कूल का मैदान, एनसीसी की परेड, राष्ट्रगान और 'सारे जहाँ से अच्छा' की गूंज… उस दिन तिरंगे के तीनों रंग सिर्फ झंडे में नहीं होते थे, वे हमारे भीतर उतर जाते थे।
आज तस्वीर कुछ बदल गई है। सुबह देर से उठते हैं, मोबाइल खोलते हैं, एक संदेश फॉरवर्ड कर देते हैं—'हैप्पी इंडिपेंडेंस डे।' बाजार से तिरंगा खरीदते हैं, उसके साथ तस्वीर खिंचवाते हैं और शाम को छुट्टी का आनंद लेने निकल जाते हैं। सोशल मीडिया पर देशभक्ति कुछ घंटों के लिए ट्रेंड करती है और फिर अगले दिन जिंदगी अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ लेती है।
पहले तिरंगा लेने के लिए खादी भंडार तक जाने में भी गर्व महसूस होता था। आज वह ऑनलाइन कार्ट में आता है, कुछ क्लिक में ऑर्डर होता है और घर तक डिलीवरी हो जाती है। लेकिन सवाल तिरंगा खरीदने का नहीं है। सवाल यह है कि हमने उस तिरंगे को अपने जीवन में कितना स्थान दिया?
क्या हमने कभी सोचा कि जिस आजादी को हम इतनी आसानी से जी रहे हैं, उसके पीछे कितने लोगों ने अपना आज कुर्बान कर दिया था? कितनी माताओं ने अपने बेटों को खोया, कितनी बहनों ने अपने भाइयों को खोया और कितने परिवारों ने अपने प्रियजनों की कुर्बानी देकर इस देश की सुबह देखी?
तिरंगा केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं है। यह हमारे शहीदों के सपनों, हमारे संविधान के सम्मान और करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का प्रतीक है। इसे कार्ट में डालना आसान है, लेकिन इसे दिल में उतारना मुश्किल है।
आज जरूरत सिर्फ तिरंगा खरीदने की नहीं, बल्कि तिरंगे के सम्मान को अपने व्यवहार में उतारने की है। देशभक्ति सिर्फ सोशल मीडिया की डीपी नहीं, बल्कि ईमानदारी से अपना काम करना भी है। किसी जरूरतमंद की मदद करना भी है। देश की संपत्ति को नुकसान न पहुँचाना भी है। कानून का सम्मान करना, अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को समझना और आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर भारत देना भी देशभक्ति है।
जब हम तिरंगे को सलामी दें, तो एक पल के लिए उन चेहरों को याद करें जिनकी वजह से आज हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं। क्योंकि तिरंगा 'सेम डे डिलीवरी' से घर तो पहुंच सकता है, लेकिन उसकी इज्जत हमारे दिल तक पहुंचने में पूरी जिंदगी लग सकती है।
आइए इस 15 अगस्त सिर्फ 'हैप्पी इंडिपेंडेंस डे' न कहें। एक पल रुकें… तिरंगे को देखें… और खुद से पूछें— 'जिस आजादी के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना सब कुछ दे दिया, क्या हम उसके योग्य नागरिक बनने की कोशिश कर रहे हैं?'
यही सवाल शायद इस बार हमारी आजादी की सबसे सच्ची सलामी होगा।
जय हिंद
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

Bahut hi badiya lekh kafi kuch jaankari kaam ki hai, sabhi subscribe karen
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