✨ कभी लेख, कभी विचार, कभी प्रकृति का श्रृंगार - यही है सृजन का संसार — शुभ शरद पूर्णिमा! चंद्रमा की सोलह कलाओं की शीतलता और माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद आपके परिवार पर सदैव बना रहे✨

19 October, 2026

एक कटोरी खीर नहीं, चाँद तले मन धर आओ

“ शरद पूर्णिमा की रात सिखाती है कि श्रीकृष्ण की मुरली तो रोज बजती है, हर किसी के जीवन में। कभी किसी बीमार की सेवा के रूप में, कभी किसी भूखे को रोटी खिलाने के रूप में, कभी एकांत में बैठकर ‘राधे’ कहने के रूप में। हम क्या करते हैं? हम कहते हैं—‘अभी थोड़ा काम निपटा लूं, फिर भजन करूंगा।’ और वो ‘फिर’ कभी नहीं आता। 
इस बात को एक छोटी सी कथा से समझते हैं। एक बार वृंदावन में शरद की पूर्णिमा की रात थी। चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से चमक रहा था। यमुना किनारे वन में एक दिव्य प्रकाश फैला था। श्यामसुंदर ने अपनी मुरली उठाई और ऐसी तान छेड़ी कि सारी गोपियां अपना सुध-बुध खोकर दौड़ी चली आईं। 
वृंदावन में उस रात भी कुछ घरों में चूल्हे जल रहे थे। किसी गोपी ने सोचा, ‘अभी तो आटा गूंथा है, मुरली बाद में सुन लूंगी।’ किसी ने सोचा, ‘बच्चा सो रहा है, अभी जाना ठीक नहीं।’ किसी ने सोचा, ‘लोग क्या कहेंगे? रात को वन में जाना?’ वे गोपियां नहीं आईं। मुरली तो उनके कानों में भी पड़ी थी, पर वे अपने कामों में उलझी रहीं। और जो आईं? वे तो आधी रोटी तवे पर छोड़कर आईं, कोई अपने काजल को एक आंख में ही लगाकर दौड़ पड़ी, कोई अपने बच्चे को झूले में झूलता छोड़कर। लोक-लाज, काम-काज सब छोड़कर। 
जो गोपियां उस रात नहीं गईं, वे सुबह पछताईं। बोलीं, ‘हाय, वो रात तो चली गई, अब तो मुरली फिर नहीं बजेगी।’ और जो गईं, उनका नाम आज भी वृंदावन की हवा लेती है। 
ये कहानी सिर्फ वृंदावन की नहीं, हमारी भी है। हमारे जीवन में भी मुरली रोज बजती है। सुबह जब मां फोन करती है और हम कहते हैं —‘अभी मीटिंग में हूं, बाद में बात करता हूं।’ वो मुरली ही तो थी। रास्ते में कोई वृद्ध हाथ बढ़ाता है और हम ‘फुर्सत नहीं है’ कहकर आगे बढ़ जाते हैं, वो मुरली ही तो थी। रात को अकेले में मन कहता है, ‘थोड़ी देर बैठ, बस राधे-राधे बोल’, और हम कहते हैं— ‘नींद आ रही है, कल करूंगा।’ 
तार्किक दृष्टि से देखो तो मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि उसके पास समय बहुत है। वह सोचता है कि भजन, प्रेम, सेवा के लिए कोई अलग मुहूर्त आएगा। पर शरद पूर्णिमा कहती है—मुहूर्त तो अभी है। जो गोपी आटा गूंथते हुए सोच रही थी कि ‘बाद में जाऊंगी’, क्या उसके आटे ने उसे बचा लिया? नहीं। पर जो आधी रोटी छोड़कर गई, वो अमर हो गई। 
अब जरा रहस्य को समझो—शरद पूर्णिमा वाले दिन खीर तो बहाना है। असल में, उस रात थोड़ी देर के लिए अपने सारे काम छोड़कर चंद्रमा के नीचे बैठो। अपने अधूरे कामों को, अपनी चिंताओं को थोड़ी देर छोड़ दो। शायद उसी पल तुम्हें भी तुम्हारी मुरली सुनाई दे जाए। महारास आज भी चल रहा है, यमुना किनारे नहीं, हमारे ही भीतर। जब मन सोलह कलाओं से शांत होता है, तब भीतर का श्याम आज भी मुरली बजाता है। 
विज्ञान कहता है इस रात चंद्रमा धरती के सबसे करीब होता है। आयुर्वेद कहता है इस रात चंद्रमा की किरणों में ‘सोम’ तत्व सबसे अधिक होता है, जो औषधि के समान है। सोम का अर्थ है - प्रेम, करुणा, शांति, क्षमा। लेकिन भक्ति का रहस्य इससे भी गहरा है। 
सोचो, दूध क्या है? दूध हमारे मन जैसा है - सफेद, कोमल, पर जल्दी खट्टा हो जाने वाला। अगर इसे ऐसे ही छोड़ दो तो खराब हो जाएगा। पर जब इसे चंद्रमा की शीतलता, यानी प्रेम की शीतलता में रखते हो, तो इसमें अमृत घुल जाता है। 
यही शीतलता खीर को पूर्णता प्रदान करती है। विचार कीजिए कि इसका खीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जैसे चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर भी शीतल रहता है, घमंड नहीं करता, वैसे ही खीर भी रात भर शीतलता पीकर मीठी हो जाती है। वो अब सिर्फ खाने की चीज नहीं रही, प्रसाद बन गई। 
शरद पूर्णिमा हमें दो बातें सिखाती है—पहली, जैसे चंद्रमा अपनी सोलह कला से पूरा चमकता है, वैसे ही जब हम अभिमान को छोड़ देते हैं, तभी हम पूरे होते हैं। चंद्रमा में दाग है, फिर भी वो पूज्य है। वो पूरा है। हम भी अपने दागों के साथ पूरे हो सकते हैं, बस अभिमान छोड़ना होगा कि ‘मैं परफेक्ट हूं।’ 
दूसरी, इस रात खीर बाहर इसलिए रखते हैं क्योंकि जैसे खीर चंद्रमा की शीतल किरणों से मीठी हो जाती है, वैसे ही हमारा मन भी प्रेम की शीतलता से मीठा हो जाता है। क्रोध की आग में तपे हुए मन को एक रात की शीतलता चाहिए।  
खीर को रखने का सबसे शुभ समय रात 10 बजे से लेकर सुबह 4-5 बजे तक माना जाता है। खीर बनाकर छत पर, खुले आसमान के नीचे, उस पर महीन मलमल का कपड़ा ढक कर रख दीजिए ताकि धूल न पड़े पर चाँदनी सीधी भीतर उतर सके। फिर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कीजिए। कहते हैं इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, और उसकी हर किरण में अमृत घुला होता है। अगर पूरी रात न रख सकें तो कम से कम रात 10 बजे से 12:30 बजे तक जरूर रखिए, यही अमृत-काल कहलाता है। 
अब सवाल है कि खीर किस पात्र में रखी जाए? सबसे श्रेष्ठ है चाँदी का बर्तन, क्योंकि चाँदी चंद्रमा की ही धातु मानी जाती है। और दूसरा श्रेष्ठ है मिट्टी का सकोरा, क्योंकि मिट्टी प्रकृति से जुड़ी है। इसके बाद कांसे या स्टील का बर्तन भी चल सकता है। ध्यान रहे, खीर हमेशा गाय के दूध और चावल से ही बनाएं। 
और हां, यही वो रात है जब समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसीलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा कहते हैं। ‘कोऽजागर’ संस्कृत में पूछा जाता है—‘कौन जाग रहा है?’ माँ लक्ष्मी उस घर में आती हैं, जहाँ कोई अपने भीतर के मोह को छोड़कर जाग रहा हो। वो जागना आंखों का नहीं, आत्मा का जागना है। 
इसलिए इस शरद पूर्णिमा की रात, एक काम करना। सारे काम दस मिनट के लिए रोक देना। बस दस मिनट के लिए अपना मन चाँद के नीचे रख देना। कुछ मत मांगना, बस बैठना। हो सकता है, बहुत दिनों बाद तुम्हें तुम्हारी अपनी मुरली की आवाज सुनाई दे - जो कह रही हो-‘आ गया? मैं तो यहीं हूँ, तेरे इसी मन में। तू ही तो कहीं और भटक रहा था।’ इस शरद पूर्णिमा, खीर तो रख ही देना, पर साथ में मन भी धर आना चाँद तले। 
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

1 comment:

Vinod Mehra said...

Bahut hi khoobsurat varnan sharad purnima ka, uspar kheer ka gehrai ka varnan...