✨ कभी लेख, कभी विचार, कभी प्रकृति का श्रृंगार - यही है सृजन का संसार — शुभ शरद पूर्णिमा! चंद्रमा की सोलह कलाओं की शीतलता और माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद आपके परिवार पर सदैव बना रहे✨

10 October, 2026

सफ़र भी छूट जाएगा


सफ़र भी छूट जाएगा, शहर भी छूट जाएगा,
जहाँ पहली साँस ली थी, वो घर भी छूट जाएगा।
जिस आँगन में गिर-गिर कर संभलना सीखा था,
माँ की दुआओं का वो असर भी छूट जाएगा।
जिन गलियों में बचपन हँसते-हँसते बीता था,
वक़्त के साथ वो मंज़र भी छूट जाएगा।
वो स्कूल का कमरा, वो मैदान, वो खिड़की वाला कोना,
जहाँ से दुनिया को पहली बार देखा था, वो नज़ारा भी छूट जाएगा।
वो लकड़ी की बेंच, वो चॉक की धूल, वो आखिरी घंटी का इंतज़ार,
वो दोस्तों संग लंच बाँट कर खाना, वो सब भी छूट जाएगा।
जिन हाथों ने उँगली पकड़ कर चलना सिखाया था,
एक दिन उन हाथों का सहारा भी छूट जाएगा।
सोचा न था कभी एक दिन ऐसा भी आएगा,
अपनों का साथ और उनका प्यार भी छूट जाएगा।
बस यादों का कारवाँ साथ रह जाएगा,
बाकी तो एक दिन सारा सफ़र ही छूट जाएगा।
क्योंकि सच यही है, ज़िंदगी चाहे जितनी अपनी लगे,
एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा,
इंसान सिर्फ़ यादों में रह जाएगा।
ज़िंदगी आगे बढ़ती जाएगी,
लोग अपनी-अपनी राहों में मस्त हो जाएंगे,
मुलाकातें कम और बातें छोटी होती जाएंगी,
सफ़र खत्म हो जाएंगे,
लेकिन कुछ लोग हमेशा मुसाफ़िर बनकर दिल में रह जाएंगे।

ये सिर्फ़ मेरी नहीं, हम सबकी कहानी है। ये लाइनें मैंने किसी किताब से नहीं लिखीं। ये तब लिखी गईं जब मैं अपने ही घर के आँगन को देख रहा था। जहाँ मैं गिर-गिर कर संभलना सीखा था, आज वहाँ सन्नाटा है। माँ की दुआओं का वो आँचल आज भी वहीं है, पिता का साया भी साथ में है, बस हम ही वहाँ नहीं हैं। 

हम सब कहीं न कहीं बेहतर ज़िंदगी के नाम पर अपना वो घर-आँगन छोड़ आए हैं। हमने सोचा था शहर में घर बना लेंगे, तो सब मिल जाएगा। घर तो बन गया, पर वो खिड़की वाला कोना नहीं मिला, जहाँ से पूरी दुनिया अपनी लगती थी। वो स्कूल की लकड़ी वाली बेंच नहीं मिली, जिस पर बैठ कर हमने बिना वजह घंटों हँसा था। दर्द ज्यादा तब होता है जब अहसास होता है कि जिन हाथों ने हमारी उँगली पकड़ कर हमें चलना सिखाया था, आज उन हाथों को हमारे सहारे की जरूरत है। 

हम अपनी राहों में इतने मस्त हो गए कि मुलाकातें सच में कम हो गईं और बातें सिर्फ़ इतनी रह गईं – ‘माँ कैसी हो, पापा जी कैसे हो?’ और उधर से बस एक ही जवाब आता है – ‘बेटा, थक गया होगा, थोड़ा आराम कर ले।’ कहाँ मिलेगा ऐसा बोलने वाला? दुनिया में कोई नहीं कहता ऐसा। उनका इतना भर कह देना, जैसे सारी थकान मिट जाती है। 

एक बार अपने माँ-बाप से भी उनका हालचाल पूछ लो। शायद वे भी इसी आस में जी रहे हैं कि बच्चे कम से कम पूछते तो हैं। इतना पूछना और उनकी हर साँस में आशीर्वाद का वो कारवाँ, जिसे देखा या सुना नहीं जा सकता, केवल महसूस किया जा सकता है... कभी सोचा है? सच यही है… 

सफ़र छूट जाते हैं, शहर छूट जाते हैं, लोग छूट जाते हैं। साथ कुछ रह जाता है तो बस यादों का कारवाँ। इसलिए अगर आज आप अपने गाँव में हो, अपने घर में हो, अपने माँ-बाप के पास हो, तो एक बार उस आँगन में बैठ जाओ। उस खिड़की वाले कोने को जी भर कर देख लो। 

© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari 

2 comments:

Anonymous said...

Really great thought every person is away from home, to earn livelihood, and live a better life but neglected his own who really missed him in that movement of life where they internally feels lonely. Because someone has father someone has mother at home in old age and they are waiting when they would met his son and his whole family. A long wait that never be ends.
Because his family, his children doesn't want to go to his native village they had passed their childhood in a city, and they want to be settled there.

Anonymous said...

Very Nice