19 अगस्त, 2026

बारिश में डूबता चंडीगढ़

चंडीगढ़ में हाल की तेज बारिश ने शहर की व्यवस्थाओं और प्रशासनिक तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस शहर को देश के सबसे सुनियोजित, साफ-सुथरे और आधुनिक शहरों में गिना जाता है, वहां कुछ घंटों की बारिश के बाद सड़कों पर घुटनों से लेकर कमर तक पानी भर जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। 

बीते मंगलवार, 18 अगस्त को महज दो घंटे में 72.4 मिमी बारिश दर्ज की गई। इसके बाद शहर के कई हिस्सों में सड़कें जलमग्न हो गईं और लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बारिश कितनी तेज हुई, बल्कि यह भी है कि क्या चंडीगढ़ जैसे योजनाबद्ध शहर की व्यवस्था इतनी बारिश का सामना करने के लिए तैयार थी?

अगर चंडीगढ़ जैसे सुव्यवस्थित शहर का यह हाल हो सकता है, तो इसके आसपास तेजी से फैल रहे शहरों और कस्बों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

चंडीगढ़ को अक्सर पढ़े-लिखे और जागरूक लोगों का शहर कहा जाता है। यहां प्रशासनिक संस्थाएं मजबूत हैं, नगर निगम है, योजनाबद्ध सेक्टर हैं और वर्षों से विकसित सड़क तथा सीवेज नेटवर्क भी मौजूद है। इसके बावजूद हर मानसून में कई इलाकों में जलभराव की समस्या सामने आती है।

यह स्थिति बताती है कि केवल किसी शहर की अच्छी योजना बना देना पर्याप्त नहीं होता। समय के साथ उस योजना का रखरखाव, विस्तार और बदलती आबादी तथा नई जरूरतों के अनुसार आधुनिकीकरण भी उतना ही जरूरी है।

आज शहरों की आबादी बढ़ रही है, वाहनों की संख्या बढ़ रही है और कंक्रीट का फैलाव लगातार तेज हो रहा है। ऐसे में दशकों पहले तैयार किया गया ड्रेनेज ढांचा आज की जरूरतों के लिए पर्याप्त है या नहीं, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। सीवेज सिस्टम और बारिश के पानी की निकासी यानी स्टॉर्म-वॉटर ड्रेनेज एक ही चीज नहीं हैं।

सीवेज व्यवस्था मुख्य रूप से घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले गंदे पानी के निस्तारण के लिए होती है, जबकि स्टॉर्म-वॉटर ड्रेनेज का काम बारिश के पानी को तेजी से शहर से बाहर निकालना होता है।

तेज बारिश के दौरान बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी सड़कों और अन्य पक्की सतहों पर जमा हो जाता है। यदि नालियां, ड्रेन और आउटलेट इतनी मात्रा में पानी को संभालने की क्षमता नहीं रखते, तो सड़कें तालाब बन जाती हैं।

इसके अलावा नालियों में जमा गाद, प्लास्टिक और अन्य कचरा भी पानी के प्रवाह को बाधित कर सकता है। कई जगह अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण प्राकृतिक जलनिकासी के रास्तों को भी प्रभावित करते हैं।

यदि चंडीगढ़ की स्थिति चिंताजनक है तो मोहाली, जीरकपुर, खरड़ और नयागांव जैसे आसपास के तेजी से विकसित हो रहे शहरों के लिए चिंता और भी बड़ी है।

असल समस्या केवल बारिश नहीं है, बल्कि बिना पर्याप्त बुनियादी ढांचे के तेजी से होता शहरीकरण भी है।

जहां पहले खाली जमीन, खेत और प्राकृतिक जलनिकासी के रास्ते थे, वहां अब सड़कें, कॉलोनियां और बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। जमीन का बड़ा हिस्सा कंक्रीट से ढक जाने के कारण बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से जमीन में नहीं समा पाता।

चंडीगढ़ की पहचान केवल चौड़ी सड़कों, हरे-भरे क्षेत्रों और खूबसूरत सेक्टरों से नहीं होनी चाहिए। एक वास्तव में आधुनिक और योजनाबद्ध शहर वही है, जो बदलती परिस्थितियों और प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो।

किसी शहर की असली परीक्षा धूप वाले दिनों में नहीं होती, बल्कि तब होती है जब मुश्किल परिस्थितियों में भी उसकी व्यवस्था अपने नागरिकों को सुरक्षित और सुचारु जीवन दे सके।


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