मुझे आज भी याद है वह समय, जब करवाचौथ के दिन मैं ऑफिस से शाम करीब आठ बजे छुट्टी करके घर जाने के लिए निकलता था। तब शादी नहीं हुई थी। उम्र ऐसी थी कि करवाचौथ का मतलब तो समझ आता था, लेकिन उसके पीछे छिपी भावनाओं को शायद उतनी गहराई से समझने की समझ अभी नहीं आई थी। तब करवाचौथ मेरे लिए एक त्योहार था, एक खूबसूरत दृश्य था, लेकिन यह नहीं पता था कि एक दिन यही त्योहार मेरे अपने जीवन का हिस्सा बन जाएगा।
बात शिमला के माल रोड की है। चाँद निकलने का समय अक्सर साढ़े आठ बजे के बाद होता था और उस समय तक माल रोड का नज़ारा देखते ही बनता था। लगता था जैसे पूरी की पूरी बारात एक ही जगह के लिए निकल पड़ी हो। चारों ओर सजी-धजी सुहागिनें, अपने पतियों के साथ टहलती हुईं। किसी ने खूबसूरत साड़ी पहन रखी होती, किसी के हाथों में चूड़ियाँ खनक रही होतीं तो किसी के हाथ में सजी हुई पूजा की थाली और छलनी होती। हर कोई जैसे एक ही इंतज़ार में था—चाँद के निकलने का।
फिर जैसे ही चाँद के निकलने की खबर होती, माल रोड का दृश्य अचानक बदल जाता। जिस दिशा से चाँद दिखाई देता, उधर सड़क पर एक अलग ही संसार बस जाता। सड़क के किनारे जलते छोटे-छोटे दीये, उनके बीच खड़ी सुहागिनें और अपने पति की लंबी उम्र और मंगल की कामना से भरी उनकी आँखें—सब कुछ इतना सुंदर और भावुक होता कि कुछ देर के लिए मन वहीं ठहर जाता। उस समय समझ नहीं आता था कि यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि किसी के लिए पूरे दिन की तपस्या और इंतज़ार का अंत है।
छलनी से पहले चाँद को देखना और फिर उसी छलनी से पति का चेहरा देखना... उस पल में जैसे पूरे व्रत की भावना समा जाती थी। चाँद आसमान में होता था, लेकिन असली खुशी शायद सामने खड़े उस इंसान को देखने की होती थी, जिसके लिए पूरा दिन बिना अन्न और जल के गुज़ारा गया था। तब मैं बस यह दृश्य देखता था, आज उसकी भावना समझ पाता हूँ।
माल रोड की रौनक देखते ही बनती थी। चारों तरफ रोशनी, लोगों की भीड़, सजी हुई महिलाएँ, हाथों में पूजा की थालियाँ और आसमान में चाँद का इंतज़ार। शिमला की ठंडी हवा में करवाचौथ की वह रात अपने आप में कुछ अलग ही लगती थी।
जब मैं वहाँ से घर की ओर लौटता, तो रास्ता भी किसी त्योहार की कहानी कहता हुआ लगता। घर की ओर जाने वाली सड़क के दोनों किनारों पर दीये ही दीये दिखाई देते। शिमला की भौगोलिक स्थिति के कारण उस ओर से चाँद निकलता दिखाई देता था और शायद इसी वजह से रास्ते भर करवाचौथ की उस रात का उजाला कुछ और ही गहरा लगता था। उन दीयों को देखते हुए घर की ओर जाते समय मन में एक छोटी-सी इच्छा जरूर उठती थी। ‘जब हमारी शादी होगी, तब क्या हमारे लिए भी कोई इसी तरह करवाचौथ का व्रत रखेगा?’
तब यह केवल एक मासूम-सी कल्पना थी। पता नहीं था कि समय कभी उस कल्पना को सच भी कर देगा। यह भी नहीं पता था कि जिन लोगों को मैं उस समय दूर खड़े होकर देख रहा हूँ, एक दिन मैं भी उसी करवाचौथ का हिस्सा होऊँगा।
लेकिन करवाचौथ से जुड़ा एक और किस्सा है, जो आज भी याद आता है तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। मैं और मेरा भाई अक्सर शाम के समय गाड़ी लेकर घूमने निकल जाते थे। जैसे ही आसमान में चाँद अपना मुखड़ा दिखाना शुरू करता, हम गाड़ी में एक गाना बजा देते—‘मेरा चाँद मुझे आया है नज़र।’ गाना बजते ही जैसे हलचल-सी मच जाती। आसपास खड़ी सुहागिनों को लगता, शायद चाँद निकल आया है। कई चेहरे आसमान की ओर उठ जाते, कई निगाहें चाँद को तलाशने लगतीं। कोई अपनी थाली संभालने लगती, कोई अपने पति की ओर देखने लगती। हमें यह देखकर एक अलग ही तरह की खुशी होती।
हम जानते थे कि हम केवल एक गाना बजा रहे हैं, लेकिन उस गाने के बजते ही न जाने कितनी आँखों में इंतज़ार खत्म होने की उम्मीद जग जाती थी। उस समय यह सब एक मज़ाक और शरारत जैसा लगता था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस छोटी-सी शरारत में भी करवाचौथ की भावनाओं का कितना सुंदर संसार छिपा था। तब हम दूसरों के इंतज़ार को देखकर खुश होते थे, आज समझ आता है कि किसी का इंतज़ार भी प्रेम का ही एक रूप होता है।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। वह लड़का, जो कभी माल रोड पर करवाचौथ के दिन दूसरों को व्रत करते और चाँद का इंतज़ार करते देखता था, आज स्वयं उस रिश्ते का हिस्सा है। कभी मन में सवाल उठता था कि क्या हमारे लिए भी कोई व्रत रखेगा। आज उस सवाल का जवाब मेरे जीवन में है।
आज मेरा विवाह हो चुका है। और करवाचौथ का दिन आते ही शिमला का वह माल रोड, वे जगमगाते दीये, सजी हुई थालियाँ, छलनी के पीछे से झाँकते चेहरे और गाड़ी में बजता वह गीत—सब कुछ बरबस याद आ जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब मैं दूसरों के करवाचौथ को देखा करता था और आज करवाचौथ मेरे अपने घर में उतर आता है।
शायद कुछ यादें इसलिए नहीं लौटतीं कि हम उन्हें याद करना चाहते हैं। वे इसलिए लौटती हैं क्योंकि कभी हमने उन्हें पूरे मन से जिया होता है। और कुछ सपने इसलिए याद रह जाते हैं क्योंकि समय उन्हें चुपचाप हमारे जीवन में सच कर चुका होता है।
खैर, सुबह के चार बजते ही रसोई से सरगी की थाली की खनक सुनाई देने लगती है। धर्मपत्नी स्नान इत्यादि करके सर्वप्रथम पूजाघर में पूजापाठ से अपने दिन की शुरुआत करती है। वैसे तो सुबह सरगी खाने का चलन है, लेकिन हमारी वाली नहीं खाती। कहती है, ‘दिल नहीं करता।’ वह सारा दिन इसी तरह भूखी और प्यासी रहती है। मैं दरवाजे की ओट से देखता हूँ—वो भूखी है। लोग पूछते हैं, करवाचौथ क्या है? किताबें कहती हैं—पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी का निर्जला व्रत। लेकिन मेरे लिए करवाचौथ क्या है? मेरे लिए करवाचौथ वो दिन है जब मेरी सुबह चाय नहीं बनती, क्योंकि वो पानी भी नहीं पिएगी। सुबह ऑफिस जाते वक्त वो मुस्कुराती है। मैं भी मुस्कुराकर निकल जाता हूँ, लेकिन दिन भर ऑफिस में जाने कितनी बार उसका ख्याल आता है। सोचता हूँ, कैसे सारा दिन बिना पानी के रह रही होगी। सिर दर्द तो नहीं हो रहा होगा? थकान तो नहीं लग रही होगी? शायद हर पति के मन में अपनी पत्नी को लेकर ऐसी ही चिंता होती होगी। बस हम पुरुषों की एक दिक्कत है—हम महसूस बहुत कुछ करते हैं, लेकिन कह नहीं पाते। प्यार होता है, चिंता होती है, लेकिन उसका इज़हार अक्सर नहीं कर पाते।

इस साल करवाचौथ 29 अक्तूबर, गुरुवार को है। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट तक और चाँद निकलने का समय रात 8 बजकर 17 मिनट पर है। लेकिन मेरे लिए चाँद घड़ी देखकर नहीं निकलता। मेरे लिए चाँद तब निकलता है जब वो छलनी हटाकर मुझे देखती है। घड़ी चाहे 8 बजकर 17 मिनट बताए, मेरे लिए उस समय का कोई खास मतलब नहीं। मेरे लिए उस रात की घड़ी उसकी आँखों से चलती है।
सायं को वो साड़ी पहन रही है, चूड़ियाँ खनक रही हैं। तैयार होते-होते वो इत्र लगा रही है और देखते ही देखते पूरा कमरा उसकी खुशबू से ऐसे सराबोर हो जाता है, मानो कोई परी अभी-अभी इस कमरे में उतर आई हो। मैं छत पर जाकर बार-बार चाँद देख रहा हूँ, जैसे चाँद मेरे जल्दी देखने से जल्दी निकल आएगा। पड़ोस की छत से एक बच्चे की आवाज आती है—‘मम्मी, चाँद निकल आया!’ अचानक जैसे आसपास हलचल बढ़ जाती है। धर्मपत्नी सजी-धजी सामने आती है। हाथ में थाली, थाली में दीया, हाथों में चूड़ियाँ और छलनी में चाँद। लेकिन उस छलनी के पीछे सिर्फ चाँद नहीं है—मैं भी हूँ।
वो मुझे देखती है। मैं उसे देखता हूँ। कुछ पल के लिए जैसे आसपास की सारी आवाजें धीमी पड़ जाती हैं। वो मेरे पैरों को स्पर्श करती है। उस एक पल में लगता है कि यह व्रत सिर्फ मेरी उम्र के लिए नहीं, हमारी उम्र के लिए है। हमारे साथ बिताए हुए उन वर्षों के लिए है, जो पीछे छूट गए हैं और उन वर्षों के लिए भी, जो अभी हमारे सामने हैं। उस पल में मुझे यह भी महसूस होता है कि विवाह सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है। विवाह शायद उस दूसरे इंसान की चिंता को अपनी चिंता बना लेने का नाम है।
वो पानी पीती है मेरे हाथ से। पहला घूँट पीते ही कहती है—‘तुमने कुछ खाया?’ मैं झूठ बोल देता हूँ—‘हाँ, खा लिया था।’ जबकि सच उसे भी पता है और मुझे भी। बस, एक खामोशी। शायद रिश्तों की सबसे खूबसूरत बातें कई बार इसी खामोशी में कही जाती हैं। उसने पूरे दिन मेरे लिए पानी नहीं पिया और पानी पीते ही उसे मेरी चिंता है कि मैंने खाना खाया या नहीं। उस पल लगता है कि प्रेम आखिर इससे ज्यादा और क्या होगा?
मेरे लिए चाँद 8 बजकर 17 मिनट पर नहीं निकलता। मेरे लिए चाँद तब निकलता है जब वो छलनी हटाती है और मुस्कुराकर मुझे देखती है। उस मुस्कान में पूरे दिन का व्रत है, मेरे लिए उसकी चिंता है, हमारे साथ की यादें हैं और आने वाले कल की एक अनकही प्रार्थना भी।
शायद करवाचौथ का असली अर्थ यही है—एक-दूसरे के लिए जीना। एक का भूखा रहना और दूसरे का उसके भूखे होने की चिंता में रहना। एक का व्रत और दूसरे का मन ही मन उसके लिए दुआ करना। प्रेम हमेशा बड़े-बड़े शब्दों में नहीं होता। कभी वह सुबह की उस चाय में होता है जो नहीं बनती, कभी दरवाजे की ओट से उसे देखते हुए आँखों में उतर आता है और कभी छलनी के उस छोटे-से घेरे में पूरा संसार दिखाई देने लगता है।
इसलिए इस करवाचौथ पर, अगर आप पति हैं, तो सिर्फ थाली मत पकड़िए—उस भावना को भी पकड़िए जिसके लिए आपकी पत्नी ने पूरा दिन बिना पानी के बिताया है। एक दिन उसके साथ भूखे रहकर देखिए, शायद आपको समझ आए कि प्रेम का स्वाद भोजन से नहीं, त्याग से बढ़ता है। उसके व्रत को केवल एक परंपरा मत समझिए। उसके पीछे छिपे प्रेम को महसूस कीजिए। क्योंकि कई बार पत्नी यह नहीं कहती कि वह आपसे कितना प्रेम करती है। वह बस सुबह उठती है, पूजा करती है, पूरा दिन बिना पानी के रहती है और शाम को छलनी के पीछे से आपको देखकर मुस्कुरा देती है। और शायद यही उसका सबसे बड़ा इज़हार होता है।
हम पुरुष अक्सर सोचते हैं कि हमें अपनी पत्नी को बताना चाहिए कि हम उससे कितना प्यार करते हैं। लेकिन कई बार वह हमसे पहले ही बता चुकी होती है—बिना एक शब्द कहे। उसके व्रत में, उसकी थाली में, उसकी आँखों के इंतज़ार में और उस मुस्कान में, जो चाँद देखने के बाद सबसे पहले हमारे लिए आती है।
इसलिए उस रात जब वो पानी का पहला घूँट मेरे हाथ से पीकर फिर पूछेगी—‘तुमने कुछ खाया?’ तो शायद मैं इस बार भी कह दूँगा—‘हाँ, खा लिया था।’ वो शायद फिर भी समझ जाएगी कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। और मैं भी समझ जाऊँगा कि उसने पूरे दिन मेरे लिए जो रखा है, उसके सामने मेरे पास देने के लिए शब्द बहुत छोटे हैं।
‘चाँद तो आसमान में सिर्फ एक है, लेकिन मेरा पूरा आसमान मेरे सामने खड़ा है।’ शायद इसी को कहते हैं—‘किसी के व्रत में अपना जीवन दिखाई देना।’
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

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