“लोग कहते हैं श्रीराम ने रावण को मारा, मैं कहता हूं जब राम जागता है तो रावण खुद मर जाता है। इस एक लाइन में दशहरे का सारा रहस्य छिपा है। हम हर साल बाहर रावण का पुतला जलाते हैं, पर क्या हमने कभी अंदर के रावण को देखा है? आज हम बाहर की कहानी नहीं, अंदर की कहानी को समझने की कोशिश करेंगे, क्योंकि असली दशहरा बाहर नहीं, अंदर घटता है।
दशहरा का असली अर्थ क्या है? दश + हरा का रहस्य
दशहरा का अर्थ लोग केवल दशहरा ही समझते हैं, पर इसकी एक प्रतीकात्मक व्याख्या है—दश + हरा। दश मतलब दस और हरा मतलब हारा हुआ, समाप्त किया हुआ। यानी दस बुराइयों को हराने वाला दिन। हम कहते हैं रावण के दस सिर थे, पर क्या सच में किसी इंसान के दस सिर हो सकते हैं? ये दस सिर हमारे अंदर की दस वृत्तियां भी मानी जा सकती हैं, जिनके साथ हम रोज जीते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, भय, आलस्य और हिंसा। जब तक ये दस हमारे अंदर जिंदा हैं, तब तक जीवन में असली दशहरा नहीं आता। जिस दिन ये दस हार जाते हैं, उसी दिन जीवन में राम का जन्म होता है और तभी दशहरा पूरा होता है।रा + म = राम, रावण के नाम में ही छिपे थे राम
यहां एक बात उल्लेखनीय है, जिसे बहुत कम लोगों ने इस दृष्टि से देखा है। रावण का पहला अक्षर है ‘रा’ और उसकी धर्मपत्नी मंदोदरी का पहला अक्षर है ‘म’। अगर दोनों को जोड़ दें तो रा + म = राम। कितना बड़ा रहस्य है यह! रावण के घर में, उसके नाम में और उसकी पत्नी के नाम में भी राम छिपे हुए दिखाई देते हैं। यही तो हमारे साथ भी होता है। राम हमारे अंदर ही बैठे हैं, हमारे हर शब्द में, हमारी हर सांस में हैं, पर हम उन्हें बाहर खोजते रहते हैं।
रावण जानता था कि राम कौन हैं। वह श्रीराम की शक्ति, मर्यादा और सत्य को पहचानता था और मन से उन्हें स्वीकार भी करता था। फिर भी वह उनके सामने झुकने को तैयार नहीं था। इसके पीछे केवल उसका अहंकार नहीं, बल्कि एक गहरी सोच की कल्पना भी की जाती है। वह अपनी प्रजा और अपने भाइयों के सामने जान-बूझकर अहंकार और वैर का प्रदर्शन करता रहा। उसे भय था कि यदि वह स्वयं राम की महानता स्वीकार कर लेगा, तो राक्षस जाति के भीतर चला आ रहा वैर और प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा। रावण चाहता था कि यह संघर्ष अपने अंतिम परिणाम तक पहुंचे। उसकी दृष्टि में श्रीराम के हाथों उसका अंत केवल उसका अंत नहीं था, बल्कि पूरी राक्षस जाति के लिए मुक्ति का मार्ग बन सकता था। वह जानता था कि जब मोक्ष की घड़ी आएगी, तब वह अकेला नहीं होगा, उसकी जाति भी उसी मुक्ति में सम्मिलित होगी। इसलिए उसका श्रीराम के विरुद्ध खड़ा होना केवल विरोध नहीं था; उसके पीछे एक ऐसी सोच की कल्पना की जाती है, जिसमें अपनी जाति के कल्याण और अंततः उसके उद्धार की भावना छिपी थी। बाहर से वह श्रीराम का विरोधी बना रहा, लेकिन भीतर से वह उस सत्य को पहचानता था, जिसके सामने अंततः उसे भी जाना था।
अब सवाल उठता है कि रावण बुरा था क्या? हम बचपन से सुनते आए हैं कि रावण राक्षस था, इसलिए बुरा था। लेकिन क्या किसी व्यक्ति को केवल उसके बाहरी रूप से समझा जा सकता है? अगर रावण केवल बुराई का प्रतीक था, तो फिर उसके चरित्र में इतना ज्ञान, तप, विद्या और शिवभक्ति क्यों दिखाई देती है? रावण महाज्ञानी था, वेदों का ज्ञाता था, संगीत और शास्त्रों का विद्वान था और भगवान शिव का महान भक्त था। उसके व्यक्तित्व में ज्ञान भी था, सामर्थ्य भी था, तप भी था और अहंकार भी था। यही रावण के चरित्र का सबसे बड़ा रहस्य है—एक व्यक्ति के भीतर अच्छाई और बुराई दोनों साथ रह सकती हैं।
एक रहस्यात्मक व्याख्या यह भी कहती है कि रावण जानता था कि वह राक्षस योनि में है। वह शिव का भक्त था और उसके विश्वास के अनुसार भक्त को भगवान स्वयं नहीं मारते। मुक्ति उसे श्रीराम के हाथों ही मिल सकती थी। रावण जानता था कि श्रीराम के हाथों उसका अंत होगा तो उसे इस योनि से मुक्ति मिल सकती है, लेकिन उसकी सोच केवल अपने तक सीमित नहीं थी। उसने सोचा कि अगर मैं अकेला मुक्त हो गया तो मेरी प्रजा का क्या होगा? मेरी पूरी राक्षस जाति इसी अंधकार में रह जाएगी। इसलिए उसने ऐसा मार्ग चुना, जिसके कारण श्रीराम को स्वयं लंका तक आना पड़े और जब राम आएं तो केवल उसका ही नहीं, पूरी राक्षस जाति का उद्धार हो।
कहा जाता है कि रावण के महल में एक गुप्त स्थान था, जहां वह अकेला बैठकर श्रीराम का स्मरण करता था। बाहर वह श्रीराम का शत्रु था, लेकिन भीतर राम के चरणों में समर्पित एक भक्त। अंत में जब उसकी सेना, उसके भाई और उसके बेटे सब चले गए और राक्षस जाति का अंत सामने दिखाई देने लगा, तब वह स्वयं श्रीराम का स्मरण करते हुए अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा करने लगा। उस रहस्यात्मक कल्पना में वह प्रभु से कहता है—प्रभु, मैं जानता हूं मेरा अंत समय आ गया है और मैं चाहता हूं कि मेरा अंत आपके हाथों हो। कितनी विचित्र सोच थी उसकी। वह केवल मरना नहीं चाहता था, वह मोक्ष चाहता था और वह भी अकेले नहीं, सबके साथ।सभी कहते हैं रावण ने सीता का हरण किया, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जिस रावण के पास सोने की लंका थी, वह सीता को अशोक वाटिका में क्यों रखेगा? वह चाहता तो उन्हें अपने महल में, रानियों के बीच रख सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा?
लोक-व्याख्याओं में इसके अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। एक रहस्यात्मक व्याख्या यह भी कहती है कि माता सीता उस समय वनवास में थीं, इसलिए रावण ने उन्हें महल में न रखकर अशोक वाटिका में रखा, जो वन का ही एक हिस्सा थी। उसने माता सीता को कभी स्पर्श तक नहीं किया—ऐसी मान्यता भी इस कथा में कही जाती है। उसके सामने केवल एक स्त्री नहीं थी, उसके सामने शक्ति थी, भक्ति थी और मर्यादा थी। भक्ति को छुआ नहीं जाता, भक्ति को तो पूजा जाता है।
यहां से एक प्रश्न उठता है—फिर वह कौन-सा निर्णय था, जिसने इस पूरी कथा को उसके अंतिम परिणाम तक पहुंचा दिया? माता सीता का हरण। अब इसे आप शूर्पणखा की जिद कहें, नियति का विधान कहें या फिर रावण का अपनी राक्षस जाति को मोक्ष दिलाने का संकल्प—इस पर विचार करना हमें स्वयं है। हम अक्सर हर घटना को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं। हम कहते हैं—रावण ने सीता का हरण किया, बस यहीं तक हमारी सोच रुक जाती है। लेकिन क्या हमने कभी उस घटना के पीछे छिपी सोच, उस रहस्य और उस गहरे उद्देश्य को समझने का प्रयास किया?असली दशहरा बाहर नहीं, अंदर मनाना है
आज दशहरे के दिन हम रावण का पुतला जलाकर जश्न मनाते हैं। कभी सोचा है कि हम जिस रावण के पुतले का दहन कर रहे हैं, उसके पीछे रावण का संकल्प था, उसकी सोच थी और राक्षस जाति के उद्धार की एक रहस्यात्मक कथा थी। लेकिन हम किस सोच से उसके जलाने का संकल्प ले रहे हैं? हमारी सोच केवल नकारात्मकता को खत्म करने तक सीमित है। हमने कभी सकारात्मकता को अपनाने की नहीं सोची। हम हर साल रावण जलाते हैं, पर क्या हमारे अंदर का काम, क्रोध और अहंकार जलता है? नहीं जलता, क्योंकि हम बाहर का रावण जला रहे हैं, अंदर का नहीं।
इसलिए इस दशहरे पर एक काम करो। बाहर का पुतला तो दुनिया जलाएगी, तुम अंदर का रावण जलाओ। तुम्हारे अंदर जो ‘रा’ और ‘म’ अलग-अलग पड़े हैं, उन्हें जोड़ो। जब रा और म जुड़ेंगे, तभी अंदर राम जागेगा और जिस दिन अंदर का राम जाग गया, उस दिन अंदर का रावण खुद मर जाएगा। यही दशहरे का असली रहस्य है—रावण को बाहर जलाने से पहले राम को भीतर जगाना।© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

1 comment:
Wow! It was a new perspective to think upon.
Post a Comment