29 अगस्त, 2026

बदलती भाषा, बदलते शब्द और हमारी पहचान

भाषा कभी स्थिर नहीं रहती। समय के साथ उसमें नए शब्द जुड़ते हैं, पुराने शब्दों का प्रयोग बदलता है और बोलचाल की सुविधा के अनुसार उसके स्वरूप में भी परिवर्तन आता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन प्रश्न तब उठता है, जब परिवर्तन के नाम पर हम अपनी भाषा के मूल स्वरूप और शब्दों के वास्तविक अर्थ को ही भूलने लगें।

आज हिंदी का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अंग्रेज़ी के शब्द हिंदी की सामान्य बातचीत में इस प्रकार शामिल हो गए हैं कि कई बार हमें इसका अहसास भी नहीं होता। मीटिंग, अपडेट, मैसेज, फीलिंग, टाइम, प्लान जैसे अनगिनत शब्द हमारी रोज़मर्रा की भाषा का हिस्सा बन चुके हैं। इसमें अपने आप में कोई बुराई नहीं है। भाषाओं का एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करना स्वाभाविक है और इससे उनका विस्तार भी होता है। लेकिन चिंता तब होती है, जब अपनी भाषा के सहज और समृद्ध शब्द धीरे-धीरे हमारी स्मृति और व्यवहार से बाहर होने लगें।

इसी प्रकार अनेक शब्दों के पारंपरिक रूप भी बदलते जा रहे हैं। मैंने बचपन में कुछ शब्द जिस रूप में पढ़े, लिखे और समझे, आज उनका सरलीकरण होता दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, ‘गर्म’ और ‘गरम’ जैसे रूपों का प्रयोग बदलती वर्तनी और बोलचाल के साथ देखने को मिलता है। कई शब्द अब वैसे नहीं लिखे या बोले जाते, जैसे पहले लिखे और बोले जाते थे। सुविधा और प्रचलन के नाम पर शब्दों के रूप सरल होते गए और धीरे-धीरे उनके पुराने स्वरूप पीछे छूटते गए।

इसी तरह कुछ शब्द, जिनकी जड़ें उर्दू, फारसी या अन्य भाषाओं में रही हैं, लंबे समय से हिंदी के सामान्य प्रयोग का हिस्सा बन चुके हैं। उदाहरण के लिए, कहीं ‘अक्सर’ लिखा जाता है तो कहीं ‘अकसर’। ऐसे में सामान्य पाठक और नई पीढ़ी के सामने स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि हिंदी में किसी शब्द की मानक वर्तनी कौन-सी मानी जाए और उसका प्रचलित रूप कौन-सा है?

मेरा प्रश्न किसी भाषा या उसके प्रभाव का विरोध करना नहीं है। हिंदी स्वयं अनेक भाषाओं के प्रभाव और योगदान से समृद्ध हुई है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, उर्दू और अंग्रेज़ी—सभी ने किसी न किसी रूप में हिंदी को प्रभावित किया है। वास्तव में यही मिश्रित विरासत हिंदी को व्यापक और जीवंत भी बनाती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब हम शब्दों के अर्थ और अंतर को समझना ही बंद कर दें।

आज की नई पीढ़ी के सामने एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण उदाहरण है—‘सजा’ और ‘सज़ा’। दोनों का उच्चारण लगभग एक जैसा हो सकता है, लेकिन अर्थ बिल्कुल अलग हैं। ‘सजा’ का संबंध सजाने या अलंकृत करने से है, जबकि ‘सज़ा’ का अर्थ दंड है। केवल एक नुक्ते का अंतर शब्द का पूरा अर्थ बदल देता है। यदि हम लिखते समय ऐसे अंतरों के प्रति सजग नहीं रहेंगे, तो भाषा की सूक्ष्मता और अर्थ की स्पष्टता दोनों प्रभावित होंगी।

आज सोशल मीडिया और त्वरित संदेशों की दुनिया में भाषा का एक नया रूप विकसित हो रहा है—जल्दी लिखो, जैसा मन आए वैसा लिखो और सामने वाला समझ जाए तो काम चल गया। यही ‘कामचलाऊ भाषा’ धीरे-धीरे हमारी आदत बनती जा रही है। वर्तनी की शुद्धता, व्याकरण, विराम-चिह्न और शब्दों के सही अर्थ को कई बार अनावश्यक समझ लिया जाता है।

मोबाइल के कीबोर्ड और ऑटो-करेक्ट ने भी हमारी लेखन-आदतों को प्रभावित किया है। हम तेजी से टाइप करते हैं, मशीन कोई सुझाव देती है और कई बार हम बिना ध्यान दिए उसे स्वीकार कर लेते हैं। सुविधा के लिए बनी तकनीक अनजाने में हमारी भाषा के प्रयोग को भी बदल रही है।

सोशल मीडिया ने इस परिवर्तन को और तेज़ कर दिया है। आज हिंदी बोलने वाला व्यक्ति भी हिंदी को रोमन लिपि में लिखता दिखाई देता है—‘kya haal hai’, ‘aap kahan hain’, ‘kal milte hain’। संभव है कि यह संवाद की सुविधा हो, लेकिन लंबे समय में इसका प्रभाव हमारी देवनागरी लिपि और हिंदी लिखने की आदत पर क्या पड़ेगा, यह विचारणीय प्रश्न है।

भाषा केवल सूचना पहुंचाने का साधन नहीं है। उसमें सौंदर्य है, संवेदना है, लय है और विचारों की गहराई भी है। एक ही बात को अलग-अलग शब्दों में कहने से उसका प्रभाव बदल जाता है। यही भाषा की शक्ति है। भाषा हमारी पहचान है और हमारी संस्कृति की स्मृति भी। उसके भीतर हमारे समाज का इतिहास, हमारी संवेदनाएं, हमारे विचार और हमारी सभ्यता के अनुभव सुरक्षित रहते हैं। जब कोई शब्द लुप्त होता है, तो केवल एक शब्द नहीं खोता; उसके साथ सोचने और अभिव्यक्त करने का एक विशेष ढंग भी कहीं न कहीं कमज़ोर हो जाता है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हम अंग्रेज़ी, उर्दू या किसी दूसरी भाषा के शब्दों का विरोध करें। भाषाओं के बीच संवाद और आदान-प्रदान सदियों से होता आया है और आगे भी होगा। प्रश्न किसी भाषा को स्वीकार या अस्वीकार करने का नहीं है। प्रश्न यह है कि दूसरी भाषाओं को अपनाते हुए क्या हम अपनी भाषा को समझ भी रहे हैं और संभाल भी रहे हैं?

नई पीढ़ी को अंग्रेज़ी और अन्य भाषाएं अवश्य सीखनी चाहिए। हर भाषा ज्ञान और दृष्टि का विस्तार करती है। लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। सच्ची आधुनिकता वही है, जो नई दुनिया से जुड़ते हुए अपनी पहचान को भी सुरक्षित रखे। आज आवश्यकता भाषा को कठोर नियमों में बाँधने की नहीं, बल्कि उसके प्रति भाषाई सजगता पैदा करने की है। हमें यह समझना होगा कि बोलचाल और लिखित भाषा में अंतर होता है, सुविधा और अशुद्धता एक ही बात नहीं हैं तथा परिवर्तन और पहचान खो देने में भी अंतर है।

भाषा बदलती रहे—यह स्वाभाविक है। नए शब्द आएं—यह भी आवश्यक है। लेकिन परिवर्तन की इस तेज़ रफ्तार में इतना अवश्य ध्यान रखें कि हमारी भाषा की आत्मा, उसकी संवेदना और उसके शब्दों की पहचान कहीं पीछे न छूट जाए। क्योंकि भाषा को बचाने का अर्थ उसे बदलने से रोकना नहीं है। भाषा को बचाने का अर्थ है—परिवर्तन के बीच भी उसकी आत्मा, उसकी स्मृति और उसकी पहचान को जीवित रखना।

 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें