भारत में पुरानी चीजों को संभालकर रखने की परंपरा कोई नई बात नहीं है। घर में बड़े भाई की कमीज छोटे भाई के काम आ जाना, बड़े भाई की पुस्तक नये सत्र में छोटे भाई के काम आ जाना, मां की पुरानी साड़ी से बच्चों के कपड़े बन जाना, दादी की संदूक में रखी साड़ी का वर्षों बाद फिर निकलना या पुराने फर्नीचर को थोड़ा ठीक करके उसे दोबारा इस्तेमाल करना—ये सब हमारे घरेलू जीवन का हिस्सा रहे हैं।
आ ज इसी पुराने विचार ने एक नया नाम और नया रूप पा लिया है—थ्रिफ्टिंग। सरल शब्दों में कहें तो किसी ऐसी वस्तु को खरीदना या इस्तेमाल करना, जो पहले किसी और के पास रह चुकी हो, लेकिन अभी भी उपयोगी और आकर्षक हो, थ्रिफ्टिंग कहलाता है। इसमें सेकंड-हैंड कपड़े, विंटेज साड़ियां, किताबें, बैग, जूते, फर्नीचर, सजावटी सामान और रोजमर्रा की कई दूसरी चीजें भी शामिल हो सकती हैं। यहां तक कि वे पुरानी चीजें भी, जो कभी घर की शान हुआ करती थीं और जिन्हें देखकर परिवार अपने आप पर गर्व महसूस करता था।
आज की युवा पीढ़ी इसे केवल पैसे बचाने के तरीके के रूप में नहीं देख रही है। इसमें अपनी अलग पहचान बनाने, अनोखी चीजें खोजने और जरूरत से ज्यादा उपभोग से बचने की सोच भी जुड़ रही है।
पुराना अब सिर्फ पुराना नहीं रहा। अब तस्वीर कुछ बदल रही है। किसी पुराने बाजार में मिली दशकों पुरानी साड़ी, किसी दुकान में मिला पुराना रेडियो, किसी के घर का पुराना लकड़ी का फर्नीचर या 1990 के दशक की कोई जैकेट आज किसी को खास और आकर्षक लग सकती है। जिस चीज को एक व्यक्ति पुरानी समझकर छोड़ देता है, वही किसी दूसरे के लिए दुर्लभ और खास हो सकती है।
आज युवा लोग वाई2के फैशन, विंटेज कपड़ों और अलग तरह की वस्तुओं की तलाश कर रहे हैं। वे वेबसाइटों और ऐप के सहारे दूसरे शहरों तक में तलाश रहे हैं कि कोई ऐसी वस्तु मिल जाए, जो उन्हें पहली नजर में पसंद आ जाए। अब थ्रिफ्टिंग ने पुराने सामान को घर की अलमारी या स्टोर रूम से निकालकर डिजिटल बाजार तक पहुंचा दिया है।
किसी मां की शादी की साड़ी, दादी की पसंदीदा साड़ी या किसी पुराने पारिवारिक समारोह में पहनी गई साड़ी—इन चीजों का भावनात्मक मूल्य कई बार इनके बाजार मूल्य से कहीं ज्यादा होता है।
वैसे फैशन की दुनिया में एक दिलचस्प नियम है—पुराना अक्सर नए रूप में लौटकर आता है। वर्ष 1990 और 2000 के शुरुआती वर्षों का फैशन, जिसे कभी पुराना समझा जाता था, आज वाई2के फैशन के नाम से फिर लोकप्रिय हो रहा है।
दूसरी तरफ, एआई आधारित खोज उपकरण किसी वस्तु की पहचान करने, उससे मिलती-जुलती चीजें खोजने या किसी पुराने फैशन को समझने में मदद कर सकते हैं।
आज की ‘खरीदो, इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाली संस्कृति के सामने थ्रिफ्टिंग एक अलग सोच लेकर आया है।
जब आप किसी दुकान या ऑनलाइन पेज पर जाते हैं तो आपको पहले से पता नहीं होता कि वहां क्या मिलने वाला है। अचानक कोई ऐसी वस्तु मिल सकती है, जिसकी आपको लंबे समय से तलाश थी। यही खोज का रोमांच इसे सामान्य खरीदारी से अलग बनाता है।
थ्रिफ्टिंग का बढ़ना केवल फैशन के बदलते हुए ट्रेंड की कहानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे हमारी खरीदारी की बदलती मानसिकता भी दिखाई देती है। एक तरफ लोग नई चीजें खरीदना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग अब यह भी सोच रहे हैं कि जो चीज पहले से मौजूद है, उसे फिर से उपयोग में क्यों न लाया जाए? यही कारण है कि पुरानी साड़ी, पुरानी किताब, पुराना फर्नीचर या वर्षों पुराना कपड़ा आज फिर से मूल्यवान लगने लगा है।
थ्रिफ्टिंग यही याद दिला रही है कि किसी वस्तु की उम्र और उसकी कीमत हमेशा एक ही बात नहीं होती। कभी-कभी नया खरीदने से ज्यादा दिलचस्प होता है—पुराने में कुछ नया खोज लेना।
© सृजन | लेखक: Brij Mohan Tiwari

4 comments:
Nice
👏👏
Thrifting is a good practice for reuse of things and money-saving 👍
Thrifting सिर्फ शॉपिंग नहीं, एक अनोखा एडवेंचर है! 🕵️♂️✨
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