‘श्री बिहारी जी के चरण कमल में नयन हमारे अटके, नयन हमारे अटके...’एक बार वृंदावन के एक भव्य मंदिर में, अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर एक संत श्री बांके बिहारी जी के चरणों का दर्शन कर रहे थे। उनका मन प्रभु के दर्शन में इतना लीन था कि वे भावविभोर होकर स्वयं को भूल चुके थे। उनकी आंखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे, और होंठों पर एक मधुर भाव अनायास ही फूट पड़ा—
भक्तिरस से सराबोर वह भाव मंदिर में गुंजायमान हो उठा। उसी समय वहाँ एक सामान्य भक्त भी खड़ा था। वह कोई ज्ञानी, साधक या कवि नहीं था—परंतु उस संत का प्रेममय गान उसके हृदय में उतर गया। उसने उस भाव को अपने भीतर समाहित कर लिया और उसी प्रेम को लेकर घर लौट आया।
घर पहुँचते ही वह भक्त, अब भी उसी भाव में डूबा हुआ, उसी भजन को गुनगुनाने लगा। उसकी आंखें बंद थीं, मन श्री बिहारी जी के चरणों में लीन था, और वाणी से अनजाने में एक त्रुटि हो गई। उसने गा दिया— ‘श्री बिहारी जी के नयन कमल में चरण हमारे अटके...’
शब्द उलट गए, पर प्रेम सीधा था। वह त्रुटि से अनभिज्ञ, उसी उलटे भाव को बार-बार गाता रहा। भाव की तीव्रता इतनी थी कि उसका रोम-रोम भक्ति में झूमने लगा। अब सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो यह एक वाक्य दोष था—भक्त के नयन प्रभु के चरणों में अटकने चाहिए थे, पर यहाँ तो भक्त ने अपने चरण प्रभु के नयन में अटका दिए!
लेकिन प्रभु भाव के पारखी हैं। श्री बिहारी जी ने जब यह अनूठा, अनगढ़, किन्तु अत्यंत भावपूर्ण प्रेम देखा, तो वे स्वयं अपने धाम से उतरकर उस भक्त के समक्ष प्रकट हो गए।
वह भक्त स्तब्ध रह गया। नेत्र खोलने पर उसने अपने सामने श्री बिहारी जी को साक्षात खड़े पाया। वह रो पड़ा, घबराते हुए बोला—‘प्रभु! मुझसे बड़ी भूल हो गई। मैंने आपके नयन कहकर अपने चरण वहाँ अटका दिए!’
श्री बिहारी जी ने मंद मुस्कान के साथ कहा—‘अरे भैया! मेरे अनेक भक्त हैं, पर तेरे जैसा निराला प्रेमी दुर्लभ है। लोग अपने नयन मेरे चरणों में अटकाते हैं, पर तूने तो मेरे ही नयन अपने चरणों में अटका दिए! मैं शब्दों का नहीं, भावों का भूखा हूं। तेरा प्रेम निष्कलंक है। उसी प्रेम के वशीभूत मैं यहाँ चला आया।’
प्रभु की करुणा से वह भक्त गद्गद् हो गया। उसके जीवन की वह घड़ी सबसे अनुपम थी। उस दिन उसने अनुभव किया कि भक्ति में व्याकरण नहीं, केवल भाव चलते हैं। प्रेम सच्चा हो तो प्रभु शब्दों की शुद्धता नहीं, हृदय की सच्चाई देखते हैं।
ईश्वर न तो मंत्रों की लंबी शृंखलाओं में बंधे हैं, न ही भाषाई शुद्धता के कठोर नियमों में। वे तो बस एक सच्चे, कोमल हृदय की पुकार पर स्वयं खिंचे चले आते हैं।

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