जरा सोचिए... एक सुबह आप अपना मोबाइल खोलते हैं और सोशल मीडिया पर आपका ही एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में आप कुछ ऐसा कहते या करते दिखाई दे रहे हैं, जो आपने कभी किया ही नहीं। लोग उस वीडियो को सच मानकर आपके बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। आप सफाई देना चाहते हैं, लेकिन तब तक वह वीडियो हजारों लोगों तक पहुंच चुका है। डरावना लगता है न? लेकिन आज की कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में ऐसा केवल किसी प्रसिद्ध व्यक्ति या मशहूर हस्ती के साथ ही नहीं, बल्कि आप और मेरे जैसे किसी आम व्यक्ति के साथ भी हो सकता है। इसी तकनीक का एक खतरनाक रूप है डीपफेक।
डी पफेक एक ऐसी तकनीक है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या हाव-भाव को किसी दूसरे वीडियो या ध्वनि में इस तरह बदला जाता है कि वह बिल्कुल वास्तविक जैसा दिखाई या सुनाई दे। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के चेहरे को दूसरे व्यक्ति के वीडियो पर इस तरह लगा दिया जाए कि देखने वाले को वह उसी व्यक्ति का चेहरा लगे। इसी तरह किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करके उससे ऐसी बातें कहलवाई जा सकती हैं, जो उसने वास्तव में कभी कही ही नहीं थीं।
डीपफेक का इस्तेमाल हमेशा गलत काम के लिए ही नहीं होता। फिल्म, मनोरंजन, शिक्षा और रचनात्मक कार्यों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इसका गलत इस्तेमाल कई गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके माध्यम से झूठी खबरें और अफवाहें फैलाई जा सकती हैं, किसी व्यक्ति की छवि खराब की जा सकती है, फर्जी बयान या भाषण तैयार किए जा सकते हैं और लोगों के साथ धोखाधड़ी या ठगी की जा सकती है। इसका इस्तेमाल लोगों को भ्रमित करने और गलत जानकारी फैलाने के लिए भी किया जा सकता है। इसलिए सोशल मीडिया पर कोई चौंकाने वाला वीडियो दिखाई दे तो उसे तुरंत सच मान लेना सही नहीं है। सवाल उठता है कि फिर असली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए गए वीडियो में अंतर कैसे पहचानें?
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए गए वीडियो पहले की तुलना में काफी बेहतर हो चुके हैं। इसलिए केवल देखकर हर डीपफेक वीडियो को पहचानना आसान नहीं है। फिर भी कुछ संकेत ऐसे हैं, जिन पर ध्यान देकर किसी वीडियो के संदिग्ध होने का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सबसे पहले चेहरे और आंखों पर ध्यान दें। क्या आंखों की गति असामान्य लग रही है? क्या पलकें सामान्य तरीके से झपक रही हैं? क्या चेहरे के भाव और आवाज एक-दूसरे से मेल खाते हैं? चेहरे की हरकतों और व्यक्ति के बोलने के तरीके के बीच किसी तरह का असामान्य अंतर दिखाई दे तो सावधान हो जाएं।
इसके बाद होंठ और आवाज का मिलान देखें। ध्यान दें कि व्यक्ति के होंठ उसकी आवाज के साथ सही तरीके से चल रहे हैं या नहीं। यदि आवाज कुछ और कह रही हो और होंठों की गति उससे ठीक से मेल न खा रही हो तो वीडियो संदिग्ध हो सकता है।
चेहरे के किनारों को भी ध्यान से देखें। कई बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से बदले गए चेहरे के आसपास हल्का धुंधलापन, असामान्य किनारे या त्वचा की बनावट में अंतर दिखाई दे सकता है। ऐसे में वीडियो को रोककर चेहरे, कान, बाल और गर्दन के आसपास के हिस्से को ध्यान से देखना उपयोगी हो सकता है।
हाथ और उंगलियों पर भी ध्यान दें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री में हाथ और उंगलियां लंबे समय से एक चुनौती रहे हैं। हालांकि, तकनीक में काफी सुधार हुआ है, फिर भी कुछ वीडियो में उंगलियों का आकार, संख्या या उनकी गति असामान्य दिखाई दे सकती है।
आवाज की स्वाभाविकता भी जांचें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार आवाज कभी-कभी बहुत साफ, एक जैसी या सपाट सुनाई दे सकती है। व्यक्ति के बोलने के सामान्य अंदाज, सांस लेने, शब्दों के बीच रुकने और भावनाओं पर ध्यान दें। यानी वीडियो में दिखाई देने वाली हर छोटी-बड़ी हरकत को ध्यान से देखना जरूरी है। हालांकि, केवल आवाज के आधार पर किसी वीडियो को असली या नकली नहीं माना जा सकता, क्योंकि आज की तकनीक काफी स्वाभाविक आवाज भी तैयार कर सकती है।
आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े उपकरण इतने उन्नत हो चुके हैं कि केवल आंखों से देखकर डीपफेक की पहचान करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए वीडियो के स्रोत और उसके संदर्भ की भी जांच जरूर करें। यह वीडियो सबसे पहले किसने प्रसारित किया? क्या किसी विश्वसनीय समाचार माध्यम ने इसकी पुष्टि की है? क्या संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक सामाजिक माध्यम खातों पर भी यही वीडियो मौजूद है? क्या वीडियो का पूरा संस्करण उपलब्ध है? इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। अगर आपके पास ऐसा कोई संदिग्ध वीडियो आता भी है तो सबसे पहले उसे आगे प्रसारित करने से बचें।
वीडियो की तारीख भी जांचें। कई बार कोई पुराना वीडियो किसी नई घटना के साथ जोड़कर प्रसारित कर दिया जाता है। पुराना वीडियो अपने आप में डीपफेक नहीं होता, लेकिन उसके साथ गलत दावा जोड़कर उसे भ्रामक बनाया जा सकता है। इसलिए वीडियो कब बनाया गया था और पहली बार कब प्रसारित हुआ था, इसकी जानकारी हासिल करना भी जरूरी है।
कुछ सामाजिक माध्यम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े उपकरण कृत्रिम रूप से तैयार या बदली गई सामग्री के बारे में संकेत या पहचान उपलब्ध कराते हैं। हालांकि ऐसे किसी संकेत की मौजूदगी या अनुपस्थिति को अकेले अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। किसी वीडियो की वास्तविकता जानने के लिए उसके स्रोत, संदर्भ और अन्य विश्वसनीय जानकारियों की भी जांच करनी चाहिए।
आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार वीडियो और वास्तविक वीडियो के बीच अंतर करना और भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में हमारी सबसे बड़ी ताकत सतर्कता और सही जानकारी होगी। किसी वीडियो को केवल इसलिए सच न मानें क्योंकि वह देखने में वास्तविक लगता है। हमारी थोड़ी-सी सावधानी किसी गलत सूचना को हजारों लोगों तक पहुंचने से रोक सकती है।
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

1 comment:
All the point are mentioned here about deepfake is correct because it is typically used maliciously or spread false information. it is generally growing concern.
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